{"_id":"69c8d036b2dfdf2f1f05c336","slug":"west-bengal-assembly-elections-adhikari-factor-tamluk-kanthi-suvendu-adhikari-2026-03-29","type":"story","status":"publish","title_hn":"मेदिनीपुर का चुनावी संग्राम: अधिकारी परिवार का गढ़ ढहाएगी TMC या खिलेगा कमल? शुभेंदु पर टिकीं सबकी नजरें","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
मेदिनीपुर का चुनावी संग्राम: अधिकारी परिवार का गढ़ ढहाएगी TMC या खिलेगा कमल? शुभेंदु पर टिकीं सबकी नजरें
Sun, 29 Mar 2026 12:40 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, कोलकाता।
पीटीआई, कोलकाता।
Published by: राकेश कुमार
Updated Sun, 29 Mar 2026 12:40 PM IST
सार
पश्चिम बंगाल की सियासत में 'अधिकारी परिवार' और 'मेदिनीपुर' दो ऐसे नाम हैं जिन्हें अलग करके नहीं देखा जा सकता। यहां इस बार का चुनावी दंगल और भी दिलचस्प हो गया है। दरअसल, पूर्व केंद्रीय मंत्री शिशिर अधिकारी के परिवार का पाला बदलना मेदिनीपुर जिले की तमलुक, कांथी उत्तर और कांथी दक्षिण विधानसभा सीट पर सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है।
विज्ञापन
शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी
- फोटो : @अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
पश्चिम बंगाल में सत्ता की चाबी अक्सर ग्रामीण इलाकों से होकर गुजरती है और जब बात पूर्व मेदिनीपुर जिले की हो, तो सियासी पारा खुद-ब-खुद चढ़ जाता है। इस बार के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा कौतूहल 'अधिकारी परिवार' के दबदबे और उनके बदले हुए सियासी वफादारी को लेकर है। इन इलाकों में पूर्व केंद्रीय मंत्री शिशिर अधिकारी के परिवार का दबदबा कांग्रेस और वामपंथ विरोधी आंदोलन के समय से रहा है। बाद में यह परिवार ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का सबसे मजबूत स्तंभ बना और अब यह पूरी तरह भाजपा के साथ खड़ा है।
शिशिर अधिकारी के परिवार का प्रभाव
इस परिवार में शिशिर अधिकारी के अलावा उनके बेटे विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी, पूर्व सांसद दिव्येंदु अधिकारी और कांथी लोकसभा से सांसद सौमेंदु अधिकारी शामिल हैं। कहीं न कहीं, इसी वजह से तमलुक, कांथी उत्तर और कांथी दक्षिण जैसे तीन हाई-प्रोफाइल सीट इस बार सबसे बड़े सियासी अखाड़े में तब्दील हो चुकी हैं।
कैसे चलता है अधिकारी परिवार का सिक्का?
बंगाल की राजनीति में 'अधिकारी परिवार' का दबदबा किसी रियासत जैसा है, जिसकी जड़ें पूर्वी मेदिनीपुर की मिट्टी में बहुत गहरी हैं। इस वर्चस्व की शुरुआत शिशिर अधिकारी ने दशकों पहले नगर पालिका स्तर से की थी, लेकिन इसे असली पहचान 2007 के नंदीग्राम आंदोलन से मिली। उस वक्त शुभेंदु अधिकारी ने किसानों की जमीन बचाने के लिए जो लड़ाई लड़ी, उसने वामपंथी सरकार की चूलें हिला दीं और ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुंचाया। तब से इस परिवार ने इलाके के हर बूथ और स्थानीय संगठन पर ऐसी पकड़ बनाई कि यहां का वोटर उम्मीदवार से ज्यादा 'अधिकारी परिवार' के नाम पर मुहर लगाने लगा।
विज्ञापन
इस दबदबे का दूसरा बड़ा कारण परिवार का सत्ता के केंद्रों पर सीधा नियंत्रण है। पिता शिशिर अधिकारी और उनके तीनों बेटे, शुभेंदु, दिब्येंदु और सौमेंदु, एक साथ सांसद, विधायक, मंत्री और नगर पालिका अध्यक्ष जैसे ऊंचे पदों पर काबिज रहे हैं। वर्षों तक जिला परिषद और को-ऑपरेटिव बैंकों की कमान इनके हाथों में रहने से इनका स्थानीय नेटवर्क इतना मजबूत हो गया कि पार्टी चाहे TMC हो या भाजपा, पूर्वी मेदिनीपुर में राजनीतिक हवा आज भी इसी परिवार के इशारे पर बदलती है। यही वजह है कि ममता बनर्जी से अलग होने के बाद भी यह परिवार भाजपा के लिए बंगाल के इस हिस्से में सबसे बड़ा पावर सेंटर बना हुआ है।
यह भी पढ़ें: Mann Ki Baat: पीएम मोदी बोले- 'हमारे पड़ोस में भीषण युद्ध चल रहा है'; अफवाहों से बचें, लोग संयम बनाए रखें
तमलुक: जहां बेहद कम है जीत-हार का अंतर
तमलुक विधानसभा सबसे संवेदनशील सीट मानी जा रही है। 2021 के चुनाव में यहां तृणमूल कांग्रेस के डॉक्टर सौमेन कुमार महापात्र ने भाजपा के हरेकृष्ण बेरा को महज 793 वोटों के मामूली अंतर से हराया था। हार-जीत का यह बारीक अंतर बताता है कि यहां हवा कभी भी बदल सकती है। इस बार टीएमसी ने अपनी रणनीति बदलते हुए महापात्र की जगह दीपेंद्र नारायण रॉय को मैदान में उतारा है। वहीं, भाजपा ने एक बार फिर हरेकृष्ण बेरा पर ही भरोसा जताया है। वामपंथी दल (CPI) की तरफ से नबेंदु घड़ा मैदान में हैं। कांग्रेस ने अभी तक यहां अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
अधिकारी परिवार का असली 'पावर सेंटर' कांथी
कांथी सब-डिवीजन को हमेशा से अधिकारी परिवार का राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा है। 2020-21 में जब सुवेंदु अधिकारी भाजपा में शामिल हुए, तो यह सिर्फ एक नेता का दलबदल नहीं था, बल्कि जमीन पर काम करने वाले एक पूरे राजनीतिक इकोसिस्टम का ट्रांसफर था।
2021 में कांथी उत्तर से भाजपा की सुमिता सिन्हा ने टीएमसी के तरुण कुमार जाना को 9,330 वोटों से हराया था। इस बार भाजपा ने सुमिता सिन्हा को ही रिपीट किया है, जबकि टीएमसी ने देबाशीष भुइयां को टिकट दिया है। सीपीएम की तरफ से सुतनु मैती मैदान में हैं। कांथी दक्षिण का इलाका इस परिवार का सबसे बड़ा नर्व सेंटर रहा है। 2021 में भाजपा के अरूप कुमार दास ने यहां 10 हजार से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की थी। भाजपा ने फिर से अरूप दास को उतारा है, जबकि टीएमसी ने तरुण कुमार जाना पर दांव लगाया है।
क्या है असली चुनौती?
शुभेंदु अधिकारी का ममता बनर्जी के खास सिपहसालार से लेकर बंगाल में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा बनने तक का सफर काफी नाटकीय रहा है। अधिकारी परिवार की वजह से भाजपा को इस इलाके में एक बना-बनाया मजबूत कैडर मिल गया है। दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस इस इलाके में नए सिरे से अपना संगठन खड़ा कर रही है। इतना ही नहीं, दीदी की पार्टी सरकारी योजनाओं के भरोसे जनता का दिल जीतने की कोशिश में है।
वामपंथी दल और कांग्रेस भी अगर कुछ वोट काटने में कामयाब रहे, तो तमलुक जैसे नजदीकी मुकाबले वाली सीटों पर पूरा खेल पलट सकता है। राज्य की 294 विधानसभा सीटों के लिए दो चरणों में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे, जबकि नतीजों का एलान 4 मई को होगा। अब देखना यह है कि अधिकारी परिवार का यह दबदबा कायम रहता है या नहीं।
विज्ञापन
शिशिर अधिकारी के परिवार का प्रभाव
इस परिवार में शिशिर अधिकारी के अलावा उनके बेटे विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी, पूर्व सांसद दिव्येंदु अधिकारी और कांथी लोकसभा से सांसद सौमेंदु अधिकारी शामिल हैं। कहीं न कहीं, इसी वजह से तमलुक, कांथी उत्तर और कांथी दक्षिण जैसे तीन हाई-प्रोफाइल सीट इस बार सबसे बड़े सियासी अखाड़े में तब्दील हो चुकी हैं।
विज्ञापन
कैसे चलता है अधिकारी परिवार का सिक्का?
बंगाल की राजनीति में 'अधिकारी परिवार' का दबदबा किसी रियासत जैसा है, जिसकी जड़ें पूर्वी मेदिनीपुर की मिट्टी में बहुत गहरी हैं। इस वर्चस्व की शुरुआत शिशिर अधिकारी ने दशकों पहले नगर पालिका स्तर से की थी, लेकिन इसे असली पहचान 2007 के नंदीग्राम आंदोलन से मिली। उस वक्त शुभेंदु अधिकारी ने किसानों की जमीन बचाने के लिए जो लड़ाई लड़ी, उसने वामपंथी सरकार की चूलें हिला दीं और ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुंचाया। तब से इस परिवार ने इलाके के हर बूथ और स्थानीय संगठन पर ऐसी पकड़ बनाई कि यहां का वोटर उम्मीदवार से ज्यादा 'अधिकारी परिवार' के नाम पर मुहर लगाने लगा।
विज्ञापन
इस दबदबे का दूसरा बड़ा कारण परिवार का सत्ता के केंद्रों पर सीधा नियंत्रण है। पिता शिशिर अधिकारी और उनके तीनों बेटे, शुभेंदु, दिब्येंदु और सौमेंदु, एक साथ सांसद, विधायक, मंत्री और नगर पालिका अध्यक्ष जैसे ऊंचे पदों पर काबिज रहे हैं। वर्षों तक जिला परिषद और को-ऑपरेटिव बैंकों की कमान इनके हाथों में रहने से इनका स्थानीय नेटवर्क इतना मजबूत हो गया कि पार्टी चाहे TMC हो या भाजपा, पूर्वी मेदिनीपुर में राजनीतिक हवा आज भी इसी परिवार के इशारे पर बदलती है। यही वजह है कि ममता बनर्जी से अलग होने के बाद भी यह परिवार भाजपा के लिए बंगाल के इस हिस्से में सबसे बड़ा पावर सेंटर बना हुआ है।
यह भी पढ़ें: Mann Ki Baat: पीएम मोदी बोले- 'हमारे पड़ोस में भीषण युद्ध चल रहा है'; अफवाहों से बचें, लोग संयम बनाए रखें
तमलुक: जहां बेहद कम है जीत-हार का अंतर
तमलुक विधानसभा सबसे संवेदनशील सीट मानी जा रही है। 2021 के चुनाव में यहां तृणमूल कांग्रेस के डॉक्टर सौमेन कुमार महापात्र ने भाजपा के हरेकृष्ण बेरा को महज 793 वोटों के मामूली अंतर से हराया था। हार-जीत का यह बारीक अंतर बताता है कि यहां हवा कभी भी बदल सकती है। इस बार टीएमसी ने अपनी रणनीति बदलते हुए महापात्र की जगह दीपेंद्र नारायण रॉय को मैदान में उतारा है। वहीं, भाजपा ने एक बार फिर हरेकृष्ण बेरा पर ही भरोसा जताया है। वामपंथी दल (CPI) की तरफ से नबेंदु घड़ा मैदान में हैं। कांग्रेस ने अभी तक यहां अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
अधिकारी परिवार का असली 'पावर सेंटर' कांथी
कांथी सब-डिवीजन को हमेशा से अधिकारी परिवार का राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा है। 2020-21 में जब सुवेंदु अधिकारी भाजपा में शामिल हुए, तो यह सिर्फ एक नेता का दलबदल नहीं था, बल्कि जमीन पर काम करने वाले एक पूरे राजनीतिक इकोसिस्टम का ट्रांसफर था।
2021 में कांथी उत्तर से भाजपा की सुमिता सिन्हा ने टीएमसी के तरुण कुमार जाना को 9,330 वोटों से हराया था। इस बार भाजपा ने सुमिता सिन्हा को ही रिपीट किया है, जबकि टीएमसी ने देबाशीष भुइयां को टिकट दिया है। सीपीएम की तरफ से सुतनु मैती मैदान में हैं। कांथी दक्षिण का इलाका इस परिवार का सबसे बड़ा नर्व सेंटर रहा है। 2021 में भाजपा के अरूप कुमार दास ने यहां 10 हजार से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की थी। भाजपा ने फिर से अरूप दास को उतारा है, जबकि टीएमसी ने तरुण कुमार जाना पर दांव लगाया है।
क्या है असली चुनौती?
शुभेंदु अधिकारी का ममता बनर्जी के खास सिपहसालार से लेकर बंगाल में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा बनने तक का सफर काफी नाटकीय रहा है। अधिकारी परिवार की वजह से भाजपा को इस इलाके में एक बना-बनाया मजबूत कैडर मिल गया है। दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस इस इलाके में नए सिरे से अपना संगठन खड़ा कर रही है। इतना ही नहीं, दीदी की पार्टी सरकारी योजनाओं के भरोसे जनता का दिल जीतने की कोशिश में है।
वामपंथी दल और कांग्रेस भी अगर कुछ वोट काटने में कामयाब रहे, तो तमलुक जैसे नजदीकी मुकाबले वाली सीटों पर पूरा खेल पलट सकता है। राज्य की 294 विधानसभा सीटों के लिए दो चरणों में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे, जबकि नतीजों का एलान 4 मई को होगा। अब देखना यह है कि अधिकारी परिवार का यह दबदबा कायम रहता है या नहीं।