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Uttarakhand HC: अंग्रेजी में जवाब न दे पाने वाले अधिकारी से हाईकोर्ट नाराज, क्यों उठे सवाल; क्या हैं मानक?
Wed, 30 Jul 2025 08:14 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 30 Jul 2025 08:14 PM IST
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सार
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सुप्रीम कोर्ट पहुंचा अधिकारी के अंग्रेजी में न बोल पाने का मुद्दा।
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अमर उजाला
विस्तार
उत्तराखंड उच्च न्यायालय से जुड़ा एक मामला इस वक्त देशभर में सुर्खियों में है। दरअसल, यह मामला जुड़ा है अंग्रेजी भाषा बोलने में असमर्थता जताने वाले एक अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम) स्तर के प्रशासनिक अधिकारी से। इस बात से हाईकोर्ट इतना नाराज हो गया कि उसने एक-दूसरे मामले की सुनवाई के दौरान ही अधिकारी को लेकर सवाल उठाए और उत्तराखंड के चुनाव आयुक्त और मुख्य सचिव को नोटिस तक जारी कर दिया।
बाद में इस मामले में अधिकारी की तरफ से राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले में दखल देते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक भी लगा दी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, "अगले आदेश तक, उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा पारित दिनांक 18.07.2025 के आक्षेपित निर्णय और आदेश पर रोक रहेगी।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद कई सवाल उठने लगे हैं। मसलन- एक प्रशासनिक स्तर के अधिकारी की तरफ से अंग्रेजी में न बोल पाने के मुद्दे पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने क्या कहा और इसके पीछे क्या तर्क दिया? अदालतों में अंग्रेजी भाषा या स्थानीय भाषा बोलने की अनिवार्यता को लेकर क्या नियम हैं? स्थानीय भाषा के इस्तेमाल या इसमें कार्यवाही संचालित करने का मुद्दा क्या है? आदेश देने वाले उत्तराखंड उच्च न्यायालय के दोनों न्यायाधीश कौन हैं? आइये जानते हैं...
पहले जानें- उत्तराखंड हाईकोर्ट में क्या-क्या हुआ?
उत्तराखंड हाईकोर्ट से जुड़ा यह पूरा मामला असल में पंचायत मतदाता सूची में कुछ वोटरों के नाम शामिल किए जाने से जुड़ा है। उच्च न्यायालय की चीफ जस्टिस जी. नरेंद्र और जस्टिस आलोक माहरा की बेंच मतदाता सूची में नामों की एंट्री के लिए फैमिली रजिस्टर की वैधता को लेकर सुनवाई कर रही थी। इसी पर जब कोर्ट ने अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम) विवेक राय, जो कि नैनीताल में निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी के तौर पर तैनात हैं, से सवाल किया तो उन्होंने हिंदी में जवाब दिया।
उत्तराखंड हाईकोर्ट से जुड़ा यह पूरा मामला असल में पंचायत मतदाता सूची में कुछ वोटरों के नाम शामिल किए जाने से जुड़ा है। उच्च न्यायालय की चीफ जस्टिस जी. नरेंद्र और जस्टिस आलोक माहरा की बेंच मतदाता सूची में नामों की एंट्री के लिए फैमिली रजिस्टर की वैधता को लेकर सुनवाई कर रही थी। इसी पर जब कोर्ट ने अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम) विवेक राय, जो कि नैनीताल में निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी के तौर पर तैनात हैं, से सवाल किया तो उन्होंने हिंदी में जवाब दिया।
उत्तराखंड हाईकोर्ट की वेबसाइट पर इस केस से जुड़े दस्तावेज के मुताबिक, न्यायालय ने एडीएम से पूछा कि क्या वे अंग्रेजी नहीं जानते हैं? इस पर विवेक राय ने कहा कि वे अंग्रेजी समझ सकते हैं, लेकिन इस भाषा में बोल नहीं सकते। इसे लेकर उच्च न्यायालय ने कुछ आदेश जारी करने के साथ राज्य के चुनाव आयुक्त और मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे जांच करें कि एक अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट कैडर के अधिकारी, जो यह दावा करता है कि उसे अंग्रेजी का कोई ज्ञान नहीं है या जो खुद कहते हैं कि वे अंग्रेजी में अपनी बात नहीं समझा सकते, वह कैसे एक कार्यकारी पद को प्रभावी ढंग से संभाल सकते हैं?
अब जानें- अदालतों में अंग्रेजी-हिंदी भाषा को लेकर क्या नियम?
न्याय मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक, संविधान का अनुच्छेद 348(1) कहता है कि सुप्रीम कोर्ट और देशभर में मौजूद हाईकोर्ट में कार्यवाही की भाषा अंग्रेजी होनी चाहिए। हालांकि, संसद कानून के जरिए इसमें बदलाव कर सकती है।
अनुच्छेद 348(2) कहता है कि प्रदेश के राज्यपाल, राष्ट्रपति की सहमति के बाद हिंदी भाषा या किसी अन्य भाषा को राज्य में आधिकारिक कार्यों के लिए इस्तेमाल को मान्य कर सकते हैं। इसके तहत हाईकोर्ट की कार्यवाही भी हिंदी या मान्य स्थानीय भाषा में हो सकती है। लेकिन हाईकोर्ट के फैसले या आदेश अंग्रेजी में होंगे। हालांकि, बाद में आधिकारिक भाषा अधिनियम, 1963 की धारा 7 में कहा गया कि कोर्ट के फैसले और आदेश, इत्यादी भी अंग्रेजी के साथ हिंदी या अन्य स्थानीय भाषा में हो सकते हैं, बशर्ते राज्यपाल की तरफ से इसकी अनुमति दी गई हो और इसमें राष्ट्रपति की सहमति भी हो।
न्याय मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक, संविधान का अनुच्छेद 348(1) कहता है कि सुप्रीम कोर्ट और देशभर में मौजूद हाईकोर्ट में कार्यवाही की भाषा अंग्रेजी होनी चाहिए। हालांकि, संसद कानून के जरिए इसमें बदलाव कर सकती है।
अनुच्छेद 348(2) कहता है कि प्रदेश के राज्यपाल, राष्ट्रपति की सहमति के बाद हिंदी भाषा या किसी अन्य भाषा को राज्य में आधिकारिक कार्यों के लिए इस्तेमाल को मान्य कर सकते हैं। इसके तहत हाईकोर्ट की कार्यवाही भी हिंदी या मान्य स्थानीय भाषा में हो सकती है। लेकिन हाईकोर्ट के फैसले या आदेश अंग्रेजी में होंगे। हालांकि, बाद में आधिकारिक भाषा अधिनियम, 1963 की धारा 7 में कहा गया कि कोर्ट के फैसले और आदेश, इत्यादी भी अंग्रेजी के साथ हिंदी या अन्य स्थानीय भाषा में हो सकते हैं, बशर्ते राज्यपाल की तरफ से इसकी अनुमति दी गई हो और इसमें राष्ट्रपति की सहमति भी हो।
गौरतलब है कि संसद की तरफ से न्यायालयों की भाषा में बदलाव को लेकर कोई कानून नहीं बनाया गया है। इसके चलते सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही अंग्रेजी में ही होती है। हालांकि, कुछ राज्यों में अब अदालत की कार्यवाही के साथ-साथ फैसले और आदेशों में अब हिंदी का इस्तेमाल किया जाता है।
न्याय मंत्रालय के मुताबिक, भारत सरकार को तमिलनाडु, गुजरात, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक सरकारों की तरफ से अपने राज्यों में स्थित हाईकोर्ट में क्रमशः तमिल, गुजराती, हिंदी, बंगाली और कन्नड़ भाषा के इस्तेमाल की अनुमति मांगने वाले प्रस्ताव भी मिले हैं। हालांकि, हाईकोर्ट में हिंदी या किसी अन्य क्षेत्रीय भाषा में कार्यवाही चलाने की अनुमति देने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की टिप्पणी लेना जरूरी है। 16 अक्तूबर 2012 को चीफ जस्टिस ने अपने आदेश में कहा था कि पूरी न्यायालय ने काफी विचार के बाद फैसला किया है कि इन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया जाएगा। सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का पालन किया है।
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में अंग्रेजी की अनिवार्यता के मुद्दे को इसलिए अहमियत दी जाती हैं, क्योंकि इसके जरिए वकीलों के साथ-साथ न्यायाधीशों को अलग-अलग राज्यों के केस समझने और इनकी सुनवाई करने में आसानी होती है। इतना ही नहीं जजों के एक हाईकोर्ट से दूसरे हाईकोर्ट में ट्रांसफर में भी मुश्किलें नहीं आतीं। इसके अलावा हाईकोर्ट के जजों के सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति में भी दिक्कत नहीं आती।
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में अंग्रेजी की अनिवार्यता के मुद्दे को इसलिए अहमियत दी जाती हैं, क्योंकि इसके जरिए वकीलों के साथ-साथ न्यायाधीशों को अलग-अलग राज्यों के केस समझने और इनकी सुनवाई करने में आसानी होती है। इतना ही नहीं जजों के एक हाईकोर्ट से दूसरे हाईकोर्ट में ट्रांसफर में भी मुश्किलें नहीं आतीं। इसके अलावा हाईकोर्ट के जजों के सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति में भी दिक्कत नहीं आती।
अब जानें- प्रशासनिक अधिकारियों के लिए अंग्रेजी की अनिवार्यता कितनी?
गौरतलब है कि 1947 में भारत की आजादी के बाद भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) को बदलकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) कर दिया गया। इसके बाद यूपीएससी के तहत होने वाली परीक्षाओं को अलग-अलग भाषाओं में कराया जाता है। साथ ही इनमें उत्तीर्ण होने वाले अभ्यर्थियों को बाद में कैडर भी आवंटित होते हैं। कई बार उन्हें मिलने वाला कैडर उनकी क्षेत्रीय भाषा के प्रभाव से बाहर के राज्य या केंद्र सरकार के विभाग में होता है। चूंकि भारत में सिर्फ अंग्रेजी और हिंदी को ही आधिकारिक भाषाओं का दर्जा प्राप्त है। ऐसे में माना जाता है कि प्रशासनिक सेवा में शामिल अधिकारियों को कम से कम अंग्रेजी या हिंदी में से एक भाषा अनिवार्य तौर पर आनी चाहिए।
अशोका यूनिवर्सिटी की वेबसाइट में 2022 को छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश के अधिकतर आईएएस अफसर अंग्रेजी और हिंदी दोनों ही भाषाओं में पारंगत हैं। 2011 के आंकड़ों के मुताबिक, जहां प्रशासनिक सेवा में आने वाले 96.4 फीसदी अभ्यर्थी अंग्रेजी का अच्छी तरह पारंगत थे, तो वहीं 77.9 फीसदी अभ्यर्थी हिंदी को अच्छी तरह जानते थे।
गौरतलब है कि 1947 में भारत की आजादी के बाद भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) को बदलकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) कर दिया गया। इसके बाद यूपीएससी के तहत होने वाली परीक्षाओं को अलग-अलग भाषाओं में कराया जाता है। साथ ही इनमें उत्तीर्ण होने वाले अभ्यर्थियों को बाद में कैडर भी आवंटित होते हैं। कई बार उन्हें मिलने वाला कैडर उनकी क्षेत्रीय भाषा के प्रभाव से बाहर के राज्य या केंद्र सरकार के विभाग में होता है। चूंकि भारत में सिर्फ अंग्रेजी और हिंदी को ही आधिकारिक भाषाओं का दर्जा प्राप्त है। ऐसे में माना जाता है कि प्रशासनिक सेवा में शामिल अधिकारियों को कम से कम अंग्रेजी या हिंदी में से एक भाषा अनिवार्य तौर पर आनी चाहिए।
अशोका यूनिवर्सिटी की वेबसाइट में 2022 को छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश के अधिकतर आईएएस अफसर अंग्रेजी और हिंदी दोनों ही भाषाओं में पारंगत हैं। 2011 के आंकड़ों के मुताबिक, जहां प्रशासनिक सेवा में आने वाले 96.4 फीसदी अभ्यर्थी अंग्रेजी का अच्छी तरह पारंगत थे, तो वहीं 77.9 फीसदी अभ्यर्थी हिंदी को अच्छी तरह जानते थे।
उत्तराखंड में जिन जजों ने एडीएम पर सवाल उठाए, वे कौन?
उत्तराखंड हाईकोर्ट की जिस डिवीजन बेंच ने हिंदी न बोल पाने वाले एडीएम पर सवाल उठाए, उनमें उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस जी. नरेंद्र और जस्टिस आलोक माहरा शामिल रहे।1. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस गुहानाथन नरेंद्र
जस्टिस गुहानाथन नरेंद्र का जन्म 10 जनवरी, 1964 को हुआ था। कला स्नातक और एलएलबी में स्नातक करने के बाद वे 23 अगस्त, 1989 को तमिलनाडु बार काउंसिल में वकील के रूप में नामांकित हुए। 1989 से 1992 तक मद्रास हाईकोर्ट में वकालत की। 1993 से वे कर्नाटक बार काउंसिल के रोल में स्थानांतरित हो गए। उन्होंने कर्नाटक राज्य बार काउंसिल के सह-चयनित सदस्य के रूप में भी कार्य किया। 2 जनवरी 2015 को जी. नरेंद्र को कर्नाटक उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश और 30 दिसंबर 2017 को उन्हें स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया। इसके बाद उनका ट्रांसफर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में कर दिया गया। 26 दिसंबर 2024 से वे उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर कार्यभार संभाल रहे हैं।
2. जस्टिस आलोक माहरा
1 फरवरी 1972 को नैनीताल के माहरा गांव में जन्मे जस्टिस आलोक माहरा की शुरुआती पढ़ाई नैनीताल से की। जस्टिस माहरा के पिता गोपाल सिंह माहरा खुद भी नैनीताल के लोकप्रिय वकील थे। इसके बाद बीएससी और एमए करने के बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की। इसके बाद वे 1999 में नैनीताल में बार में शामिल हुए। 12 फरवरी 2025 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया और 14 फरवरी, 2025 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में शपथ ली।
1 फरवरी 1972 को नैनीताल के माहरा गांव में जन्मे जस्टिस आलोक माहरा की शुरुआती पढ़ाई नैनीताल से की। जस्टिस माहरा के पिता गोपाल सिंह माहरा खुद भी नैनीताल के लोकप्रिय वकील थे। इसके बाद बीएससी और एमए करने के बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की। इसके बाद वे 1999 में नैनीताल में बार में शामिल हुए। 12 फरवरी 2025 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया और 14 फरवरी, 2025 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में शपथ ली।