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दिल्ली पुलिस की मदद न करने के पीछे कौन सी थी 'मजबूरियां', क्यों नहीं टूटी सरकार की नींद?

Tue, 05 Nov 2019 07:07 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 05 Nov 2019 07:07 PM IST
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What was the compulsions of Government, why the Delhi Police commissioner not helped his own police
delhi police protest - फोटो : एएनआई
दिल्ली पुलिस की मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। पुलिसकर्मी जब मुख्यालय के बाहर जाकर प्रदर्शन करने लगे और मीडिया में पुलिस की बगावत पर उतरने जैसी खबरें चलना शुरू हुईं, तब जाकर सरकार की नींद टूटी। इसके बाद आनन-फानन में बैठकों का दौर शुरू हो गया। पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक अपने कर्मियों को समझाने पहुंचे, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। वे ऐसा कोई भी आश्वासन देने में नाकाम रहे, जो पुलिसकर्मियों को पीछे हटने के लिए तैयार कर देता।
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दिल्ली पुलिस के एक सेवानिवृत्त पुलिस आयुक्त का साफ कहना है कि मौजूदा सीपी इस मामले में कोई स्टैंड नहीं ले सके। तीन दिन से मामला चल रहा है, लेकिन वे कुछ नहीं कर पाए।
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'मजबूरियां' रहीं सवार

उनके ऊपर दो तरह की मजबूरी कह सकते हैं। एक राजनीतिक और दूसरी न्यायिक। उन्हें पहली 'मजबूरी' का भी साथ नहीं मिला। चूंकि दिल्ली चुनाव सिर पर हैं, इसलिए राजनीतिक नेतृत्व ने वकीलों को नाराज करना उचित नहीं समझा। दूसरी 'मजबूरी' न्यायिक रही, जिसने पूरी तरह से पुलिस अफसरों के हाथ बांध दिए। केंद्र सरकार के कुछ लोग जैसे केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू आदि पुलिसकर्मियों की मदद करना चाह रहे थे, लेकिन वे भी पहली और दूसरी 'मजबूरी' के चलते पीछे हट गए।

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सीपी को समय रहते लेना चाहिये था स्टैंड

पूर्व पुलिस आयुक्त बताते हैं कि पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक को खुद इस मामले में स्टैंड लेना चाहिए था। चाहे बाद में कुछ न हो, लेकिन मामले के फौरन बाद वे पुलिसकर्मियों को समझा-बुझाकर शांत कर सकते थे, जो उन्होंने नहीं किया। यहां तक कि वकीलों के साथ हुई झड़प में जिन पुलिसवालों को चोट लगी, उनका हालचाल जानने का भी प्रयास किसी अधिकारी ने नहीं किया। पुलिस अफसरों के साथ जमकर धक्का मुक्का हुई, लेकिन उन्हें चुप करा दिया गया।


इससे पहले भी कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, लेकिन वे मीडिया की सुर्खियां नहीं बन पाई थी। उस दौरान पुलिस अफसरों ने स्टैंड लिया और मामले को सुलझा लिया गया।

लगे किरण बेदी और दीपक मिश्रा की प्रशंसा में नारे

दिल्ली पुलिस के पूर्व स्पेशल सीपी रहे दीपक मिश्रा की एक टीम को नेपाल पुलिस ने पकड़ लिया था। मिश्रा ने तत्कालीन पुलिस आयुक्त पर इतना दबाव बनाया कि उन्होंने केंद्र सरकार से बातचीत कर मामले का फौरन समाधान करा दिया। किरण बेदी के समय में भी ऐसी ही बातें देखने को मिली थीं। यही वजह रही कि मंगलवार को जब पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक प्रदर्शनकारियों को समझाने आए, तो वहां किरण बेदी और दीपक मिश्रा की प्रशंसा में नारे लगने लगे।

हमारा सीपी कैसा हो, किरण बेदी और दीपक मिश्रा जैसा हो, पुलिसकर्मियों के मुख से यही शब्द निकल रहे थे। कहीं न कहीं यह बात साबित करती है कि मौजूदा सीपी अमूल्य पटनायक अपने जवानों के साथ जुड़ाव रखने में नाकाम रहे हैं।

हाईकोर्ट में पक्ष रखने का नहीं मिला मौका

एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि हाईकोर्ट ने इस मामले में बहुत तत्परता से कार्रवाई की है। स्वत: संज्ञान लेकर पुलिस अफसरों और पुलिसकर्मियों पर गाज गिरा दी गई। आरोपी वकीलों के खिलाफ कुछ नहीं हुआ। स्पेशल सीपी संजय सिंह और दूसरे पुलिस अफसरों को अपनी बात कहने का मौका तक नहीं मिला। इसके बाद निचले स्तर के पुलिसकर्मियों को यह लगने लगा कि उनके मामले में भी कुछ नहीं होने वाला। दूसरी तरफ, पुलिसकर्मी को पीटने का वीडियो लगातार वायरल हो रहा था।

पहले किया ट्वीट, फिर किया डिलीट

ऐसा नहीं है कि पुलिस के आला अफसर कुछ नहीं जानते थे। उन्हें मालूम था कि नाराज पुलिस जवानों में रोष फैल रहा है। इसके बावजूद पुलिस आयुक्त चुप रहे। वे अपने स्तर पर जवानों को समझा सकते थे, लेकिन उन्होंने किसी से भी मुलाकात करना ठीक नहीं समझा। मामले पर राजनीतिक मजबूरी कितनी हावी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गृह मंत्रालय में रहे पूर्व राज्यमंत्री और वर्तमान मौजूदा खेल एवं युवा कल्याण मामलों के राज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने दिल्ली पुलिस के समर्थन में एक भावनात्मक ट्वीट कर दिया। जब उनका ट्वीट वायरल होने लगा, तो उन्हें उसे डिलीट करना पड़ा।

यह किसी से नहीं छिपा है कि दिल्ली की सभी अदालतों में जो बॉर एसोसिएशन है, उनमें बड़े पैमाने पर भाजपा के सदस्य हैं। कुछ ही माह में दिल्ली विधानसभा चुनाव हैं, इसलिए भाजपा ने वकीलों को नाराज करना उचित नहीं समझा। जिसके चलते मामला खिंचता चला गया।
 

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