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गोवा: तरुण तेजपाल पर दर्ज दुष्कर्म के मामले पर 19 मई को आएगा फैसला, 2013 में हुई थी गिरफ्तारी

Wed, 12 May 2021 11:46 AM IST
Tanuja Yadav न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पणजी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पणजी Published by: Tanuja Yadav Updated Wed, 12 May 2021 11:46 AM IST
सार

तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल के खिलाफ गोवा की एक सत्र अदालत अब 19 मई को अपना फैसला सुनाएगी। इससे पहले 12 मई को फैसला सुनाने का आदेश जारी किया था।

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Verdict in tarun tejpal case sessions court adjourns the matter order to be pronounced on May 19th
तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल - फोटो : ANI

विस्तार

तहलका पत्रिका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल के खिलाफ चल रहे दुष्कर्म के मुकदमे पर कोर्ट अपना फैसला 19 मई को सुनाएगा। गोवा के एक सेशन कोर्ट में तरुण तेजपाल के खिलाफ दुष्कर्म के मामले को लेकर सुनवाई हुई, जिसके बाद पहले 12 मई को फैसला सुनाने का आदेश जारी किया गया था।

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हालांकि अब इस मामले में 19 मई को फैसला सुनाया जाएगा। बता दें कि तरुण तेजपाल पर उन्हीं के साथ काम करने वाली एक महिला ने दुष्कर्म का आरोप लगाया था। महिला ने तरुण तेजपाल पर एक पांच सितारा होटल में उनके साथ दुष्कर्म करने का आरोप लगाया था। 
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अतिरिक्त जिला अदालत 27 अप्रैल को फैसला सुनाने वाली थी, लेकिन न्यायाधीश क्षमा जोशी ने फैसला सुनाने की कार्यवाही 12 मई तक टाल दी थी। अदालत ने कहा कि फैसला सुनाने की तिथि को कोरोना वायरस महामारी के कारण आगे बढ़ाया गया है और अदालत इस दौरान केवल 15 प्रतिशत कर्मियों के साथ काम कर रही है।
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तेजपाल भारतीय दंड संहिता की धारा 341 (गलत तरीके से रोकने), 342 (रोककर रखना), 354 (गरिमा भंग करने की मंशा से प्रताड़ना), 354-ए (यौन उत्पीड़न), 354 बी (महिला पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग), 376 (2) (एफ) (ऊंचे पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा महिला के खिलाफ अपराध) और 376 (2) (के) (ऊंचे पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा बलात्कार) के तहत मुकदमे दर्ज है।


नवंबर 2013 में हुई थी गिरफ्तारी
बता दें कि तरुण तेजपाल को 30 नवंबर 2013 को गिरफ्तार किया था। 29 सितंबर 2017 को कोर्ट ने तरुण तेजपाल पर आईपीसी की कई धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया, जिसमें दुष्कर्म, शारीरिक यौन शोषण और गलत बंदी शामिल है। तेजपाल ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। अगस्त में, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों को खारिज करने से इनकार कर दिया और मामले को छह महीने के भीतर निपटाने का निर्देश दिया।

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