चुनावी आकलन: भाजपा को टीएमसी ने नहीं, वामदलों और कांग्रेस की रणनीति ने हराया, आंकड़े बयां कर रहे हैं सच्चाई
दिल्ली और पश्चिम बंगाल में पूरा गैर-भाजपाई वोट बंटने नहीं पाया। इसका परिणाम हुआ कि भारी प्रचार के बावजूद भाजपा यहां जीत हासिल करने में नाकाम रही। लेकिन इस फॉर्मूले को राष्ट्रीय स्तर पर आजमाने में हैं कई अड़चनें...
विस्तार
भाजपा की प्रचंड प्रचार की रणनीति भी ममता बनर्जी को रोक नहीं पाई। वे भारी बहुमत से जीत हासिल कर एक बार फिर से पश्चिम बंगाल की सत्ता संभालने की तैयारी कर रही हैं। सीधे तौर पर यही लगता है कि ममता बनर्जी की जमीनी संघर्ष वाली वाली छवि भाजपा के भारी-भरकम योद्धाओं पर भारी पड़ी और वे विजयी रहीं। लेकिन पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों को मिले वोट शेयर की तुलना करें तो समझ आता है कि टीएमसी की यह जीत उसकी अपनी जीत से कहीं ज्यादा उस रणनीति की जीत है, जिसके तहत विपक्ष ने वोटों को बिखरने नहीं दिया।
आंकड़े बताते हैं कि अगर वामदलों और कांग्रेस ने चुनाव में अपना पूरा जोर लगाया होता और 10 प्रतिशत भी ज्यादा वोट हासिल किया होता तो चुनाव में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच कांटे की लड़ाई होती जिसका विजेता कोई भी हो सकता था।
क्या कहते हैं आंकड़े
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 (West Bengal Assembly Election, 2021) में तृणमूल कांग्रेस को 47.9 फीसदी मत प्राप्त हुए हैं। वहीं, भाजपा को 38.1 फीसदी वोट प्राप्त हुआ है। इसी चुनाव में वाम दलों को केवल 4.6 फीसदी मत प्राप्त हुए हैं जो उनके पिछले चुनावों के प्रदर्शन से 15.1 फीसदी कम है। इसी चुनाव में कांग्रेस को केवल तीन प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं जो उसके पिछले प्रदर्शन से 9.3 फीसदी कम है। वाम दलों और कांग्रेस को मिलाकर उन्हें पिछले चुनाव के मुकाबले लगभग 24.4 फीसदी मत कम प्राप्त हुए हैं।
अगर अगर वाम दलों और कांग्रेस ने रणनीतिक तौर पर अपने को चुनाव में पीछे न किया होता और 10 फीसदी भी ज्यादा वोट शेयर हासिल किया होता, तो तृणमूल कांग्रेस का वोट शेयर 47.9 फीसदी से सीधे 10 फीसदी कम होकर 38-39 फीसदी के आसपास होता। यह ठीक वही वोट शेयर हैं, जिसे खुद भाजपा ने भी हासिल किया है। अगर यह परिस्थिति बनती तो भाजपा और तृणमूल कांग्रेस लगभग बराबरी की लड़ाई लड़ते, जिसमें सत्ता किसी के भी हाथ लग सकती थी।
लेकिन आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस और वाम दल-कांग्रेस के बीच पर्दे के पीछे हुए समझौते ने भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। लेकिन भाजपा का मानना है कि यह स्थिति आज नहीं तो कल उसके सामने आनी ही है, और वह उसके लिए स्वयं को आज से ही तैयार करने में जुटी हुई है।
भाजपा को घेरना पहली चुनौती
तो क्या दिल्ली और पश्चिम बंगाल के मॉडल ने विपक्ष को भाजपा से मुकाबला करने का सफल ‘आइडिया’ दे दिया है? क्या विपक्ष इसी मॉडल के सहारे उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव और वर्ष 2024 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुकाबला करेगा और सफल रहेगा? इन सवालों के जवाब में कांग्रेस के एक दिग्गज नेता का कहना है कि अभी उनकी पहली प्राथमिकता भाजपा को रोकना है। बाकी बातों पर बाद में विचार कर लिया जायेगा।
भाजपा नेता प्रेम शुक्ला ने अमर उजाला से कहा कि उनकी पार्टी यह जानती है कि उसे एक दिन ‘भाजपा बनाम पूरा विपक्ष’ की लड़ाई लड़ने की जरूरत पड़ेगी। पार्टी के शीर्ष नेता अमित शाह यह बात कई बार स्पष्ट कर भी चुके हैं। इस स्थिति का मुकाबला करना तभी संभव होगा जब भाजपा अकेले दम पर न्यूनतम 51 फीसदी मत प्राप्त करे। इसके लिए समाज के ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपना वैचारिक आधार बढ़ाना होगा जिसके लिए पार्टी लगी हुई है।