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पश्चिम बंगाल चुनाव: ममता बनर्जी के मुस्लिम कार्ड की अमित शाह ने खोजी काट, यूं कामयाब होगा ‘सोनार बांग्ला’ का सपना

Tue, 23 Mar 2021 05:32 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 23 Mar 2021 05:32 PM IST
सार

पश्चिम बंगाल की 90 से अधिक मुस्लिम बहुल वाली सीटों पर तृणमूल की दावेदारी मजबूत, पार्टी को दिला सकती है लीड, इसे बेअसर करने के लिए भाजपा ने 84 आरक्षित सीटों पर ताकत झोंकी...

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West Bengal Election 2021: Amit shah has prepared a plan to counter mamata banerjee muslim card for sonar bangla
अमित शाह - फोटो : PTI (File Photo)

विस्तार

पश्चिम बंगाल में 294 विधानसभा सीटों के लिए 27 मार्च से 29 अप्रैल के बीच आठ चरणों में चुनाव होंगे। भाजपा के प्रमुख चुनावी रणनीतिकार अमित शाह पश्चिम बंगाल में दो सौ से ज्यादा सीटें जीतकर राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। अपने ज्यादातर चुनावी अनुमानों में अब तक खरे उतरे शाह ने इस लक्ष्य को पाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। बंगाल के प्रति उनकी गंभीरता का ही नतीजा माना जा रहा है कि पार्टी ने यहां से सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों तक को चुनावी मैदान में उतार दिया है।  

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लेकिन पार्टी नेताओं का भी मानना है कि पश्चिम बंगाल में अमित शाह के इस लक्ष्य को हासिल करना बेहद कठिन काम है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि राज्य की 90 से कुछ अधिक सीटें पूरी तरह मुस्लिम बहुल वाली हैं, जहां पार्टी को मजबूत उम्मीदवार तक नहीं मिल सके। ऐसे में पार्टी इन सीटों पर खुद को पहले ही चुनावी दौड़ से बाहर मानकर चल रही है। यानी सच्चाई यह है कि पार्टी बंगाल की बाकी की 204 सीटों पर ही लड़ाई लड़ रही है। इन सीटों पर भी सौ फीसदी लक्ष्य हासिल करना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा।
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पिछले विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को 211 और वामदलों-कांग्रेस और स्वतंत्र उम्मीदवारों को कुल मिलाकर शेष 83 सीटों पर सफलता मिली थी। भाजपा की निगाह तृणमूल कांग्रेस की सीटों के साथ-साथ इन 83 सीटों पर भी है। पार्टी का अनुमान है कि अगर CAA जैसे मुद्दों के कारण मतों का ध्रुवीकरण होता है, तो इन 83 सीटों का एक बड़ा हिस्सा उसके साथ आ सकता है जो ममता बनर्जी की प्रचंड लहर में भी उनके साथ नहीं गया था।   

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एससी/एसटी सीटों पर दृष्टि

पश्चिम बंगाल में भाजपा ने शुरुआत से ही मतुआ समुदाय के वोटरों को रिझाने की कोशिश शुरू कर दी थी। अमित शाह से लेकर बंगाल में भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार कैलाश विजयवर्गीय ने इस दौरान कई बार मतुआ समुदाय के लोगों के यहां भोजन करने का कार्यक्रम रख इस समुदाय को खुद से जोड़ने की ही कोशिश की थी। इसी प्रकार दलित और आदिवासी समूह के अन्य वर्गों को भी खुद से जोड़ने के लिए भाजपा ने लंबे समय से रणनीति के साथ काम किया है।

दलित वोटबैंक के सहारे भाजपा

पार्टी के चुनाव प्रचार में लगे उत्तर प्रदेश के एक शीर्ष नेता के मुताबिक दलित वोट बैंक बंगाल में भाजपा के लिए तुरुप का इक्का साबित हो सकता है, और यही वोटर उसे बंगाल की सत्ता दिला सकता है। पार्टी का अनुमान है कि उसकी अब तक की कोशिशों के कारण इस वर्ग के लगभग 60 फीसदी वोटर उसके साथ जुड़ चुके हैं। पश्चिम बंगाल की एससी/एसटी वर्ग के लिए आरक्षित 84 सीटों में से अगर एक बड़ा हिस्सा उसके हाथ लग जाता है तो पार्टी का बंगाल मिशन कामयाब हो सकता है।

अगर पश्चिम बंगाल की 90 मुस्लिम बहुल सीटें तृणमूल कांग्रेस की ताकत बनकर उभर सकती हैं तो भाजपा इनकी भरपाई 84 आरक्षित सीटें हथियाकर करना चाहती है।

प्रशांत किशोर ने ममता को दी थी ये सलाह

जानकारी के मुताबिक़ बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने भी ममता बनर्जी को यही रिपोर्ट दी थी कि इस बार सत्ता बरकरार रखने के लिए उन्हें सबसे कड़ी चुनौती इन 84 सीटों पर ही झेलनी पड़ सकती है। पीके ने ममता बनर्जी को इन सीटों को अपने साथ जोड़े रखने के लिए ‘बड़े दांव’ खेलने की सिफारिश की थी जो पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में दिखाई भी पड़ी।

प्रशांत किशोर की सलाह पर काम करते हुए ही ममता दीदी ने दलित-आदिवासी वोटरों को रिझाने के लिए प्रत्येक दलित/आदिवासी परिवार को 12 हजार रुपये प्रति वर्ष आर्थिक सहायता देने का बड़ा दांव खेला। टीएमसी का अनुमान है कि यह दांव उसे इन सीटों पर भारी जीत दिला सकता है।

भाजपा का भी जवाबी तीर  

अमित शाह की टीम इस वर्ग के वोटरों में सेंधमारी के लिए सिर्फ इनके घर खाना खाने की प्रतीकात्मक लड़ाई ही नहीं लड़ रही है, बल्कि ममता दीदी के चुनावी वायदों की काट भी खोज रही है। भाजपा के ‘सोनार बांग्ला संकल्प पत्र’ में इस वर्ग के लिए की गई घोषणाएं ममता दीदी की काट खोजने के प्रयास के लिए ही लाई गई हैं।

सूत्रों के मुताबिक़ ममता बनर्जी के इस चुनावी तीर से भाजपा को अपना सपना बिखरने तक का भय सताने लगा था। यही कारण है कि पार्टी ने अंतिम क्षणों में राज्य की 49 फीसदी महिला वोटरों को रिझाने के लिए उसने महिलाओं के लिए नौकरियों में 33 फीसदी आरक्षण, केजी से पीजी (शुरुआती शिक्षा से लेकर परास्नातक तक) तक की शिक्षा मुफ्त करने और उनकी बसों में यात्रा को पूरी तरह मुफ्त करने का बड़ा लोकलुभावन दांव खेला है, जबकि इसी समय चल रहे अन्य चार चुनावी राज्यों या भाजपा शासित किसी भी राज्य में पार्टी ने इस तरह का कोई दांव नहीं खेला है।

इसके आलावा भाजपा ने पहली कैबिनेट मीटिंग में ही सीएए कानून लागू करने, प्रति किसान परिवार 10 हजार रुपये की आर्थिक सहायता करने, मछुआरों के परिवार को छह हजार रुपये की सहायता करने का वायदा किया है। पार्टी ने ओबीसी वर्ग में नये समुदायों को साथ लाने जैसा आरक्षण का दांव भी खेला है जो बंगाल में उसकी राह आसान कर सकते हैं।    



पार्टी का मानना है कि इस रणनीति से आरक्षित 84 सीटों का एक बड़ा हिस्सा उसके साथ आ जाता है, तो मुस्लिम आबादी के कमजोर प्रतिनिधित्व वाली बाकी की सामान्य सीटों को साथ मिलाकर इस बार ममता की सत्ता को चुनौती दी जा सकती है। पार्टी इस समय इसी अभियान को आगे बढ़ाने में जुटी हुई है। 

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