बंगाल चुनाव: 'दीदी' जीतें या 'दादा', लेकिन परिवर्तन का फिर से प्रतीक बन गया है नंदीग्राम
- शुभेंदु अधिकारी का 50 हजार वोटों से जीतने का दावा
- टीएमसी के सांसद का कहना है दो मई का इंतजार कीजिए
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हल्दिया के 138 गांवों का नंदीग्राम किसका होगा? दीदी ममता बनर्जी या दादा शुभेन्दु अधिकारी का? 10 मार्च 21 को दीदी पर्चा भरने गई थीं और चोटिल होकर लौट आईं। आज दादा यज्ञ पूजा करने के बाद पर्चा भरने पहुंचे। भाजपा ने ममता को नंदीग्राम में बांधने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है, लेकिन इसके बाद भी टीएमसी के पूर्व राज्यसभा सदस्य, प्रवक्ता विवेक गुप्ता कहते हैं दो मई का इंतजार कीजिए। ममता सरकार में मंत्री पार्थ चटर्जी कहते हैं कि यह मत भूलिए कि शुभेन्दु टीएमसी में थे। अब भाजपा में हैं और उनकी लड़ाई टीएमसी की नेता, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से है।
भाजपा के पश्चिम बंगाल उपाध्यक्ष राजकमल पाठक का कहना है कि शुभेन्दु अधिकारी ने ममता के खिलाफ 50 हजार वोटों से जीत का दावा किया है और शुभेन्दु का कहना है कि ऐसा नहीं हुआ तो वह राजनीति से सन्यास ले लेंगे। इतनी बड़ी बात ऐसे ही थोड़ी कह दी है। शुभेन्दु के प्रचार में वहां कपड़ा और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी पहुंच गई हैं।
दिल्ली और पश्चिम बंगाल के भाजपा के रणनीतिकारों ने भी अपने एजेंडे में थोड़ा बदलाव किया है। अब ममता को नंदीग्राम में ही बांधने के लिए उच्चस्तरीय आक्रामक प्रचार अभियान की रणनीति बन रही है। सूत्र बताते हैं कि पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय इसकी निगरानी कर रहे हैं। भाजपा के स्टार प्रचारकों की टीम वहां जाकर चुनाव प्रचार को धार देने की कोशिश करेगी।
टीएमसी ने संभाला मोर्चा
ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी हालात पर नजर बनाए हुए हैं। दिल्ली में छह सांसदों ने शुक्रवार को कालीपट्टी बांधकर अपना विरोध दर्ज कराया। ममता पर हमले को लेकर टीएमसी सांसदों के प्रतिनिधि मंडल ने चुनाव आयोग से भी अपनी शिकायत दर्ज कराई है। कुल मिलाकर फोकस में एक बार नंदीग्राम आ गया है। यह नंदीग्राम 2016 में भी फोकस में आया था। कहा जाता है कि ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की राजनीति में शीर्ष पर पहुंचाने में नंदीग्राम आंदोलन का बहुत बड़ा योगदान है।
सीपीएम के लोग नंदीग्राम के इस विधानसभा चुनाव को दूसरे नजरिए से देखते हैं। उनका मानना है कि सीपीएम का कैडर तृणमूल कांग्रेस में शिफ्ट हो गया था और ममता बनर्जी की सरकार बन गई। नंदीग्राम में सीपीएम वाला कैडर अभी तृणमूल के साथ है। शांतुन बनर्जी का कहना है कि नंदीग्राम में घूमने पर वहां लोगों को तृणमूल की जरूरत आगे के लिए भी महसूस होती है।
इसलिए असल राजनीतिक लड़ाई तो तृणमूल के वोटों और तृणमूल से अलग हुए उसके वोटों के बीच में है। कुल मिलाकर शुभेन्दु तो तृणमूल से अलग हुए हैं। उनका अपना वोट बैंक है। नंदीग्राम में भाजपा किसी प्रभावी स्थिति में नहीं है। देखना है कि दादा ने जनता के बीच में अपनी कितनी पकड़ बनाई है।