Waqf Bill: फिर चूक गया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, मुसलमानों को आधुनिकता की राह दिखाने में रह गया पीछे
अहम मुद्दों पर अपने स्टैंड के कारण उसने लोगों के बीच अपनी छवि आधुनिक प्रगतिशील विचारों वाले संगठन की बजाय परंपरावादी सोच वाले संगठन की बना ली। कुछ लोग इसे मुसलमानों के बीच धार्मिक कट्टरता बढ़ने का कारण भी मानते हैं।
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विस्तार
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) की स्थापना आज से 52 साल पहले अप्रैल 1972 में हैदराबाद में हुई थी। स्थापना के समय मुसलमानों के बीच इस्लामिक कानूनों (शरिया) को बढ़ावा देना इसका मूल उद्देश्य बताया गया था। माना यह भी गया था कि आधुनिक समय की चुनौतियों और बदलावों को देखते हुए यह मुसलमानों को नई राह दिखाने का काम करेगा। मुसलमानों के मामले में अपनी मुखर आवाज के कारण मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जल्द ही देश के मुसलमानों की प्रतिनिधि आवाज के रूप में देखा जाने लगा। अयोध्या के राम मंदिर और बाबरी ढांचे के कानूनी विवाद में उसकी सक्रिय भूमिका ने आम मुसलमानों के बीच उसकी इस साख मजबूत करने का काम किया कि वह मुसलमानों के हितों के लिए हर लड़ाई लड़ने के लिए प्रतिबद्ध है।
लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अब तक के 52 साल के जीवन काल में कई ऐसे मौके आ चुके हैं जब इसके निर्णयों की कड़ी आलोचना की गई। आरोप हैं कि उसने अपने निर्णयों के माध्यम से देश के आम मुसलमानों को आधुनिकता की राह दिखाने की बजाय उनके बीच धार्मिक कट्टरता को बढ़ाने का ही काम किया है। शाहबानो प्रकरण (1978-1985) से लेकर तीन तलाक तक के मामलों में उसकी भूमिका महिला विरोधी ही मानी गई।
इन अहम मुद्दों पर अपने स्टैंड के कारण उसने लोगों के बीच अपनी छवि आधुनिक प्रगतिशील विचारों वाले संगठन की बजाय परंपरावादी सोच वाले संगठन की बना ली। कुछ लोग इसे मुसलमानों के बीच धार्मिक कट्टरता बढ़ने का कारण भी मानते हैं। विशेषकर दक्षिणपंथी हिंदू विचारधारा के लोग मानते हैं कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुसलमानों को आधुनिकता की राह दिखाने की बजाय उनके बीच धार्मिक कट्टरता बढ़ाने का ही काम किया है। केंद्र सरकार द्वारा वक्फ बोर्ड कानूनों में किए जा रहे बदलावों का मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने जिस तरह विरोध किया है, उसे भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है।
इसके पूर्व भी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कई निर्णय आलोचना के केंद्र में रहे हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बाल विवाह विरोधी कानून का भी विरोध कर चुका है। उसने बाल विवाह को सही ठहराने के पक्ष में तर्क दिए थे। (कई हिंदूवादी संगठनों और नेताओं ने भी बाल विवाह के पक्ष में तर्क दिए थे।) 2009 में जब कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने सभी बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा कानून लाया, तब भी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने यह कहते हुए विरोध किया कि अनिवार्य आधुनिक शिक्षा से मदरसा शिक्षा पद्धति खत्म हो सकती है। बोर्ड के इस विचार को भी मुस्लिम समुदाय को आधुनिकता की ओर ले जाने की बजाय उसे धार्मिक जकड़न में बनाए रखने के एक प्रयास के तौर पर देखा गया।
बदलने को तैयार नहीं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में 51 मुख्य धार्मिक नेताओं के साथ-साथ 201 अन्य सदस्य होते हैं। लेकिन आरोप है कि इस संगठन में सभी शीर्ष पद स्वयं को विदेशी मूल का समझने वाले अशराफ मुसलमानों (मुसलमानों की उच्च जातियां) के लिए अघोषित तौर पर आरक्षित हैं। देश के पसमांदा मुसलमानों के लिए इसमें कोई जगह नहीं है, जबकि पसमांदा समुदाय कुल मुसलमानों की आबादी में 90 प्रतिशत से अधिक की हिस्सेदारी रखते हैं।
पसमांदा अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक तरह से विदेशी मुसलमानों के द्वारा देशी मुसलमानों के ऊपर राज करने जैसा कार्य है। वे इस्लामिक नीतियां तय करते हैं और उन्हें इसका पालन करना होता है। धार्मिक मामला होने के कारण मुस्लिम समाज के अंदर से इसको कोई चुनौती भी नहीं दी जाती। इन कार्यकर्ताओं के अनुसार, केंद्र-राज्य सरकारें भी मुसलमानों के आंतरिक मामलों की बेहतर समझ न होने के कारण अशराफ मुसलमानों की इस आवाज को ही पूरे देश के मुसलमानों की आवाज समझती हैं और उसी के अनुसार नीतियां बनाती हैं, जबकि असलियत इससे कोसों दूर है।
महिलाओं की भागीदारी भी नहीं
लंबे समय तक मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में महिलाओं को जगह नहीं दी गई। हालांकि, बोर्ड से जुड़े कुछ लोगों का दावा है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के 201 सदस्यों में अब 25 महिलाओं को स्थान दिया जाने लगा है। लेकिन मुस्लिम महिला अधिकार कार्यकर्ता इससे सहमत नहीं हैं। इसी कारण मुसलमान महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने में असफल रहने का आरोप लगाते हुए मुस्लिम महिलाओं ने ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड बना लिया है।
शिया मुसलमानों का भी आरोप है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में सुन्नी मुसलमानों का दबदबा है। इसमें उनकी आवाज उचित तरीके से नहीं सुनी जाती। अपने अधिकारों की रक्षा के लिए शियाओं ने भी ऑल इंडिया शिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बना लिया है। इसकी आवाज शिया मुसलमानों के बीच ज्यादा गंभीरता से सुनी जाती है।
AIMPLB को पूरे मुसलमानों की तरफ से बात करने का अधिकार नहीं
इस्लामिक मामलों के जानकार और पसमांदा मुस्लिम अधिकार कार्यकर्ता फैयाज अहमद फैजी ने अमर उजाला से कहा कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को पूरे देश के मुसलमानों की ओर से बात करने का नैतिक अधिकार नहीं है। यह लोकतांत्रिक संगठन नहीं है। इसमें केवल ऊंची जातियों के अशराफ मुसलमानों का कब्जा है, जबकि देश के 90 फीसदी मुसलमानों की हिस्सेदारी रखने वाले पसमांदा मुसलमानों को इसमें जगह नहीं दिया जाता। सामाजिक बराबरी की बात न करने के कारण इसकी भावना संविधान के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने कहा कि, एक बार जिस व्यक्ति को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में जगह मिलती है, वह जीवन पर्यंत इस पद पर बना रहता है। यह भी लोकतांत्रिक नियमों के अनुरूप नहीं है। फैजी ने कहा कि देश की आधी आबादी महिलाओं की है, लेकिन बोर्ड में महिलाओं को स्थान नहीं दिया जाता। काफी आलोचना के बाद अब बोर्ड में एक-दो मुस्लिम महिलाओं को जगह दी गई है, लेकिन वे भी बोर्ड में बैठे अशराफ मुसलमानों के परिवार की ही महिलाएं होती हैं जो स्वतंत्र रूप से महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठा पातीं।
फैयाज अहमद फैजी ने कहा कि वक्फ बोर्ड में पसमांदा मुसलमानों की हिस्सेदारी तय होने से यह निश्चित हो जाएगा कि अब वक्फ संपत्तियों से प्राप्त आय को गरीब पसमांदा मुसलमानों पर खर्च किया जाएगा। इससे पसमांदा मुसलमानों को ही सबसे ज्यादा लाभ होगा क्योंकि मुसलमानों में सबसे गरीब यही लोग होते हैं।
'ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जातिवाद को देता है बढ़ावा'
फैजी ने कहा कि, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने 'माजमूए कवानीने इस्लामी' नाम की एक पुस्तक प्रकाशित की है। यह इस संगठन की आधिकारिक पुस्तक है। इसमें स्पष्ट तौर पर यह व्यवस्था दी गई है कि किस जाति का मुसलमान किस-किस जाति की मुस्लिम बेटी से विवाह कर सकता है। नीची जाति यानी पसमांदा मुसलमानों को ऊंची जाति के मुसलमानों के बीच अपनी बेटी ब्याहने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट जातिगत विचार है जिसे देश का संविधान अनुमति नहीं देता, लेकिन इसके बाद भी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की यह पुस्तक आम मुसलमानों के बीच एक आदर्श के तौर पर काम करती है और वैवाहिक मामलों के विवादों के निपटारे में कानून की तरह काम करती है। फैजी के अनुसार, ऐसे संविधान विरोधी विचारों के कारण ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को पूरे देश के मुसलमानों की ओर से बात करने का संवैधानिक और नैतिक अधिकार नहीं है।
AIMPLB ने सरकार को दिया मौका: पसमांदा कार्यकर्ता
तीन तलाक के मामले में यही कहा गया था कि AIMPLB ने केंद्र सरकार को मौका दिया। यदि उसने समय रहते मुसलमानों के बीच एक बेहतर आधुनिक तलाक का मसौदा पेश किया होता और मुसलमान औरतों को तीन तलाक के दंश से छुटकारा मिल गया होता तो केंद्र सरकार को मुसलमानों के आंतरिक मामलों में दखल करने का मौका न मिलता। अब वक्फ बोर्ड के मामले में भी यही कहा जा रहा है।
पसमांदा कार्यकर्ता गुलाम अली सरवर ने कहा कि AIMPLB को पहले ही इस बात पर ध्यान देना चाहिए था कि वक्फ बोर्ड की संपत्तियों की उचित देखभाल हो, उसका दुरुपयोग न हो, और पसमांदा गरीब मुसलमानों को इसका लाभ मिले। लेकिन AIMPLB ने समय रहते अपनी यह जिम्मेदारी नहीं निभाई जिसके कारण आज केंद्र सरकार को दखल देने का अवसर मिल गया। यदि वे समय रहते वक्फ में सुधार करते तो केंद्र सरकार को आज यह अवसर न मिलता।
कानून के घेरे में आने से बचता है बोर्ड: अंबर जैदी
मुस्लिम महिला सामाजिक अधिकार कार्यकर्ता अंबर जैदी ने अमर उजाला से कहा कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस्लाम और मुसलमान के नाम पर कानून के दायरे में आने से बचने की कोशिश करता है। तीन तलाक का मामला हो या वक्फ बोर्ड का, वह इसे मुसलमानों का आंतरिक मामला बताकर देश के कानूनों की परिधि में आने से बचता है। उन्होंने कहा कि यह देश की सुरक्षा और शांति के लिए ठीक नहीं है और अब इस तरह की सोच स्वीकार्य नहीं है।
अंबर जैदी ने कहा कि वक्फ बोर्ड में बड़ा घोटाला होता है। वक्फ की जमीन कब्जा करने के लिए कोई व्यक्ति बोर्ड के अधिकारियों से सांठगांठ कर लेता है। चूंकि वक्फ से जुड़ी संपत्तियों का कानूनी विवाद वक्फ बोर्ड में ही दाखिल किया जा सकता है, इसी वक्फ बोर्ड में केस की सुनवाई होती है। लेकिन अधिकारियों से सांठगांठ के कारण वक्फ ऐसी संपत्ति पर से अपना दावा छोड़ देता है और वह संपत्ति उस व्यक्ति की हो जाती है। उन्होंने कहा कि यह अधिकारियों से मिलजुलकर वक्फ की संपत्ति की खुली लूट है। इसे सभी जानते हैं, लेकिन इसके बाद भी इसे जारी रखा गया था। लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकेगा। वक्फ कानून में बदलाव का विरोध इसी कारण से किया जा रहा है।
पसमांदा मुसलमान कर रहे स्वागत
केंद्र सरकार ने नए वक्फ कानूनों में वक्फ बोर्ड में पसमांदा मुसलमानों को हिस्सेदारी देना अनिवार्य कर दिया है। यही कारण है कि देश के पसमांदा मुसलमान वक्फ बोर्ड कानूनों में बदलाव का स्वागत कर रहे हैं। वे जगह-जगह मिठाई बांटकर अपनी खुशी का इजहार कर रहे हैं। उनके अनुसार, उनके लिए यह नई आजादी पाने जैसा है। जिस वक्फ बोर्ड में उनके अधिकारों की कोई बात नहीं होती थी, अब वहां पर बैठकर उनके अधिकारों की बात होना उनके लिए आजादी की एक नई सुबह में सांस लेने जैसा है।
'वक्फ बोर्ड में बैठे अधिकारियों की संपत्ति की हो जांच'
पसमांदा मुस्लिम समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मंत्री अनीस मंसूरी ने अमर उजाला से कहा कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और सभी वक्फ बोर्ड में केवल अशराफ मुसलमानों का कब्जा है। वे वक्फ की संपत्ति की मनमानी तरीके से लूट करते हैं और गरीब पसमांदाओं को इसका लाभ नहीं मिलता। लेकिन सरकार ने वक्फ बोर्ड के उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों की संपत्ति की जांच करने का कोई काम आज तक नहीं किया। यदि वक्फ बोर्ड में व्याप्त भ्रष्टाचार को पूरी तरह समाप्त करना है तो इसमें बैठे लोगों का एक निश्चित कार्यकाल होना चाहिए और उसके बाद समय-समय पर उनका चुनाव होना चाहिए। साथ ही, वक्फ बोर्ड के उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों की संपत्ति की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
आरोप सही नहीं: AIMPLB
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. एसक्यूआर इलियास ने अमर उजाला से कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर लगने वाले ये आरोप सही नहीं हैं। उन्होंने कहा कि AIMPLB में सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया को समझना चाहिए। इसमें सभी मुसलमान सांसद आपस में मिलकर दो मुस्लिम सांसदों को AIMPLB का सदस्य बनाते हैं। इसी तरह राज्यों के बोर्ड में सभी मुसलमान विधायक आपस में मिल बैठकर आपसी सहमति से दो विधायकों को AIMPLB में भेजते हैं। इसी तरह समाज के अलग-अलग वर्गों से सदस्यों का चयन किया जाता है। यह चयनकर्ताओं पर निर्भर करता है कि वे पुरुष या महिला किसे चुनकर भेजते हैं। इसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की कोई भूमिका नहीं होती।
2013 में हुए संशोधन के बाद वक्फ बोर्डों में भी महिलाओं को भागीदारी दी जा रही है। दिल्ली के पिछले वक्फ बोर्ड में भी एक महिला सदस्य कार्य कर रही थी। इसके चेयरमैन को तो राज्य सरकारें भेजती हैं। वे चाहें तो अपने तौर पर महिला चेयरमैन को भेज सकती हैं। इसमें कहीं कोई भेद नहीं है।
डॉ. एसक्यूआर इलियास ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर यह आरोप लगाना सही नहीं है कि वह मुसलमानों को आधुनिकता की ओर ले जाने की बजाय धार्मिक कट्टरता की ओर झोंक रहा है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कार्य अदालत या संसद-विधानसभा द्वारा पारित किए जा रहे किसी ऐसे निर्णय का विरोध करना है जो शरीयत के खिलाफ जा रहा है। ऐसे मामलों में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड शरीयत के अनुसार बदलाव कराने का प्रयास करता है।
लेकिन जहां तक आधुनिकता की बात है, बोर्ड की अनेक शाखाएं मुसलमान बच्चों के बीच आधुनिक शिक्षा दिलाने के कार्य कर रही हैं। इसी तरह संगठन से जुड़े कई लोग आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े हैं। बोर्ड मुसलमानों को कोई भी आधुनिक शिक्षा हासिल करने का विरोध नहीं करता है। ऐसे में उस पर आधुनिकता का विरोधी होने का आरोप लगाना सही नहीं है।