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Explainer: क्या है टाइम कैप्सूल? अमेरिका 250 साल के लिए करेगा दफन, इंदिरा से PM मोदी तक संजो चुके हैं इतिहास

Sun, 05 Jul 2026 03:32 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Sun, 05 Jul 2026 03:32 PM IST
सार

What is Time Capsule?: अमेरिका अपनी आजादी के 250 साल पूरे होने पर एक विशाल टाइम कैप्सूल जमीन में दफना रहा है, जिसे साल 2276 में खोला जाएगा। इसमें आज के अमेरिका की पहचान बताने वाली खास चीजें रखी गई हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में भी ऐसा प्रयोग पहले हो चुका है? ऐसे में इस खबर में जानेंगे कि आखिर टाइम कैप्सूल क्या होता है? इसे क्यों दफनाया जाता है? यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए इतना अहम क्यों? इन सभी सवालों के जवाब विस्तार से और आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं...

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What Is Time Capsule Why US Burying for 250 Years How India Connected Indira gandhi pm modi also make history
टाइम कैप्सूल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/AI

विस्तार

अमेरिका अपनी आजादी के 250 साल पूरे होने के मौके पर एक ऐसा काम कर रहा है, जिसकी चर्चा पूरी दुनिया में हो रही। राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल में फिलाडेल्फिया के इंडिपेंडेंस नेशनल हिस्टोरिकल पार्क में 408 किलोग्राम का एक विशाल टाइम कैप्सूल जमीन में दफन किया जा रहा है। इसे अब नहीं, बल्कि पूरे 250 साल बाद यानी वर्ष 2276 में खोला जाएगा। इस कैप्सूल में आज के अमेरिका की संस्कृति, तकनीक, इतिहास और समाज को दर्शाने वाली कई खास चीजें रखी गई हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि 2026 का अमेरिका कैसा था।
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टाइम कैप्सूल की खबर सामने आने के बाद भारत के भी एक पुराने अध्याय की चर्चा होने लगी। बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत में भी ऐसा प्रयोग आज से पांच दशक पहले किया गया था। यानी 50 साल पहले। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 15 अगस्त 1973 को लाल किले के लाहौरी गेट के पास 'कालपात्र' नाम का टाइम कैप्सूल जमीन में दफन कराया था। इसे एक हजार साल बाद खोलने की योजना थी। हालांकि बीच में इसे निकाल लिया गया था।
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खैर भारत के टाइम कैप्सूल की बात करने से पहले ये जान लेते हैं कि टाइम कैप्सूल क्या होता है? किस धातु से बनाया जाता है? अमेरिका का टाइम कैप्सूल दुनिया से कितना अलग है और क्यों है? टाइम कैप्सूल पर बाकी के देशों ने कितनी प्रगति की है? क्या वाकई टाइम कैप्सूल देश के इतिहास को बचाने के लिए अहम है? इतना ही नहीं साथ ही ये भी जानेंगे कि 2276 के लोगों के लिए अमेरिका आखिर क्या छोड़ रहा है? और ये 250 साल तक सुरक्षित कैसे रहेगा...?
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पहले जान लेते हैं टाइम कैप्सूल क्या होता है?

टाइम कैप्सूल एक मजबूत और पूरी तरह सीलबंद कंटेनर होता है। इसमें किसी देश, समाज या संस्था से जुड़ी महत्वपूर्ण चीजें, दस्तावेज, तस्वीरें, तकनीक, रिकॉर्ड और यादगार वस्तुएं सुरक्षित रखी जाती हैं। इसका उद्देश्य भविष्य की पीढ़ियों तक वर्तमान समय की असली तस्वीर पहुंचाना होता है। जब तय समय के बाद इसे खोला जाता है, तब उस दौर के लोग यह समझ पाते हैं कि सदियों पहले समाज कैसा था, लोग कैसे रहते थे, कौन-सी तकनीक इस्तेमाल करते थे और उस समय की सबसे बड़ी उपलब्धियां क्या थीं।



यही वजह है कि टाइम कैप्सूल को इतिहास और भविष्य के बीच एक पुल भी कहा जाता है। इसमें रखी जाने वाली हर वस्तु सोच-समझकर चुनी जाती है। कई बार इसमें संविधान की प्रति, अखबार, सिक्के, वैज्ञानिक उपकरण, किताबें, तस्वीरें, बीज, सांस्कृतिक वस्तुएं और डिजिटल रिकॉर्ड भी रखे जाते हैं। आसान शब्दों में कहें तो टाइम कैप्सूल किसी भी दौर का जीवित दस्तावेज होता है, जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जाता है।

अमेरिका 2276 के लोगों के लिए आखिर क्या छोड़ रहा है?

अमेरिका का यह टाइम कैप्सूल सिर्फ एक धातु का डिब्बा नहीं, बल्कि 2026 के अमेरिका का संदेश माना जा रहा है। इसे फिलाडेल्फिया में इसलिए दफनाया जा रहा है, क्योंकि 4 जुलाई 1776 को यहीं स्वतंत्रता घोषणा पत्र को मंजूरी मिली थी और इसी शहर को अमेरिकी आजादी का जन्मस्थान माना जाता है। इस बार आजादी के 250 साल पूरे होने पर उसी ऐतिहासिक जगह को चुना गया है।



करीब 408 किलोग्राम वजन वाले इस कैप्सूल में अमेरिका के सभी 50 राज्यों और वहां के लोगों की ओर से चुनी गई खास वस्तुएं रखी गई हैं। इनमें व्हेल की हड्डी, दुनिया के सबसे बड़े जिप्सम रेगिस्तान की रेत, राइट बंधुओं के विमान से जुड़ा कपड़ा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के भविष्य से जुड़ी भविष्यवाणियां, ऐतिहासिक दस्तावेज और कई सांस्कृतिक प्रतीक शामिल हैं। इसका मकसद केवल वस्तुएं सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि 2026 में अमेरिका की पहचान क्या थी और उस समय दुनिया किस दिशा में आगे बढ़ रही थी।

250 साल तक कैप्सूल सुरक्षित कैसे रहेगा?

सबसे बड़ी चुनौती टाइम कैप्सूल को बनाना नहीं, बल्कि उसे सदियों तक सुरक्षित रखना होती है। यही कारण है कि अमेरिका ने इस परियोजना पर करीब दस साल तक शोध किया। वैज्ञानिकों ने ऐसा डिजाइन तैयार किया, जिससे पानी, नमी, जंग और मौसम का असर कैप्सूल पर न पड़े। इसे साधारण डिब्बे की तरह चौकोर नहीं, बल्कि बेलनाकार बनाया गया है, क्योंकि वैज्ञानिकों के अनुसार इस आकार में दबाव बराबर रहता है और पानी के अंदर पहुंचने का खतरा कम होता है।



इस कैप्सूल को विशेष गुणवत्ता वाले स्टेनलेस स्टील से बनाया गया है। इसे इंडियम धातु की मदद से पूरी तरह सील किया गया है, ताकि कहीं भी हवा या पानी प्रवेश न कर सके। कैप्सूल के भीतर नमी का स्तर भी वैज्ञानिक तरीके से करीब 35 प्रतिशत रखा गया है, जिससे कागज और दूसरी सामग्री लंबे समय तक सुरक्षित रह सके। इसे जमीन से करीब 10 फीट नीचे दफनाया जाएगा। इसके ऊपर सुरक्षा के लिए एक और स्टील का आवरण लगाया जाएगा, जिससे बाढ़ या भूजल बढ़ने की स्थिति में भी अंदर रखा सामान सुरक्षित रह सके।

अब बात भारत के 'काल पात्र' की...

आज से 50 साल पहले।  दिन था 15 अगस्त 1973। उस समय की तत्कालीन प्रधानमंत्री थी इंदिरा गांधी। लाल किले के लाहौरी गेट सुरक्षा बलों के घेरों से घिरा था। दरअसल उसे गेट के पास भारत के इतिहास को सुरक्षित दफन करने की प्रक्रिया चल रही थी। जो अमेरिका आज कैप्सूल दफन कर रहा है। उस समय भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी 'कालपात्र' नाम का टाइम कैप्सूल जमीन में दफन करा रही थीं। इसे एक हजार साल बाद खोलने की योजना थी। हालांकि सरकार बदलने के बाद कुछ ऐसा हुआ कि महज चार साल में ही इसे बाहर निकाल लिया गया।

दरअसल, जब कुछ इतिहासकारों ने मसौदा देखा तो उन्होंने दावा किया कि इसमें कई ऐतिहासिक तथ्यों को एकतरफा ढंग से पेश किया गया है। आरोप लगाया गया कि दस्तावेजों में तत्कालीन सरकार की उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया, जबकि कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं और नेताओं का पर्याप्त उल्लेख नहीं किया गया। यही कारण था कि विपक्ष ने इसे इतिहास के संरक्षण की बजाय राजनीतिक छवि बनाने का प्रयास बताया।

विवाद बढ़ने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि टाइम कैप्सूल के दस्तावेजों की सामग्री की उन्हें व्यक्तिगत जानकारी नहीं है। इसके बावजूद विरोध थमा नहीं। संसद से लेकर राजनीतिक मंचों तक इस मुद्दे पर बहस होती रही। विपक्ष का कहना था कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए रखा जाने वाला दस्तावेज पूरी तरह निष्पक्ष होना चाहिए, न कि किसी सरकार के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने वाला। यही विवाद आगे चलकर टाइम कैप्सूल के भविष्य का सबसे बड़ा कारण बना।

सरकार बदलते ही टाइम कैप्सूल क्यों निकाल लिया गया?

वर्ष 1977 में आपातकाल खत्म होने के बाद हुए आम चुनाव में इंदिरा गांधी की सरकार सत्ता से बाहर हो गई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। चुनाव प्रचार के दौरान जनता पार्टी ने वादा किया था कि सत्ता में आने पर टाइम कैप्सूल को बाहर निकालकर उसकी सच्चाई देश के सामने लाई जाएगी। सरकार बनने के बाद इसी वादे पर अमल शुरू हुआ।

नवंबर 1977 में पूरे मामले की जांच के लिए एक संसदीय समिति बनाई गई। इसके बाद कड़ी सुरक्षा के बीच दिसंबर 1977 में लाल किले के पास खुदाई शुरू हुई और आठ दिसंबर को टाइम कैप्सूल बाहर निकाल लिया गया। दिलचस्प बात यह रही कि जिस कैप्सूल को जमीन में दबाने पर लगभग आठ हजार रुपये खर्च हुए थे, उसे निकालने में करीब 58 हजार रुपये खर्च हो गए। बाद में उसके दस्तावेज संसद पुस्तकालय में रखे गए और उन पर चर्चा भी हुई, लेकिन पूरा रिकॉर्ड कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। यही वजह है कि आज भी यह सवाल बना हुआ है कि उस कालपात्र में वास्तव में क्या-क्या था। 

क्या आज भी 'कालपात्र' का पूरा सच सामने नहीं आया है?

टाइम कैप्सूल को बाहर निकाले जाने के दशकों बाद भी उसके दस्तावेज पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हो सके। वर्ष 2012 में वरिष्ठ पत्रकार मधु किश्वर ने प्रधानमंत्री कार्यालय से सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत इस संबंध में जानकारी मांगी थी। प्रधानमंत्री कार्यालय ने जवाब दिया कि उसके पास इस टाइम कैप्सूल की सामग्री से जुड़ी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। बाद में मामला केंद्रीय सूचना आयोग तक पहुंचा, जहां प्रधानमंत्री कार्यालय को जानकारी जुटाने के निर्देश भी दिए गए, लेकिन कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई।

यह मुद्दा बाद के वर्षों में भी चर्चा में रहा। राज्यसभा में भी इस विषय को उठाया गया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सदन में कहा था कि टाइम कैप्सूल को हजारों वर्षों के लिए दफनाने की बात कही गई थी और संसद को इसकी पूरी जानकारी नहीं दी गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि कैप्सूल में मौजूद कुछ दस्तावेजों को लेकर उस समय राजनीतिक विवाद हुआ था। हालांकि, आज भी इसके पूरे रिकॉर्ड को लेकर इतिहासकारों के बीच बहस जारी है और यह भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे चर्चित अध्यायों में शामिल है।

क्या गुजरात के मुख्यमंत्री रहते पीएम मोदी ने भी दफन कराया था कैप्सूल?

भारत में इंदिरा गांधी के बाद टाइम कैप्सूल का सबसे चर्चित उदाहरण वर्ष 2010 में सामने आया, जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। गांधीनगर में बन रहे महात्मा मंदिर की नींव में एक स्टील का टाइम कैप्सूल रखा गया। सरकार का कहना था कि इसमें गुजरात के 50 वर्षों के विकास, इतिहास और उपलब्धियों से जुड़े दस्तावेज सुरक्षित रखे गए हैं, ताकि भविष्य की पीढ़ियां राज्य के विकास की कहानी जान सकें।

हालांकि, यह परियोजना भी विवादों से बच नहीं सकी। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि कैप्सूल में रखी गई अधिकांश सामग्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार से जुड़ी है तथा इससे उनकी छवि को बढ़ावा देने की कोशिश की गई है। उस समय इसे हटाने की मांग भी उठी, लेकिन कैप्सूल आज भी वहीं सुरक्षित है।

कुछ शिक्षण संस्थानों ने भी दफन कराया टाइम कैप्सूल

इसके अलावा वर्ष 2010 में आईआईटी कानपुर परिसर में भी एक टाइम कैप्सूल दफनाया गया था, जिसमें संस्थान के शोध कार्य और इतिहास से जुड़े दस्तावेज रखे गए। वहीं 2019 में पंजाब की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी और 2025 में सिक्किम सरकार ने भी भविष्य की पीढ़ियों के लिए टाइम कैप्सूल तैयार कर इतिहास और विरासत को सुरक्षित रखने की पहल की।

दुनिया के कौन-कौन से टाइम कैप्सूल आज भी चर्चा में हैं?

टाइम कैप्सूल केवल अमेरिका या भारत तक सीमित नहीं हैं। दुनिया के कई देशों ने अपने इतिहास और संस्कृति को भविष्य तक पहुंचाने के लिए ऐसे प्रयोग किए हैं। अमेरिका के मैसाचुसेट्स स्टेट हाउस में 1795 में रखा गया टाइम कैप्सूल 220 साल बाद वर्ष 2015 में खोला गया। इसके भीतर पुराने सिक्के, अखबार, पदक और ऐतिहासिक दस्तावेज सुरक्षित मिले। इसी तरह नॉर्वे में 1912 में सीलबंद एक पैकेट 100 साल बाद खोला गया, जिसमें स्थानीय इतिहास से जुड़े दस्तावेज और अखबार मिले। बोस्टन में भी 1901 का एक छिपा हुआ टाइम कैप्सूल 2014 में मरम्मत के दौरान मिला, जिसमें उस दौर की तस्वीरें और अखबार सुरक्षित थे।



दूसरी ओर दुनिया में कई ऐसे टाइम कैप्सूल भी हैं, जिन्हें अभी सैकड़ों या हजारों साल बाद खोला जाएगा। अमेरिका की ओगलथॉर्प यूनिवर्सिटी का 'क्रिप्ट ऑफ सिविलाइजेशन' वर्ष 8113 में खुलेगा। न्यूयॉर्क वर्ल्ड्स फेयर का वेस्टिंगहाउस टाइम कैप्सूल वर्ष 6938 तक बंद रहेगा। जापान के ओसाका एक्सपो-70 का एक टाइम कैप्सूल वर्ष 6970 में खोला जाएगा। इन कैप्सूलों में किताबों से लेकर फिल्में, बीज, घरेलू सामान, वैज्ञानिक उपकरण और उस दौर की तकनीक तक सुरक्षित रखी गई है। इससे पता चलता है कि टाइम कैप्सूल केवल इतिहास नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता का दस्तावेज बन जाते हैं।

अमेरिका का टाइम कैप्सूल बाकी देशों से अलग क्यों?

अमेरिका का नया टाइम कैप्सूल अपने आकार, तकनीक और उद्देश्य तीनों वजहों से खास माना जा रहा है। इसका वजन करीब 408 किलोग्राम है और इसे बनाने में लगभग दस साल तक शोध किया गया। वैज्ञानिकों ने इसे बेलनाकार बनाया, क्योंकि यह आकार लंबे समय तक दबाव और नमी को बेहतर तरीके से झेल सकता है। इसे विशेष गुणवत्ता वाले स्टेनलेस स्टील से तैयार किया गया है और इंडियम धातु की मदद से पूरी तरह सील किया गया है, ताकि हवा और पानी अंदर प्रवेश न कर सकें।

इसके भीतर नमी का स्तर भी वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रित रखा गया है। विशेषज्ञों ने लगभग 35 प्रतिशत आर्द्रता बनाए रखी है, ताकि कागज, कपड़ा और दूसरी सामग्री खराब न हो। कैप्सूल को जमीन से करीब 10 फीट नीचे दफनाया जाएगा और उसके ऊपर एक अतिरिक्त स्टील का सुरक्षात्मक आवरण लगाया जाएगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि भविष्य में भूजल बढ़े या बाढ़ जैसी स्थिति आए, तब भी यह संरचना कैप्सूल को सुरक्षित रखने में मदद करेगी। यही कारण है कि इसे अब तक के सबसे उन्नत टाइम कैप्सूलों में गिना जा रहा है।

क्या भविष्य की पीढ़ियों के लिए टाइम कैप्सूल एक अनमोल विरासत है?

आज डिजिटल युग में अधिकांश जानकारी इंटरनेट पर मौजूद है, लेकिन डिजिटल रिकॉर्ड समय के साथ मिट भी सकते हैं। ऐसे में वैज्ञानिक तरीके से तैयार किए गए टाइम कैप्सूल भविष्य के लिए भरोसेमंद दस्तावेज माने जाते हैं। इनमें केवल वस्तुएं नहीं, बल्कि किसी समय की जीवनशैली, संस्कृति, विज्ञान, तकनीक और सामाजिक सोच भी सुरक्षित रहती है। यही कारण है कि दुनिया के कई देश, विश्वविद्यालय और संस्थान समय-समय पर टाइम कैप्सूल तैयार कर रहे हैं।
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