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उत्तर प्रदेश: अचानक ‘ब्राह्मण’ क्यों चर्चा में हैं, इस समुदाय को भाजपा से दूर करना सपा-बसपा के लिए आसान है क्या?
Tue, 07 Sep 2021 03:09 PM IST
प्रतिभा ज्योति
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
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Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Tue, 07 Sep 2021 03:09 PM IST
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ब्राह्मण वोट बैंक
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Amar Ujala
विस्तार
बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने आज लखनऊ में प्रबुद्ध सम्मेलन में ब्राह्मणों को लुभाने के लिए यह वादा किया कि यदि प्रदेश में बसपा की सरकार बनती है तो उनका ध्यान रखा जाएगा। ब्राह्मण मतदाताओं को लुभाने के लिए बसपा ने जगह-जगह सम्मेलन करके अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। इससे पहले बसपा ने 23 जुलाई को अयोध्या में 'ब्राह्मण सम्मेलन' आयोजित की थी जिसका नाम बाद में बदलकर 'प्रबुद्ध वर्ग के सम्मान में संगोष्ठी' कर दिया गया था।इसी तरह समाजवादी पार्टी ने अखिलेश यादव के नेतृत्व में 22 अगस्त से जिला स्तरीय ब्राह्मण सम्मेलन के जरिए ब्राह्मण मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश शुरू की। अखिलेश पार्टी के पांच बड़े ब्राह्मण नेताओं से मिलकर चुनाव की रणनीति पर मंथन करते नजर आए। उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से जानने वाले कहते हैं पहले ओबीसी, दलित और मुस्लिम वोट बैंक पर पार्टियों की नजर ज्यादा हुआ करती थी, लेकिन ऐसा लग रहा है, 2022 के चुनाव के केंद्र में ब्राह्मण रहने वाले हैं।
यूपी में ब्राह्मणों की भूमिका
आखिर क्या वजह है कि उत्तर प्रदेश में पार्टियां इस वोट बैंक पर इतना ध्यान दे रही हैं? उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता जाटवों और यादवों के बाद चुनाव का एक महत्वपूर्ण कारक हैं। एक अन्य कारण समुदाय का मजबूत सामाजिक-राजनीतिक इतिहास है जो चुनाव अभियान के दौरान विशेष रूप से अवध और उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्रों में किसी भी पार्टी को चुनाव में बढ़त दिलाने में मदद करता है। हालांकि, मंदिर की राजनीति के बाद से ब्राह्मणों को भारतीय जनता पार्टी के समर्थक के तौर पर देखा जाता है जो बड़े पैमाने पर भाजपा को वोट देते रहे हैं।
2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 12 प्रतिशत जाटव हैं। जाटवों के बाद ब्राह्मण दूसरे स्थान पर हैं। इनकी आबादी लगभग 10 प्रतिशत है। कुल जनसंख्या में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी के मामले में, उत्तर प्रदेश दो पहाड़ी राज्यों उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बाद तीसरे स्थान पर आता है। जो राज्य की राजनीति पर पर्याप्त प्रभाव डाल सकता है। यही वह संख्या है, जो सभी राजनीतिक दलों को एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने पर मजबूर कर रही है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण प्रभावशाली माने जाते रहे हैं। राज्य के पहले मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ब्राह्मण ही थे। एनडी तिवारी, जो 1989 में कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री थे, वे भी ब्राह्मण थे।
ब्राह्मण और भाजपा
'मंडल और मंदिर की राजनीति से पहले ब्राह्मण यूपी में कांग्रेस के प्रति वफादार थे। जैसे ही राम जन्मभूमि आंदोलन ने यहां गति पकड़ी, कांग्रेस राज्य में कमजोर होती गई। 1993 से 2004 तक, जब किसी एक दल को बहुमत नहीं मिल पाया था, ब्राह्मणों ने भाजपा का पूरा समर्थन किया, चाहे वह विधानसभा चुनाव हो या संसदीय चुनाव।
हाल के कुछ सालों में भाजपा के प्रति उनका झुकाव जबरदस्त तरीके से बढ़ा है। लोकनीति और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के अध्ययन के मुताबिक 2004 तक आधे से अधिक ब्राह्मण मतदाताओं ने हमेशा भाजपा को वोट दिया। हालांकि, 2007 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए ब्राह्मणों का समर्थन 40 प्रतिशत से कम हो गया। इस साल मायावती ने बहुमत हासिल किया था।
मायावती व अखिलेश यादव।
- फोटो :
amar ujala
लोकनीति और सीएसडीएस के आंकड़ें बताते हैं कि 2014 के बाद समीकरण फिर बदल गए। 2014 के लोकसभा चुनाव में 72 फीसदी, 2019 के लोकसभा चुनाव में ब्राह्मणों के 82 फीसदी वोट भाजपा को मिले थे। वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में 80 फीसदी ब्राह्मणों ने भाजपा को वोट किया। इन तीन चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश में एक तस्वीर साफ हो गई कि ब्राह्मण वोट भाजपा के लिए हैं, यादव वोट सपा के लिए हैं और जाटव वोट बसपा के लिए हैं।
फिर मायावाती-अखिलेश की सक्रियता का क्या मतलब है?
सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार कहते हैं उत्तर प्रदेश में ऐसी सोच चल रही है, लोगों को ऐसा महसूस हो रहा है और जो बिल्कुल निराधार नहीं है कि ब्राह्मण मतदाताओं में भाजपा के प्रति नाराजगी है। खास तौर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर नाराजागी का माहौल ज्यादा दिखाई दे रहा है। चर्चा चल रही है कि कानून व्यवस्था सुधारने के बहाने दबंग ब्राह्मणों पर अन्याय किया गया है, ज्यादतर ब्राह्मणों के साथ भेदभाव किया गया है।
ऐसी स्थिति में सपा-बसपा जैसी दूसरी पार्टियों को लग रहा है कि अगर वे नाराज हैं तो यह उन्हें लुभाने का यह सुनहरा अवसर है। दोनों पार्टियां ब्राह्मणों को यह एहसास दिला रही हैं कि भाजपा ने आपके साथ अन्याय किया है तो इसलिए हम आपकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं। इसलिए मायावती और अखिलेश दोनों का प्रयास है ब्राह्मण मतदाताओं को दिल जीतकर उन्हें अपने पाले में लाया जाए।
तो भाजपा चुप क्यों बैठी है
सपा और बसपा उसके पंरपरागत वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है और ऐसा क्यों लग रहा है कि भाजपा चुप बैठी है? संजय कुमार कहते हैं कि भाजपा बिल्कुल चुप नहीं बैठेगी, वह अपने ब्राह्मण वोटों पर अपनी पकड़ बनाए रखेगी। हां यह जरूर है कि अभी जमीन पर यह दिखाई नहीं पड़ता कि भाजपा बढ़चढ़ कर इसके लिए कोई प्रयास कर रही है, लेकिन भाजपा इस मुद्दे पर तब कोई निर्णय लेगी जब सही वक्त आएगा। यानी टिकट बंटवारे जैसा जब अहम फैसला करना होगा तो भाजपा इस पर जरूर महत्वपूर्ण कदम उठाएगी। अगर भाजपा 2022 में 2017 को दोहराना चाहती है तो उसे ब्राह्मण समर्थन बरकरार रखने की जरूरत है।
फिर मायावाती-अखिलेश की सक्रियता का क्या मतलब है?
सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार कहते हैं उत्तर प्रदेश में ऐसी सोच चल रही है, लोगों को ऐसा महसूस हो रहा है और जो बिल्कुल निराधार नहीं है कि ब्राह्मण मतदाताओं में भाजपा के प्रति नाराजगी है। खास तौर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर नाराजागी का माहौल ज्यादा दिखाई दे रहा है। चर्चा चल रही है कि कानून व्यवस्था सुधारने के बहाने दबंग ब्राह्मणों पर अन्याय किया गया है, ज्यादतर ब्राह्मणों के साथ भेदभाव किया गया है।
ऐसी स्थिति में सपा-बसपा जैसी दूसरी पार्टियों को लग रहा है कि अगर वे नाराज हैं तो यह उन्हें लुभाने का यह सुनहरा अवसर है। दोनों पार्टियां ब्राह्मणों को यह एहसास दिला रही हैं कि भाजपा ने आपके साथ अन्याय किया है तो इसलिए हम आपकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं। इसलिए मायावती और अखिलेश दोनों का प्रयास है ब्राह्मण मतदाताओं को दिल जीतकर उन्हें अपने पाले में लाया जाए।
तो भाजपा चुप क्यों बैठी है
सपा और बसपा उसके पंरपरागत वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है और ऐसा क्यों लग रहा है कि भाजपा चुप बैठी है? संजय कुमार कहते हैं कि भाजपा बिल्कुल चुप नहीं बैठेगी, वह अपने ब्राह्मण वोटों पर अपनी पकड़ बनाए रखेगी। हां यह जरूर है कि अभी जमीन पर यह दिखाई नहीं पड़ता कि भाजपा बढ़चढ़ कर इसके लिए कोई प्रयास कर रही है, लेकिन भाजपा इस मुद्दे पर तब कोई निर्णय लेगी जब सही वक्त आएगा। यानी टिकट बंटवारे जैसा जब अहम फैसला करना होगा तो भाजपा इस पर जरूर महत्वपूर्ण कदम उठाएगी। अगर भाजपा 2022 में 2017 को दोहराना चाहती है तो उसे ब्राह्मण समर्थन बरकरार रखने की जरूरत है।
भाजपा में शामिल हुए जितिन प्रसाद
- फोटो :
अमर उजाला
उत्तर प्रदेश से जुड़े भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए ब्राह्मण नेता जितिन प्रसाद को क्यों भूल रहे हैं। यह भी तो ब्राह्मणों मतदाताओं को भरोसा दिलाने का एक ही एक प्रयास है। देखते रहिए योगी मंत्रिमंडल में जब एक बड़े चेहरे को शामिल किया जाएगा तो सबकी शिकायतें दूर हो जाएंगी। वे कहते हैं दूसरी पार्टियां अब चुनाव देखकर ब्राह्मण मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश कर रही है, हम तो उनके दिल में बसते हैं। मोदी-योगी के नेतृत्व का ऐसा करिश्मा है कि परंपरागत मतदाता हमसे नाराज नहीं हो सकते। वैसे योगी सरकार में एक उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा के अलावा आठ ब्राह्मण मंत्री हैं। इनमें ब्रजेश पाठक और श्रीकांत शर्मा भी शामिल हैं।
आगे क्या
2007 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, बसपा ने अपने पारंपरिक नारों से नाता तोड़ कर समावेशी राजनीति करने का प्रयास किया। मायावती ने ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्रा को भी पार्टी एक प्रमुख स्थान दिया। इस प्रयोग ने बसपा को बहुमत दिलाने और सरकार बनाने में मदद की। ब्राह्मण वोटरों को जोड़ने में सतीश चंद्र मिश्रा एक अहम भूमिका निभा रहे हैं।
मायवती को 2007 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों के 17 फीसदी वोट मिले थे। 2002 से 2007 के बीच, ब्राह्मणों के बीच बसपा के समर्थन में 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी और यह बसपा के लिए सकारात्मक बदलाव था। 2007 में बसपा को 206 सीटें मिली थीं। उस वक्त उसके 51 में से 20 ब्राह्मण उम्मीदवार विधानसभा पहुंचे थे। संजय कुमार बताते हैं, 2019 के लोकसभा चुनाव में जब सपा और बसपा ने हाथ मिलाया था, तो उन्हें उम्मीद थी कि उनका सामाजिक गठबंधन भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी करेगा। हालांकि, उनका यह राजनीतिक प्रयोग विफल हो गया क्योंकि सपा केवल पांच लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रही, जबकि बसपा को दस सीटें मिलीं। वफादार ब्राह्मण वोट बैंक भाजपा की तरफ ही गया।
2019 की लोकसभा हार से मिली सीख ने ही अखिलेश यादव और मायावती को ब्राह्मण वोट के महत्व का एहसास कराया। हालांकि इस बार ब्राह्मण वोट को लेकर अखिलेश और मायावती एक-दूसरे से मुकाबला कर रहे हैं। बसपा 2022 के आगामी विधानसभा चुनाव में 2007 को दुहराना चाहती है, वहीं सपा उन्हें अपने खेमे में करना चाहती है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक ऐसा होना मुश्किल मानते हैं क्योंकि पिछले कुछ समय से बसपा का समर्थन आधार घटा है और भाजपा उसके वोट शेयर में सेंध लगा चुकी है। दूसरी तरफ भाजपा सवर्णों की चहेती पार्टी है, जिसके तिलिस्म को तोड़ना सपा के लिए भी आसन नहीं है।
आगे क्या
2007 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, बसपा ने अपने पारंपरिक नारों से नाता तोड़ कर समावेशी राजनीति करने का प्रयास किया। मायावती ने ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्रा को भी पार्टी एक प्रमुख स्थान दिया। इस प्रयोग ने बसपा को बहुमत दिलाने और सरकार बनाने में मदद की। ब्राह्मण वोटरों को जोड़ने में सतीश चंद्र मिश्रा एक अहम भूमिका निभा रहे हैं।
मायवती को 2007 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों के 17 फीसदी वोट मिले थे। 2002 से 2007 के बीच, ब्राह्मणों के बीच बसपा के समर्थन में 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी और यह बसपा के लिए सकारात्मक बदलाव था। 2007 में बसपा को 206 सीटें मिली थीं। उस वक्त उसके 51 में से 20 ब्राह्मण उम्मीदवार विधानसभा पहुंचे थे। संजय कुमार बताते हैं, 2019 के लोकसभा चुनाव में जब सपा और बसपा ने हाथ मिलाया था, तो उन्हें उम्मीद थी कि उनका सामाजिक गठबंधन भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी करेगा। हालांकि, उनका यह राजनीतिक प्रयोग विफल हो गया क्योंकि सपा केवल पांच लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रही, जबकि बसपा को दस सीटें मिलीं। वफादार ब्राह्मण वोट बैंक भाजपा की तरफ ही गया।
2019 की लोकसभा हार से मिली सीख ने ही अखिलेश यादव और मायावती को ब्राह्मण वोट के महत्व का एहसास कराया। हालांकि इस बार ब्राह्मण वोट को लेकर अखिलेश और मायावती एक-दूसरे से मुकाबला कर रहे हैं। बसपा 2022 के आगामी विधानसभा चुनाव में 2007 को दुहराना चाहती है, वहीं सपा उन्हें अपने खेमे में करना चाहती है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक ऐसा होना मुश्किल मानते हैं क्योंकि पिछले कुछ समय से बसपा का समर्थन आधार घटा है और भाजपा उसके वोट शेयर में सेंध लगा चुकी है। दूसरी तरफ भाजपा सवर्णों की चहेती पार्टी है, जिसके तिलिस्म को तोड़ना सपा के लिए भी आसन नहीं है।