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UP Electon 2022: भाजपा-सपा लगा रही पूरा जोर, चुनाव में विकास-राष्ट्रवाद पर क्या भारी पड़ेगा जातिवाद का मुद्दा? 

Sun, 23 Jan 2022 03:53 PM IST
amit sharma अमित शर्मा
Updated Sun, 23 Jan 2022 03:53 PM IST
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सार
अखिलेश यादव समाज की विभिन्न जातियों का बेहतर गठजोड़ बना कर भाजपा के हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और विकास से मुकाबला करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, भाजपा के नेता उत्तर प्रदेश में पलायन और सुरक्षा का मुद्दा जोरशोर से उठा रहे हैं।
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UP Electon 2022 BJP SP Yogi Adityanath Akhilesh Yadav Development Nationalism Castism Latest News Update
योगी आदित्यनाथ, प्रियंका गांधी, मायावती और अखिलेश यादव। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

चुनाव के पहले चरण में भाजपा के नेता उत्तर प्रदेश में पलायन और सुरक्षा का मुद्दा जोरशोर से उठा रहे हैं। पलायन और दंगा पीड़ितों से मुलाकात कर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह उन मुद्दों को हवा दे रहे हैं, जिससे पश्चिम में भाजपा की राजनीतिक फसल लहलहा सकती है। इसके लिए सपा उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि का भी सहारा लिया जा रहा है। हालांकि, वे जेवर एयरपोर्ट, नोएडा फिल्म सिटी और गंगा एक्सप्रेसव के बनने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तेज विकास होने का दावा भी कर रहे हैं, लेकिन भाजपा नेताओं की प्रमुखता में पलायन और सुरक्षा का ही मुद्दा दिखाई दे रहा है।



वहीं, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव समाज की विभिन्न जातियों का बेहतर गठजोड़ बना कर भाजपा के हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और विकास से मुकाबला करने की कोशिश कर रहे हैं। उनके पाले में धीरे-धीरे आधा दर्जन से ज्यादा विभिन्न जातियों के नेता गोलबंद हो चुके हैं। इसमें ब्राह्मण, राजपूत, मुस्लिम, राजभर, मौर्य और मल्लाह शामिल हैं। सपा नेताओं का दावा है कि मायावती की राजनीतिक तौर पर कमजोर होने से दलित जातियां भी धीरे-धीरे उन्हीं के पक्ष में लामबंद हो रही हैं। कई प्रभावशाली जातियों के साथ आ जाने से यह गोलबंदी एक बड़े राजनीतिक समीकरण के बनने का इशारा कर रही है। इस समीकरण को देखते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को भी यह डर सताने लगा है कि यदि चुनाव जातिवाद के मुद्दे पर हुआ तो उसका विकास, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का मुद्दा धरा का धरा रह जाएगा। 


सपा की रणनीति
अखिलेश यादव बेहद सधी हुई चाल से समाज के विभिन्न वर्गों को धीरे-धीरे अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। भाजपा से ब्राह्मणों की नाराजगी की खबरों के बीच उन्होंने बेहद सधे अंदाज में ब्राह्मण नेताओं को अपने साथ लाने की कोशिश की है। गोरखपुर के हरिशंकर तिवारी को अपने साथ लाकर पूर्वांचल के ब्राह्मणों में उन्होंने हलचल पैदा की है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने भाजपा के ही दिवंगत कार्यकर्ता उपेंद्र शुक्ला की पत्नी को उतार कर उन्होंने उत्तर प्रदेश के 14 फीसदी ब्राह्मण समुदाय के मतदाताओं को एक संदेश देने का काम किया है। लोगों का मानना है कि ब्राह्मणों की नाराजगी समाजवादी पार्टी को लाभ पहुंचा सकती है। 

लगभग 8 फीसदी मतदाताओं वाले राजपूत समाज का समर्थन इसी समुदाय से आने वाले योगी आदित्यनाथ के पीछे एकजुट दिखाई पड़ रहा है। राजपूतों का एक बड़ा वर्ग मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ खड़ा है तो सपा भी इसमें सेंधमारी की कोशिश है। सपा नेताओं का दावा है कि ब्राह्मण और राजपूत समाज का एक बड़ा वोट बैंक सपा के साथ आने से भाजपा के कोर वोट बैंक के बिखरने का खतरा पैदा हो गया है। 

यूपी में लगभग 20 प्रतिशत आबादी वाले मुस्लिम मतदाताओं में भाजपा को लेकर खास नाराजगी देखी जा रही है। इस वर्ग के मतदाताओं से बातचीत करने के बाद पता चलता है कि वह अपना मत खराब करने की बजाय उसी पार्टी को समर्थन देंगे जो भाजपा को सत्ता से बेदखल करने में सक्षम दिखाई पड़ रही होगी। कांग्रेस से समाजवादी पार्टी में आए सहारनपुर के नेता इमरान मसूद के दावे में यह झलक दिखाई पड़ जाती है कि इस वर्ग का वोट किस तरफ खिसक रहा है। उन्होंने कहा था कि उन्हें कांग्रेस से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन आज वे समाजवादी पार्टी के साथ केवल इसलिए खड़े होना चाहते हैं क्योंकि केवल सपा ही भाजपा को हराने में सक्षम है। 

भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के फैसलों से नाराज ओमप्रकाश राजभर पहले ही सपा के साथ ताल मिला चुके हैं। वे पूर्वांचल की दो दर्जन से ज्यादा सीटों पर सीधा असर छोड़ने में सक्षम हैं। थोड़े-थोड़े वोटों के अंतर से हार जीत का निर्णय होने वाली सीटों पर राजभर मतदाता प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। 

मौर्य, कोइरी और कुशवाहा जैसी पिछड़ी जातियों पर प्रभावशाली असर रखने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य समाजवादी पार्टी के स्टार प्रचारकों की लिस्ट में शामिल हो चुके हैं। बसपा और भाजपा में रहते हुए अपने प्रभाव का सफल प्रमाण दे चुके स्वामी प्रसाद मौर्य इस बार गैर-यादव ओबीसी को सपा के पक्ष में लाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। 

अखिलेश यादव का मुख्यमंत्री बनने के बाद जातीय जनगणना कराने और सभी जातियों को उनकी आबादी के अनुसार आरक्षण देने का वायदा भी गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों को सपा के साथ आने के लिए प्रेरित कर रहा है। 

सभी पीड़ित हमारे साथ
समाजवादी पार्टी के नेता आईपी सिंह कहते हैं कि अखिलेश यादव के साथ आज समाज का व्यापक जनसमर्थन जुटता हुआ दिखाई पड़ रहा है। यादव के साथ-साथ समाज के अन्य पिछड़े मौर्य, कोइरी कुशवाहा और मल्लाह जातियां सपा के साथ आ रही हैं। बसपा मुखिया मायावती की निष्क्रियता देखकर दलितों का एक बड़ा वर्ग समाजवादी पार्टी की तरफ आ रहा है। गैरजाटव समुदाय भी अपने व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए समाजवादी पार्टी के साथ आ चुका है। समाज के ज्यादातर वर्गों से व्यापक समर्थन मिलने का ही परिणाम है कि अखिलेश यादव इस चुनाव में बेहद मजबूती के साथ आगे बढ़ रहे हैं। 

जातिवाद पर भारी पड़ेगा विकास
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने अमर उजाला से स्वीकार किया कि अखिलेश यादव पूरे चुनाव को जातिवाद के मुद्दे पर ले जाना चाहते हैं। वे अलग-अलग जातियों के नेताओं को अपने साथ लाकर सामाजिक ध्रुवीकरण का लाभ लेना चाहते हैं। इससे पार्टी की चुनावी रणनीति को नुकसान पहुंच सकता है। 

हालांकि, पार्टी के एक अन्य नेता ने कहा कि उनकी सामाजिक योजनाओं का लाभ समाज के सभी वर्गों को मिला है। ओबीसी, अति पिछड़ा वर्ग, दलित और अन्य दलित वर्ग सबसे ज्यादा आबादी रखने के कारण इन योजनाओं का सबसे बड़ा लाभार्थी रहा है। उन्होंने कहा कि विभिन्न योजनाओं के माध्यम से भारी लाभ उठा चुके लोग जातिवाद की दीवारों को तोड़कर भाजपा का समर्थन करेंगे और इसी उम्मीद पर भाजपा अपने राष्ट्रवाद और विकासवाद के एजेंडे पर आगे बढ़ रही है।

उन्होंने दावा किया कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भी नरेंद्र मोदी सरकार की कल्याणकारी योजनाएं विपक्ष की सारी रणनीति पर भारी पड़ी थी। उन्होंने कहा कि यह जनता के लिए निर्णय करने वाली घड़ी है कि वह जातिवाद को प्राथमिकता देना चाहती है या अपनी विकास को समर्पित मोदी और योगी सरकार को समर्थन देना चाहती है। 

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