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भारत में तलाक के मामले आखिर क्या कहते हैं?

Sat, 22 Oct 2016 03:18 PM IST
सौतिक बिस्वास/ बीबीसी संवाददाता
सौतिक बिस्वास/ बीबीसी संवाददाता Updated Sat, 22 Oct 2016 03:18 PM IST
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what say india's divorce case?
- फोटो : BBC

"तलाक मांगने के अधिकार पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती है, लेकिन महिलाओं को इसका अधिकार देना अपने आप में बेमतलब की बात होगी और शायद इससे कुछ अच्छा होने की जगह ज्यादा बुरा ही होगा." एक विश्लेषक ने मई 1949 में एक लेख में भारत में महिलाओं के बदलती स्थिति और तलाक के मुद्दे पर लिखा था।

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प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्रिका इकॉनॉमिक वीकली में रोमा मेहता ने कहा है, " पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत में महिलाएं ज्यादा सुरक्षित हैं और उनकी देख-रेख बहेतर तरीके से होती है।" उन्होंने लेख में आगे कहा, "कई बार वो माता पिता के घर से ज्यादा खुश ससुराल में रहती थीं। उनकी परेशानियां और दर्द उनके परिवार में सुलझा लिया जाता है।
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हो सकता है कि परिवार से उनका सामंजस्य कभी कभार बहुत बुरा रहता हो, लेकिन इन सबके बाद भी परिवार बना रहता है।" वो कहती हैं कि बहुत बड़ी आबादी के बीच तलाक की कोई चर्चा भी नहीं होती थी। उनके मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था मूल रूप से ग्रामीण है, बड़ी संख्या में लोग अशिक्षित हैं, उनका बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं है और लोगों के बीच बेहतर जीवन जीने की दुहाई मौजूद नहीं है।

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लेकिन वो सब बीते दिनों की बात हो गई

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 रोमा मेहता ने लिखा कि "प्यार और नफरत, विवाह और दूसरी शादी जैसी समस्या को सामाजिक स्तर पर सुलझा लिया जाता है।" लेकिन वो सब बीते दिनों की बात हो गई । 1950 के दशक में संसद में हिन्दू को बिल पारित हुआ, जिसने महिलाओं को संपत्ति का अधिकार दिया, बहु विवाह पर रोक लगाई और तलाक मांगने का अधिकार दिया। बाद में साल 1976 में इस कानून में संशोधन किया गया और पति पत्नी के बीच सहमति से तलाक़ की अनुमति दी गई।

समय के साथ ही शहरों में परंपरागत संयुक्त परिवार टूटता गया। महिलाएं काम पर जाने लगीं या उन्होंने अपना खुद का काम शुरू कर दिया। महिलाएं आर्थिक सुरक्षा के लिए पति पर निर्भर न रहीं, पति घर के काम में हाथ बंटाने लगे हैं और लिंग भेद से जुड़े मामलों में बदलाव आ रहा। अर्थशास्त्री सूरज जैकब और मानव विज्ञानी श्रीपर्णा चट्टोपाध्याय ने हाल ही में भारत की जनगणना के आधार पर अध्ययन किया है। जिसने शायद पहली बार भारत में तलाक और पति पत्नी के अलग होने के मामलों को गहराई से देखने की कोशिश की है।
 

भारत में वैवाहिक संबंधों के टूटने की कौन सी कहानी

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भारतीय जनगणना में कुछ ऐसे सवाल होते हैं: कभी शादी नहीं की, जीवनसाथी से अलग, तलाकशुदा, विधवा या विवाहित ऐसा हो सकता है कि कुछ महिलाएं तलाक से जुड़े सामाजिक सोच - जहां इसे धब्बे की तरह देखा जाता है, पति से अलग होने या तलाक की बात की जानकारी न दें। लेकिन अध्ययन से कुछ बातें सामने आती हैं।

 भारत में करीब 14 लाख लोग तलाकशुदा हैं। यह कुल आबादी का करीब 0.11 फीसद है, और शादीशुदा (भारत के) आबादी का करीब 0.24 फीसद हिस्सा है। ज्यादा हैरत की बात यह है, अलग हो चुके लोगों की संख्या तलाकशुदा से तीन गुना ज्यादा है। मर्दों के मुकाबले ज्यादा महिलाएं तलाकशुदा और पति से अलग रह रही हैं।

 उत्तर पूर्वी भारतीय सूबों में तलाक के मामले बाकी इलाकों से थोड़े ज्यादा हैं भारत के उत्तरी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और राजस्थान, जो कि पुरुष सत्तात्मक समाज के रूप में जाने जाते हैं, वहां तलाक और सेपरेशन का दर बहुत कम है।

 बड़े राज्यों में गुजरात में सबसे ज्यादा तलाक के मामले मौजूद हैं ये आंकड़े भारत में वैवाहिक संबंधों के टूटने की कौन सी कहानी बयां करते हैं?

शोधकर्ताओं को कहना है

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भारत में तलाक से जुड़े सामाजिक धब्बे और कोर्ट में लंबे समय समय तक केस के अटके रहने की वजह से यहां तलाक से ज्यादा सेपरेशन (पति पत्नी का अलग हो जाना) के मामले मिलते हैं। अधिक तलाकशुदा और सेपरेटेड महिलाओं की तादात भारत में महिला और पुरुष के बीच के भेदभाव को बताता है और दर्शाता है कि एक पुरुष सत्तात्मक समाज किस तरह से काम करता है।

इसका मतलब यह है कि या तो महिलाएं खुद तलाकशुदा रहने का फैसला कर लेती हैं या फिर उन्हें दूसरी शादी के लिए मर्द नहीं मिल पाते हैं। चट्टोपाध्याय कहती हैं, "भारत में महिलाएं जो भेदभाव झेलती हैं वह हमेशा से होता रहा है।

आपके पास तलाक लेने का अधिकार है, लेकिन दोबारा शादी होना बहुत मुश्किल है और यह तलाकशुदा महिलाओं के प्रति भेदभाव भी दिखाता है।" भारत में तलाक और अलग रहने के मामले में शहरों और गांवों में बहुत कम अंतर है।

शोधकर्ताओं को कहना है, "यह आंकड़ा बहुत हैरान करता है। लोगों का किसी वर्ग से ताल्लुक रखने या न रखने का शायद ऐसे मामलों पर असर होता हो लेकिन आप शहरी हैं या ग्रामीण इसका कोई खास असर नहीं दिखता है।"

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