बंगाल चुनाव: मिथुन चक्रवर्ती सौरव गांगुली और फुरफुरा शरीफ के सहारे भाजपा की उम्मीदों को लग सकते हैं पंख!
- सौरव गांगुली के साथ जनसभा साझा करने या प्रचार में शामिल करने की हो रही है कोशिश
- मिथुन चक्रवर्ती सात मार्च को भाजपा में होंगे शामिल
- आईएसएफ, कांग्रेस, वामदल का गठबंधन बढ़ाएगा ममता की बेचैनी
- 07 मार्च के बाद और चुनाव प्रक्रिया तक और तृणमूल नेताओं के पार्टी में शामिल होने की संभावना
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विस्तार
मिशन भाजपा, मिशन पश्चिम बंगाल है। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भाजपा के नेताओं कार्यकर्ताओं को इसे एक युद्ध बताया है। भाजपा राष्ट्रीय महासचिव और राज्य के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय भाजपा के इस मिशन को जी-जान से पूरा करने में लगे हैं। शीर्ष रणनीतिकार कहते हैं कि यह मिशन पूरा होगा और भाजपा 200 के पार सीटें लाएगी। भाजपा के पश्चिम बंगाल के एक उपाध्यक्ष कहते हैं कि हमने चक्रव्यूह बनाया है और इसे भेद पाना तृणमूल की नेता ममता बनर्जी के बस की बात नहीं है। पार्टी के दूसरे उपाध्यक्ष राजकमल पाठक कहते हैं कि बदलाव की जमीन तैयार है, अगले डेढ़ महीने में जीत की पटकथा लिख लेनी है।
आखिर कहां से लग रहे हैं भाजपा की उम्मीद को पंख?
अर्जुन सिंह तृणमूल से भाजपा में शामिल होने के बाद से लगातार सक्रिय हैं। बैरकपुर क्षेत्र के बड़े नेता हैं। बर्दवान से जितेन्द्र तिवारी के शामिल होने के बाद भाजपा को यहां भी तृणमूल को कड़ी टक्कर देने की उम्मीद बन गई है। नंदीग्राम से तृणमूल के विधायक रहे और कभी ममता बनर्जी के सारथी तक कहे जाने वाले शुभेन्दु अधिकारी के आने के बाद भाजपा को काफी राहत मिल गई थी। भाजपा की कोशिश तृणमूल के सुब्रत मुखर्जी जैसे नेता को पार्टी में शामिल कराने की थी, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई।
अभी भी भाजपा को उम्मीद है कि तृणमूल के प्रत्याशियों की घोषणा हो जाने के बाद तृणमूल के तमाम नेता पार्टी में शामिल होंगे। इसकी कोशिशें पश्चिम बंगाल में चल रही हैं और इसे चेहरा और उसके महत्व को देखकर आठ चरणों की चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक जारी रखा जा सकता है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि केन्द्रीय गृहमंत्री ने तो मंच से घोषणा करके कहा है कि चुनाव तक तृणमूल में ममता अकेली रह जाएंगी। इसलिए जो आना चाहे उसका स्वागत है।
सात मार्च को प्रधानमंत्री की पहली जनसभा से निकलेंगे विजय घोष के संदेश
उत्तर प्रदेश के संगठन मंत्री सुनील बंसल, त्रिपुरा में भाजपा की जीत के प्रमुख रणनीतिकार सुनील देवधर समेत तमाम नेता बंगाल में समय दे रहे हैं। भाजपा के युवा सांसद तेजस्वी सूर्या की निगाह पश्चिम बंगाल पर टिकी है। भाजपा आईटी सेल के प्रभारी अमित मालवीय ने लगातार समय देकर अपनी सोशल मीडिया टीम को दुरुस्त कर लिया है। कुल मिलाकर पहली बड़ी तैयारी सात मार्च को प्रधानमंत्री के ब्रिगेड ग्राउंड जनसभा को बड़े पैमाने पर जन-जन तक पहुंचाने की है। इस जनसभा में फिल्म अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती प्रधानमंत्री मोदी के साथ रैली साझा कर सकते हैं। उन्हें भगवा रंग का पट्टा पहनाकर भाजपा में शामिल कराया जा सकता है। पश्चिम बंगाल में मिथुन दा लोकप्रिय हैं और भाजपा को उम्मीद है कि इससे उसके पक्ष में लहर बनाने में मदद मिलेगी।
कांग्रेस-वामदल-आईएसएफ का गठबंधन देगा आधार
बंगाल में सीमावर्ती सीटों के गणित को लेकर भाजपा के नेता पहले से सतर्क हैं। राज्य में करीब 30 फीसदी अल्पसंख्यक मतदाता हैं जो राज्य की 98 से अधिक सीटों को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं और 2011, 2016 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के वोटर रहे हैं। लेकिन अब भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस-वामदल-आईएसएफ के गठबंधन ने भी उम्मीद बढ़ा दी है। आईएसएफ के प्रमुख फुफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी का राज्य के मुसलमानों में प्रभाव है।
वामदलों ने कोविड-19 संक्रमण काल से ही राज्य में सामाजिक स्तर पर अपनी सक्रियता काफी बढ़ाई है। ऐसे में पार्टी के वर्ग का मानना है कि न केवल मुसलमानों का वोट तृणमूल और गठबंधन में बंटेगा बल्कि तृणमूल के अन्य कोर वोट में भी बंटवारा होगा। भाजपा की प्रदेश महिला मोर्चा की प्रभारी अग्निमित्रा पॉल कहती हैं कि तृणमूल में गया वामदलों का कैडर उसे (तृणमूल) छोड़कर बड़े पैमाने पर भाजपा में शामिल हुआ है। इसके आने का मतलब है कि गांव-गांव तक लोग अब तृणमूल की नेता ममता बनर्जी से बदलाव चाहते हैं। हालांकि ममता बनर्जी के खास, राज्य सरकार में शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी कहते हैं कि यह भाजपा का भ्रम भी हो सकता है। कभी-कभी ऐसी रणनीति बैक फायर भी कर सकती है।
मातृ पुत्र मिला तो डोलेगा बंगाल में ममता का शासन
बंगाल में अभी भी भाजपा को बड़े मातृपुत्र की तलाश है। क्रिकेटर सौरव गांगुली ने राजनीति में आने में अनिच्छा जिताई है, लेकिन भाजपा ने अभी उम्मीद नहीं छोड़ी है। पार्टी के एक बड़े नेता का कहना है कि सौरव गांगुली के भाजपा में आने के बाद कहीं कोई दुविधा ही नहीं रहेगी। पार्टी के नेताओं की कोशिश अभी भी जारी है। वह चाहते हैं कि यदि सौरव गांगुली राजनीति में न आना चाहें तो न आएं, लेकिन चुनाव के दौरान प्रचार में शामिल लें। पार्टी के नेताओं की निगाह केवल सौरव गांगुली पर ही नहीं है। वह कई और चेहरों पर भी निगाह गड़ाए हुए है। बताते हैं एक बड़ा चेहरा मिलते ही, पश्चिम बंगाल की चुनौती छोटी हो जाएगी।
वोट प्रतिशत से समझिए
2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को तीन सीटें और 10.16 फीसदी वोट मिले थे। 2019 में पार्टी को 40.2 फीसदी वोट और 18 सीटें मिल गईं। पार्टी के नेता कहते हैं कि 18 सीटों पर मिले वोट को ध्यान में रखकर चलें तो करीब 121 विधानसभा सीटों पर भाजपा का प्रभाव बन जाने की उम्मीद है। 2019 के बाद से हमारा वोट प्रतिशत बढ़ने और तृणमूल कांग्रेस के 2019 में मिले 43 फीसदी वोट के घटने की ही संभावना है।
भाजपा ने 70 विधानसभा सीटों को प्रभावित करने वाले मतुआ समुदाय पर डोरे डालने की हर कोशिश की है। उसे 30 फीसदी अल्पसंख्यक वोटों में बंटवारा साफ दिखाई दे रहा है। 1.8 करोड़ के करीब दलितों से भी पार्टी को खासा उम्मीद है। इसके जवाब में टीएमसी नेता कहते हैं कि भाजपा भ्रम में है। 2014 में हमें 39.7 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन सीटें 34 मिली थीं। जबकि 2019 में 43 फीसदी वोट मिले और सीटें केवल 22 मिल पाईं।
इसके समानांतर 2016 विधानसभा चुनाव में हमें 44 फीसदी से अधिक वोट मिला, लेकिन 211 सीटें मिलीं। तृणमूल के नेता कहते हैं कि लोकसभा चुनाव में हमारा वोट प्रतिशत तो बढ़ गया था, लेकिन सीटें घट गईं। इसलिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव में दोनों के वोट प्रतिशत का सीटों के मामले में कोई तालमेल नहीं है। फिर यह चुनाव बंगाल और बंगाल के मुद्दे पर होगा। यहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या गृह मंत्री अमित शाह मुख्यमंत्री बनने नहीं आएंगे। इसलिए भाजपा बताए कि बंगाल चलाएगा कौन?