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UP Election 2022: सांडों के हमले से लेकर बिजली बिल तक, उत्तर प्रदेश की चुनावी दौड़ में पार्टियों के पास क्या-क्या है?

Mon, 03 Jan 2022 06:53 PM IST
Pratibha Jyoti प्रतिभा ज्योति
Updated Mon, 03 Jan 2022 06:53 PM IST
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सार
यह यूपी में चुनावी वादे करने का मौसम है, इसलिए सभी पार्टियां इस दौड़ में शामिल हैं। वादों के कॉकटेल में वह सब कुछ है जिसके बारे में मतदाता सोच देख सकता है। साढ़े चार साल जो गौण रहते हैं अचानक पार्टियों के लिए अहम बन जाते हैं। मुद्दा यह भी चुनाव के समय राजनीतिक दलों द्वारा किए गए वादों को पूरा नहीं करने पर क्या उन्हें जवाबदेह ठहराया जा सकता है?
 
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UP Election 2022 season of making electoral promises in UP the poll bound state,  Can political parties be held accountable for unfulfilled and impractical promises
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों ने वादों की झड़ी लगाना शुरू कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी जहां विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है, वहीं बाकी पार्टियां चुनावी वादे में वह सब कुछ कवर करने की कोशिश कर रही हैं, जिनके बारे में मतदाता सोच सकते हैं। कुछ वादे आम हैं, जैसे मुफ्त बिजली, कोविड-19 से राहत और स्मार्टफोन। समाजवादी पार्टी के वादे तो बहुत दिलचस्प माने जा रहे हैं। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तो इस चुनाव में सांडों को भी उतार दिया है। उन्होंने वादा किया है कि सांड से लड़कर दुर्घटना में मौत होने पर सपा सरकार पांच लाख का मुआवजा देगी। अखिलेश ने यह भी वादा किया है कि यदि उनकी पार्टी यूपी में सरकार बनाती है तो सड़क हादसे में जान गंवाने वाले हर साइकिल सवार के परिवारजनों को पांच लाख रुपए बतौर मुआवजे दिए जाएंगे।


वहीं, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोमवार को संवाददाता सम्मेलन में कहा कि शाहजहांपुर, झांसी, सोनभद्र, ललितपुर, एटा सहित विभिन्न लंबित बिजली परियोजनाओं पर काम करेंगे। इसके अलावा आम जनता को 300 यूनिट मुफ्त बिजली उपलब्ध कराई जाएगी। पार्टी प्रवक्ता उदयवीर सिंह का कहना है कि अन्य योजनाएं साइकिल चालकों और अन्य आम नागरिकों के लिए बीमा कवरेज की तरह हैं और आसानी से वितरित की जा सकती हैं।


शुरुआत किसने की?
माना जाता है कि वादों की झड़ी लगाने की शुरुआत आम आदमी पार्टी ने की, जिसके जरिए विशेष रूप से दिल्ली की सीमा से लगे जिलों पर प्रभाव डालने की कोशिश की जा रही है। दिल्ली के विकास मॉडल की तर्ज पर पार्टी ने सितंबर में किसानों के लिए मुफ्त बिजली देने का वादा किया। सत्ता में आने पर लंबित बिजली बिलों को माफ करने के साथ-साथ युवाओं के लिए 5,000 रुपये प्रति माह बेरोजगारी भत्ता देने की भी घोषणा की थी। रविवार को आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने 18 साल से अधिक उम्र की महिलाओं के बैंक खातों में हर महीने 1,000 रुपये ट्रांसफर करने का वादा किया था।

कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी
कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी - फोटो : अमर उजाला
कांग्रेस का महिलाओं पर जोर
कांग्रेस पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के नेतृत्व में महिलाओं पर अपना अभियान केंद्रित कर रही है। पार्टी ने महिलाओं के लिए अलग घोषणापत्र जारी किया है, जिसमें 12वीं कक्षा में लड़कियों के लिए स्मार्टफोन, स्नातक की पढ़ाई कर रही महिलाओं के लिए स्कूटी, महिलाओं के लिए मुफ्त सार्वजनिक परिवहन, हर महिला को साल में तीन मुफ्त गैस सिलेंडर देने का वादा किया है। वहीं, सभी बीमारियों के लिए प्रति परिवार 10 लाख रुपये तक का मुफ्त चिकित्सा उपचार और 50 फीसदी से अधिक महिलाओं कार्यबलों वाले व्यवसायों को विशेष प्रोत्साहन और कर में छूट देने की बात कही है। पार्टी लोगों से कह रही है ‘हम वचन निभाएंगे।’ 

भाजपा का दांव विकास और युवाओं का साथ भी
‘डबल इंजन की सरकार यानी केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार ही राज्य के विकास की महत्वपूर्ण शर्त है’, इस तर्ज पर भाजपा चुनाव में विकास के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है, लेकिन पार्टी युवाओं को आकर्षित करने पर भरोसा कर रही है। बीते 25 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्नातक, स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के छात्रों के साथ-साथ प्रतिस्पर्धा की तैयारी कर रहे लगभग 10,000 छात्रों को मुफ्त स्मार्टफोन और टैबलेट वितरित किए। सरकार का वादा है कि वह इस कार्यक्रम के तहत एक करोड़ छात्रों को कवर करेगी।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी। - फोटो : अमर उजाला
ऐसे तैयार किए जाते हैं वादे 
कई पार्टियों से मिली जानकारी के मुताबिक, पहले मुद्दे का चयन किया जाता है। इसके लिए पार्टी के स्तर पर समितियों का गठन किया जाता है। मीडिया रिपोर्ट्स, लोगों की शिकायतों, सोशल मीडिया और विभिन्न स्रोतों से इस बात का पता लगाया जाता है कि किस क्षेत्र की जनता किस बात को लेकर परेशान है और उनका चुनावी मुद्दा क्या बन सकता है? इसके बाद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर उस मुद्दे को वादे का रूप देने के लिए विचार-मंथन किया जाता है। फिर राज्य की आबादी के हिसाब से इसके लिए उस वादे का विस्तृत अध्ययन, डेटा संग्रह और सरकारी खजाने पर पड़ने वाले बोझ के बारे में विस्तृत शोध किया जाता है।

सरकारी खजाने पर सबसे ज्यादा बोझ मुफ्त बिजली, बेरोजगारी भत्ता और लोगों के खाते में पैसे डालने पर पड़ता है और यह पैसा जनता की जेब से जाता है। अक्सर राजनीतिक दल और उनके नेता जनता से पानी, बिजली, सड़क और रोजगार का वादा करते हैं, लेकिन वे यह नहीं बताते कि सत्ता में आने के बाद इन वादों को हकीकत में किस तरह बदलेंगे।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी। - फोटो : अमर उजाला
वादे पूरे कैसे होंगे? 
वादे तो कर लिए इसे पूरा कैसे किया जाएगा, इस बारे में पूछे जाने पर आम आदमी पार्टी के एक नेता का कहना है कि वादों को पूरा करने के लिए बजट नहीं बल्कि इच्छाशक्ति की जरुरत है। वहीं कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने इसी बारे में पूछे जाने पर मीडिया को दिए अपने बयान में कहा ‘इन वादों को लागू करने के लिए आवश्यक बजट मौजूदा सरकार की फिजूलखर्ची और भ्रष्टाचार को रोककर आसानी से पूरा किया जा सकता है।’

मिल चुकी है चुनौती
सब्सिडी का एलान, खातों में पैसे देना, कीमतों में कटौती करना और नई योजनाएं लाना आदि जैसी घोषणाएं सत्ताधारी दल करते हैं और विपक्ष भी इसी तरह के लोकलुभावने वादे करता है। सत्ता पक्ष को चुनाव की घोषणा होने और आचार संहिता लागू होने से पहले कुछ वादों को पूरा करने की जल्दी होती है क्योंकि उसके पास सरकारी खजाने का अधिकार होता है। लेकिन मुद्दा यह है कि चुनाव के समय राजनीतिक दलों द्वारा किए गए वादों को पूरा नहीं करने पर क्या उन्हें जवाबदेह ठहराया जा सकता है? चुनावी घोषणापत्र में किए वादों को पूरा नहीं किए जाने को लेकर कई मौकों पर अदालतों में चुनौती दी जा चुकी है।

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (आरपी अधिनियम) की धारा 123 में ‘कदाचार’ को लेकर विस्तार से बताया गया है। इसमें किसी उम्मीदवार या उसके एजेंट या किसी अन्य व्यक्ति की सहायता से किसी को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उपहार या  प्रस्ताव देना या वादे करना को रिश्वत माना गया है। यहां तक कि उम्मीदवार की तरफ से मतदाता को एक कप चाय पिलाना भी रिश्वत ही है। 
 

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media
2013 में ऐसे ही एक मामले में घोषणापत्र में लोगों को मुफ्त के कई वादे करने पर एस सुब्रमण्यम बालाजी ने तमिलनाडु की पार्टी डीएमके के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया और आरोप लगाया कि वोट बैंक के कारण भोले-भाले मतदाताओं को लुभाने के लिए योजनाओं का वादा किया गया। इसलिए, एस सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार (2013) में  मुख्य मुद्दों में से एक यह था कि क्या राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादे को आरपी की धारा 123 के अनुसार ‘भ्रष्ट आचरण’ के रूप में माना जाए। 

चुनावी घोषणापत्र में वादों के लिए क्यों स्वतंत्र है पार्टियां
इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कि आरपी एक्ट में प्रावधान को शामिल करने का उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से चुनाव कराना है, सुप्रीम कोर्ट ने इसके दायरे की जांच की और पाया कि घोषणापत्र एक राजनीतिक दलों के भविष्य का नीतिगत बयान है। यह भविष्य की सरकार का वादा है न कि किसी एक उम्मीदवार का। पांच जुलाई, 2013 के अपने एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि आरपी एक्ट के तहत घोषणापत्र में किए गए वादों को ‘कदाचार’ की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता है। इसके विपरीत, धारा 123 उम्मीदवार या उसके एजेंट की ओर से किए गए वादे को कदाचार माना जा सकता है। इसलिए, राजनीतिक दल चुनावी घोषणापत्र में वादे करने के लिए स्वतंत्र हैं।

चुनाव आयोग
चुनाव आयोग - फोटो : ANi
क्या चुनाव आयोग रखता है नजर
सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं मुद्दों से निबटने के लिए चुनाव आयोग को संबंधित दलों के साथ विमर्श करके घोषणापत्र के वादों को लेकर दिशानिर्देश जारी करने को कहा था। चुनाव आयोग के साथ बैठक में ज्यादातर राजनीतिक दलों ने तर्क दिया कि लोकतंत्र के तहत घोषणापत्र में ऐसे वादे करना मतदाता के प्रति उनका अधिकार भी है और कर्तव्य भी। सैद्धांतिक तौर पर चुनाव आयोग ने भी इससे सहमति जताई। अब चुनाव आयोग आचार संहिता प्रभावी होने के बाद पार्टियों के घोषणापत्र से अलग किए गए वादों पर नजर रखता है। ऐसे ही एक मामले में 2012 में घोषणापत्र से अलग अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण का वादा करने पर एक मंत्री भारी मुश्किल में पड़ गए थे। 

राजनीतिक दलों को जिम्मेवार ठहराया जाए
2017 में  एक संगोष्ठी में, भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर ने अफसोस जताया था कि चुनावी वादे नियमित रूप से अधूरे रह गए और घोषणापत्र ‘केवल कागज का टुकड़ा’ बन गया। उनका कहना था कि ऐसे मामलों में राजनीतिक दलों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने आगे जोर देकर कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनीतिक दल अपने चुनावी वादों को पूरा न करने को सही ठहराने के लिए अपने सदस्यों के बीच 'आम सहमति की कमी' जैसे बहाने बना देते हैं।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने अपने एक लेख में लिखा है  31 जनवरी, 2014 को घोषणापत्र के दिशानिर्देशों का मसौदा जारी कर राजनीतिक दलों की राय मांगी थी। इसमें उम्मीद की गई कि घोषणापत्रों में व्यावहारिक वादे हों और इस बारे में भी बताया जाए कि वादे कैसे पूरे होंगे। उनके मुताबिक लगता नहीं कि ऐसा हो पाएगा। चुनाव आयोग ने स्वीकार किया है कि वह घोषणापत्रों की समीक्षा करने और उनके वित्तीय दुष्प्रभावों के बारे में नहीं बताने वाले दलों के खिलाफ कार्रवाई करने में सक्षम नहीं है। 
 

चुनाव आयोग
चुनाव आयोग - फोटो : social media
रास्ता क्या है? 
इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के वकील, साइबर लॉ एक्सपर्ट और ‘अनमास्किंग वीआईपी’ पुस्तक के लेखक विराग गुप्ता का कहना है, इस पूरे मामले के तीन पहलू हैं। पहला पहलू यह है कि क्या नेता और वोटरों के बीच में सर्विस प्रोवाइडर का रिश्ता है, कि वे वादे नहीं पूरे होने पर मुआवजा मांग सके या कोर्ट में जा सकें? दूसरी अहम बात यह है कि चुनाव की अधिसूचना जारी होने के पहले चुनाव आयोग की कोई भूमिका नहीं होती है तो ऐसे में चुनाव से पहले नेता या पार्टी जो वादा करते हैं,  उसकी निगरानी कौन नियामक करे? तीसरा चुनावों के समय जो घोषणापत्र जारी होते हैं और उनमें जो वादे होते हैं, सरकार बनने पर पूरा नहीं किया जाए तो जनता क्या कर सकती है? 

वे कहते हैं यदि किसी प्राइवेट अस्पताल में कोई दुर्घटना हो जाती है तो वह सील हो जाता है, लेकिन सरकारी अस्पताल में कोई दुर्घटना होती है तो उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वादा पूरा नहीं होने पर या नुकसान होने पर सरकार से मुआवजा मिलने के लिए भारत में ठोस कानूनी सिस्टम नहीं बना है। चुनावी वायदों का मसला सुप्रीम कोर्ट भी गया, लेकिन राजनीतिक दलों या नेताओं को झूठे वादे से रोकने के लिए कोई कानून ही नहीं है, इसलिए अदालत से इस बारे में ठोस फैसला नहीं हो सका।

चुनाव सुधार के कई प्रस्ताव लंबित
उनके मुताबिक  बिडंबना है कि चुनाव आयोग के पास पार्टी के रजिस्ट्रेशन का अधिकार तो है , लेकिन चुनावों के पहले और बाद में पार्टियों और नेताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने में उसके हाथ बंधे हुए हैं। पिछले कई दशकों में चुनाव सुधारों के बारे कानून में बदलाव के अनेक प्रस्ताव सरकार के पास लंबित है, लेकिन किसी राजनीतिक दल या सरकार ने चुनाव सुधार पर दृढ़ इच्छा शक्ति नहीं दिखाई। जरुरत इस बात कि है कि जनता के पैसों से सरकारी विज्ञापनों और मुफ्त के वादों पर दुरुपयोग रोकने के लिए एक सख्त कानूनी व्यवस्था बने। इससे चुनाव व्यवस्था सुधरने के साथ लोकतंत्र भी मजबूत होगा।
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