Parliament Special Session: संसद सत्र में क्या होगा सरकार का असली एजेंडा? विपक्ष में किस बात को लेकर है बेचैनी
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विस्तार
संसदीय कार्य मंत्री प्रहलाद जोशी ने जब 31 अगस्त को संसद का विशेष सत्र बुलाने की घोषणा की थी, तभी से सत्र के मुद्दों को लेकर अटकलबाजी चल रही थी। चर्चा यही थी कि सरकार एक राष्ट्र एक चुनाव, महिला आरक्षण बिल या देश का नाम केवल भारत रखने जैसे प्रस्ताव पास कराने की कोशिश कर सकती है। इसे उसकी 2024 लोकसभा चुनावों को देखते हुए बड़ा सियासी दांव करार दिया जा रहा था। वहीं, विपक्ष ने इसे सरकार के द्वारा मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने की साजिश करार दिया गया है। उसका कहना है कि वह मूल मुद्दों को उठाकर बहस को दिशाहीन नहीं होने देगा।
लेकिन अब सरकार ने यह साफ कर दिया है कि 18 सितंबर से 22 सितंबर तक आयोजित होने वाले इस विशेष सत्र में मुख्य चुनाव आयुक्त विधेयक, प्रेस पंजीकरण विधेयक, अधिवक्ता विधेयक और डाकघर विधेयक पारित कराने की कोशिश की जाएगी। हालांकि, विपक्ष अभी भी सरकार की सफाई से संतुष्ट नहीं है। उसे लग रहा है कि सरकार अपना असली एजेंडा छिपा रही है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा है कि विशेष सत्र के दौरान सरकार अपना असली एजेंडा सामने ला सकती है। यह एजेंडा क्या हो सकता है और विपक्ष इससे इतना आशंकित क्यों है?
क्या हो सकता है सरकार का एजेंडा?
दरअसल, माना यही जा रहा है कि विकास के तमाम बड़े कामों को करने के बाद भी सरकार के हाथ अभी वह ट्रंप कार्ड नहीं हाथ लगा है जो 2024 लोकसभा चुनाव में उसकी जीत की गारंटी बन सके। यही कारण है कि यह माना जा रहा है कि सरकार अंतिम क्षणों में कोई बड़ा सियासी दांव खेलकर मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर सकती है। यह ध्रुवीकरण समान नागरिक संहिता या एक देश एक चुनाव जैसा कोई भावनात्मक मुद्दा हो सकता है।
चुनाव आयुक्त की नियुक्ति मामले पर भी विवाद
सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर जो नई व्यवस्था प्रस्तावित की है, उसके अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश की भूमिका समाप्त हो जाएगी। प्रधानमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और नेता प्रतिपक्ष की ओर से आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह पहले ही यह मुद्दा उठाने की शुरुआत कर चुके हैं।
विपक्ष क्यों बेचैन
जनता दल यूनाइटेड नेता सत्य प्रकाश मिश्रा ने अमर उजाला से कहा कि हमें इस बात की पूरी संभावना दिखाई पड़ रही है कि सरकार संसद सत्र में अपना छिपा हुआ एजेंडा सामने ला सकती है। इसका बड़ा कारण यही है कि सरकार ने आज तक किसी भी मुद्दे पर विपक्ष से बातचीत को महत्त्व नहीं दिया है। वह अचानक बड़े बदलाव वाले निर्णय लागू करती है, जिससे उहापोह की स्थिति बनती है।
कैसे सामना करेगा विपक्ष
यदि सरकार इस तरह का कोई मुद्दा लेकर आती है, तो विपक्ष इसका सामना कैसे करेगा? अमर उजाला के इस सवाल पर जदयू नेता ने कहा कि सरकार विवादित मुद्दों के सहारे मणिपुर, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों से बचने की कोशिश कर रही है। लेकिन उनकी पार्टी सहित इंडिया गठबंधन में शामिल समूचे विपक्षी राजनीतिक दल इन मुद्दों को उठाएंगे और सरकार को घेरने का काम करेंगे।
संसद में बहुमत से होता है निर्णय- भाजपा
भाजपा के पूर्व सांसद बिजय सोनकर शास्त्री ने कहा कि विशेष सत्र के दौरान छिपा हुआ एजेंडा लाने का आरोप लगाना कांग्रेस और विपक्ष की अलोकतांत्रिक सोच को दिखाता है। संसद में बहुमत से किसी निर्णय पर पहुंचा जाता है और इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद उसे देश में लागू किया जाता है। इसलिए छिपा हुआ एजेंडा लाने की बात कहना संसदीय प्रणाली और इसकी प्रक्रिया का अपमान है।
बिजय सोनकर शास्त्री ने कहा कि कांग्रेस हमेशा गांधी परिवार के हितों से प्रेरित होकर हर आदेश मानने और उसे लागू करने की संस्कृति से प्रेरित रही है। उसने पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ऊपर उठकर अपने परिवार विशेष के हित में निर्णय लिए हैं। ऐसे में उसे लगता है कि इस सरकार में भी इसी तरह के निर्णय हो रहे हैं।
लेकिन वे समूचे विपक्ष को आश्वस्त करना चाहते हैं कि इस सरकार में पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए ही निर्णय लिए जाएंगे और लागू किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है और विशेष सत्र देश के विकास यात्रा को आगे बढ़ाने के लिए लाया गया है और हर दल को इसमें सरकार का साथ देना चाहिए।
अटकलबाजी का कारण भी सरकार
राजनीतिक टिप्पणीकार संजय तिवारी ने अमर उजाला से कहा कि इस मामले में खूब अटकलबाजी हुई है। यदि सरकार पहले ही संसद सत्र के एजेंडे का खुलासा कर देती, तो इस तरह की अटकलबाजियों को स्थान नहीं मिलता। इस पर एक और गलती हुई कि पहले तो प्रह्लाद जोशी ने यह कह दिया कि संसद सत्र का मुद्दा बताने की कोई परंपरा नहीं रही है, लेकिन बाद में सरकार ने एजेंडा घोषित भी कर दिया। यह इस मामले पर सरकार में एकमत होने की कमी को दर्शाता है। यदि इस मामले पर एक सुविचारित रणनीति से काम किया गया होता तो इस अटकलबाजी से बचा जा सकता था।
उन्होंने कहा कि इस अटकलबाजी का किसे लाभ मिला, यह कहना मुश्किल है। इससे सरकार के आगामी कदम को लेकर सरकार के समर्थकों और उसके विरोधियों दोनों ही खेमों में भ्रम बना रहा। लेकिन सरकार के किसी काम के प्रति भ्रम पैदा होने से उसे ही नुकसान होता है।
विपक्ष यह भ्रम पैदा करने की लगातार कोशिशें करता रहा है कि सरकार आने वाले समय में चुनाव को समाप्त करने की कोशिश कर सकती है। यदि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में पूरी तरह सरकार का ही नियंत्रण रहा, तो इससे विपक्ष यह कहने में सफल हो जाएगा कि उसकी आशंका अकारण नहीं थी। भाजपा को इसका नुकसान हो सकता है। घोसी उपचुनाव में हर वर्ग के मतदाताओं को एकजुट होकर भाजपा प्रत्याशी के विरोध में वोट करने के संकेत को समझा जाना चाहिए।