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उपराष्ट्रपति ने न्यायपालिका के बढ़ते दखल का उठाया मुद्दा, कहा- संस्थाएं सीमा न लांघें

Wed, 25 Nov 2020 05:29 PM IST
मुकेश कुमार झा पीटीआई, केवडिया (गुजरात)
पीटीआई, केवडिया (गुजरात) Published by: मुकेश कुमार झा Updated Wed, 25 Nov 2020 05:29 PM IST
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Vice President M Venkaiah Naidu says Few judicial pronouncements gave distinct impression of overreach
उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू - फोटो : अमर उजाला

उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने बुधवार को कहा कि देश के तीनों अंगों में से कोई भी खुद के सर्वोच्च होने का दावा नहीं कर सकता क्योंकि संविधान ही सर्वोच्च है। उन्होंने कहा कि अदालतों के कुछ फैसलों से प्रतीत होता है कि न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ा है। 

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तीनों अंग एक-दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप किए बगैर काम करते हैं
उन्होंने कहा कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका संविधान के तहत परिभाषित अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत काम करने के लिए बाध्य हैं। दरअसल, उपराष्ट्रपति 'विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सौहार्दपूर्ण समन्वय- जीवंत लोकतंत्र की कुंजी' विषय पर अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के 80वें सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। नायडू ने कहा कि तीनों अंग एक-दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप किए बगैर काम करते हैं और सौहार्द बना रहता है।
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परस्पर सम्म्मान, जवाबदेही और धैर्य की जरूरत होती है
उन्होंने कहा कि इसमें परस्पर सम्म्मान, जवाबदेही और धैर्य की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से ऐसे कई उदाहरण हैं जब सीमाएं लांघी गईं। नायडू ने कहा कि ऐसे कई न्यायिक फैसले किए गए जिसमें हस्तक्षेप का मामला प्रतीत होता है।
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न्यायपालिका को 'सर्वोपरि कार्यपालिका' या 'सर्वोपरि विधायिका' की तरह नहीं समझना चाहिए
कुछ उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को 'सर्वोपरि कार्यपालिका' या 'सर्वोपरि विधायिका' की तरह नहीं समझना चाहिए। उपराष्ट्रपति ने कहा, 'स्वतंत्रता के बाद से उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय ने ऐसे कई फैसले दिए जिनका सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों पर दूरगामी असर हुआ। इसके अलावा इसने हस्तक्षेप कर चीजें ठीक कीं। लेकिन यदा-कदा चिंताएं जताई गईं कि क्या वे कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं।'

क्या कुछ मुद्दों को सरकार के अन्य अंगों पर वैधानिक रूप से छोड़ दिया जाना चाहिए
उन्होंने कहा, 'इस तरह की बहस है कि क्या कुछ मुद्दों को सरकार के अन्य अंगों पर वैधानिक रूप से छोड़ दिया जाना चाहिए।' नायडू ने कुछ उदाहरण देते हुए कहा कि दिवाली पर पटाखों को लेकर फैसला देने वाली न्यायपालिका कॉलेजियम के माध्यम से जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका को भूमिका देने से इंकार कर देती है। नायडू ने कहा कि कई बार विधायिका ने भी रेखा लांघी है। इसे लेकर उन्होंने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के चुनाव को लेकर 1975 में किए गए 39वें सविधान संशोधन का जिक्र किया।

लोकतंत्र में संस्थाओं के बीच विचारों में मतभेद हो सकते हैं: लोकसभा अध्यक्ष 

वहीं, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी लोकतंत्र के तीनों स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच आदर्श समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि लोकतंत्र में संस्थाओं के बीच मतांतर हो सकते हैं।

समाज के आखिरी व्यक्ति के उत्थान के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए- ओम बिरला
पीठासीन अधिकारियों के 80वें अखिल भारतीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि संविधान संसद व विधान मंडलों को जन भावनाओं के अनुरूप काम करने का आधार प्रदान करता है। उन्होंने कहा, 'जनप्रतिनिधि के रूप में हमें संवैधानिक मूल्यों के प्रति दृढ़ रहकर कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए समाज के आखिरी व्यक्ति के उत्थान के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।'

...समाधान निकाला जा सकता है- ओम बिरला
बिरला ने कहा कि लोकतंत्र की यात्रा में संस्थाओं में मतान्तर सामने आते हैं लेकिन संवैधानिक प्रावधानों व लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत प्रक्रियाओं में सुधार कर उनका समाधान निकाला जा सकता है। उन्होंने कहा, 'लोकतंत्र के तीनों स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच आदर्श समन्वय आवश्यक है। तीनों संस्थाओं का मकसद जनता के हितों का संरक्षण है तथा तीनों के पास काम करने के लिए पर्याप्त शक्तियां उपलब्ध हैं।'

हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं संविधान से ही अपनी शक्तियां प्राप्त करती हैं- ओम बिरला
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि जनप्रतिनिधि देश की जनता के हितों, चिंताओं, आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं संविधान से ही अपनी शक्तियां प्राप्त करती हैं। एक सशक्त, किंतु संवेदनशील विधायिका भी इसी संविधान की अनुपम देन है। संसद व विधान मंडलों को संविधान, जन भावनाओं के अनुरूप काम करने का आधार प्रदान करता है।

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