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पर्यटन कारोबार में ग्रामीणों की बढ़ेगी भागीदारी, आय में होगी बढ़ोतरी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 03 Oct 2018 05:00 AM IST
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पर्यटन व्यवसाय में ग्रामीणों की भागीदारों बढ़ाने के लिए केरल के दुनियाभर में चर्चित रिस्पांसिबल टूरिज्म मॉडल को ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन स्थलों के लिए मशहूर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और बिहार जैसे राज्यों में भी आजमाया जाएगा। इसके लिए केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय केरल के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क में है, ताकि इस परियोजना को यहां भी लागू किया जा सके।
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केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अमर उजाला से बातचीत में बताया कि यदि इस परियोजना को बौद्ध और रामायण सर्किट से जुड़े पर्यटन स्थलों पर लागू किया जाता है, तो एक तरफ पर्यटकों को ग्रामीण पर्यटन का आनंद मिलेगा, जबकि दूसरी तरफ ग्रामीणों को आय का एक अतिरिक्त जरिया मिलेगा। उल्लेखनीय है कि इस परियोजना को सबसे पहले केरल के कुमरकोम में अपनाया गया था और इस समय यह 70 से भी ज्यादा स्थानों में सफलतापूर्वक चल रहा है।
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सबको भागीदार बनाने का प्रयास
इस परियोजना को शुरू करने वाले तथा इस समय केरल सरकार के रिस्पांसिबल टूरिज्म मिशन के समन्वयक रूपेश कुमार के. का कहना है कि आमतौर पर पर्यटन कारोबार में सरकार, होटल चलाने वाले, बस-टैक्सी या परिवहन के अन्य साधन उपलब्ध कराने वाले, मनोरंजक या सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश करने वाले तो भागीदार (स्टेकहोल्डर) बन जाते हैं, लेकिन ग्रामीणों की भागीदारी इसमें सुनिश्चित नहीं हो पाती। इसलिए रिस्पांसिबल टूरिज्म परियोजना का खाका खींचते समय सभी को भागीदार बनाने का प्रयास किया गया है।
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इस मॉडल में मछली पकड़ने वाले, नाव चलाने वाले, घरों में अपना काम करने वाली महिलाओं से लेकर रस्सी बांटने वाले, पेड़ से नारियल तोड़ने वाले, नारियल के पेड़ से टोडी निकालने वाले, बत्तख पालने करने वाले आदि सभी भागीदार हैं। पर्यटक एक शुल्क चुकाकर गांवों में इनका काम देखने आते हैं, तो उन्हें ग्रामीण जीवन की झलक मिलती है। गांव वाले इसलिए खुशी-खुशी अपना काम दिखाते हैं, क्योंकि पर्यटकों से मिली राशि का बंटवारा सभी में होता है।
यूपी, उत्तराखंड के लिए कारगर होगी योजना
केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय का मानना है कि इसी तरह की परियोजना यदि उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड के लिए बनाई जाती है, तो उसमें वहां के ग्रामीण भी शामिल हो सकेंगे। वाराणसी का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जो पर्यटक वाराणसी में गंगा घाट और सारनाथ आदि पर्यटन स्थलों को देखकर लौट जाते हैं, उनके लिए ग्रामीण जीवन की झलक दिखाने का कार्यक्रम बनाया जा सकता है।
उन्हें दिखाया जा सकता है कि बनारसी साड़ी कैसे बनती है, कैसे ककून से धागा बनाया जाता है, कैसे बनारसी साड़ी की बुनाई की जाती है, कैसे इसमें जरी का काम किया जाता है और इसकी रंगाई कैसे होती है। इसी तरह, भदोही में कालीन उद्योग को दिखाने के लिए एक परियोजना तैयार हो सकती है। वाराणसी परंपरागत रूप से काठ से बने खिलौने बनाने का भी केंद्र रहा है। ये खिलौने कैसे बनते हैं, उसे भी दिखाया जा सकता है।