अमर उजाला विश्लेषण: उत्तर प्रदेश चुनाव में 'दोगुने दाम' की थ्योरी और शाह का 'खेला' बाकी है, कौन फंसा 'घड़ियाल और बाघ' के बीच?
प्रसिद्ध चिंतक और लेखक डॉ. राघव शरण शर्मा का कहना है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव बहुत रौचक दौर में पहुंचता जा रहा है। उत्तर प्रदेश में हरियाणा की तर्ज पर भाजपा अगर जयंत चौधरी को डिप्टी सीएम बनाकर कुछ उलटफेर कर दे तो क्या होगा। अमित शाह के 'खेला' की कल्पना अखिलेश को नहीं है। मुलायम या अखिलेश, अभी तमाम केसों से मुक्त नहीं हुए हैं...
विस्तार
उत्तर प्रदेश में भाजपा के मंत्रियों और विधायकों को तोड़कर सपा में मिलाने वाले अखिलेश यादव खुश नजर आ रहे हैं। कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि अब पासा पलट जाएगा। राजनीति के जानकार भी इस 'पलटी' की अपने-अपने तरीके से व्याख्या कर रहे हैं। प्रसिद्ध चिंतक और लेखक डॉ. राघव शरण शर्मा का कहना है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव बहुत रौचक दौर में पहुंचता जा रहा है। जो हो रहा है, क्या वही सच है, जो नजर आ रहा है, क्या वह सही है, इसका जवाब उतना आसान नहीं है। जमीन पर स्थिति बिल्कुल उलट है। उत्तर प्रदेश चुनाव में 'दोगुने दाम' की थ्योरी और अमित शाह का 'खेला' अभी बाकी है। 'जाति' के जिस हिसाब-किताब पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव खुश हो रहे हैं, उसमें कई अहम बातें छिपी हैं। पिछड़ों में तो अति पिछड़े भी आते हैं। इनके 'कल और 'आज' की बात करें तो ये 'घड़ियाल और बाघ' के बीच ही फंसे रहे हैं। मतलब, इनके लिए सपा, उस जंगल से कम नहीं है, जहां पर बाघ रहते हैं। ये लोग जान बचाने के लिए वहां जाते हैं, मगर बच नहीं पाते। मौजूदा सरकार को भी ये लोग 'घड़ियाल' की तरह समझते हैं। जान पर यहां भी संकट है।
नेताओं की अदला-बदली, लेकिन मुगालते में न रहें...
उत्तर प्रदेश में जिस तरह से नेताओं का दूसरे दलों में आना-जाना शुरू हुआ है, वह ज्यादा उत्साह वाली सूचना नहीं है। अगर कोई राजनीतिक दल इसे अपने लिए बड़े फायदे का सौदा मान रहा है तो वह मुगालते में है। अपनी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ. राघव शरण शर्मा कहते हैं, नेताओं की अदला-बदली से थोड़ा बहुत असर पड़ता है। नेताओं के अनुयायी ही साथ जाने का दावा करते हैं। बाकी समुदाय को लेकर कभी भी सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। सामान्य लोगों की समझ क्या है, ये देखने वाली बात है। अमूमन, वे लोग अपनी समझ से ही वोट देने का निर्णय करते हैं। उत्तर प्रदेश में केवल यादव ही पिछड़े नहीं हैं। वहां दूसरी जातियां भी इस वर्ग में आती हैं।
अति पिछड़ों को ठीक से न समझना, एक बड़ी भूल होगी
चुनावी माहौल में पिछड़ों की राजनीति पर जब बात होती है, तो मुख्य तौर पर उसमें 'यादव' ही शामिल रहते हैं। अन्य कई दूसरी जातियां भी तो पिछड़ों में शामिल हैं। इसके बाद अति पिछड़ा वर्ग भी तो है, जिसकी गिनती नहीं हो पाती। डॉ. राघव शरण शर्मा ने बताया, उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ा वर्ग कितना है, इसका सही अंदाजा भी किसी को नहीं है। इनकी संख्या 20-25 फीसदी से अधिक हो सकती है। इन लोगों के लिए सपा और योगी राज, दोनों एक जैसे हैं। बचने के लिए इनके सामने दो विकल्प हैं। एक तरफ घड़ियाल है तो दूसरी ओर बाघ है। स्थिति को समझा जा सकता है। यादव और ठाकुर, अति पिछड़े इन दोनों जातियों के साथ खुद को सुरक्षित नहीं समझते। ऐसे में अति पिछड़ों को केवल सपा के वोटर कहना, राजनीतिक नासमझी होगी।
असली तस्वीर तो बाकी है...
राजनीति है, कब, कौन, किसके खेमे में होगा, कहा नहीं जा सकता। उत्तर प्रदेश चुनाव में भी दोगुने दाम की थ्योरी चल रही है। आज एक दाम पर नेता इधर-उधर जा रहे हैं, लेकिन कल को, और चुनाव जीतने के बाद वही नेता दूसरे दाम पर पाला नहीं बदलेंगे, इस बात की गारंटी कौन देगा। सपा प्रमुख को यह बात समझनी चाहिए। उत्तर प्रदेश में हरियाणा की तर्ज पर भाजपा अगर जयंत चौधरी को डिप्टी सीएम बनाकर कुछ उलटफेर कर दे तो क्या होगा। अमित शाह के 'खेला' की कल्पना अखिलेश को नहीं है। मुलायम या अखिलेश, अभी तमाम केसों से मुक्त नहीं हुए हैं। इस बात को राजनीति और वह भी चुनावी माहौल में, ज्यादा गौर से समझा जाता है। ये भी ध्यान रखना होगा कि क्या प्रदेश का दलित वोटर सपा को ही वोट देगा।
घर जल गया, अब तो मजा लेना है
डॉ. राघव शरण शर्मा बताते हैं, बसपा को क्यों भूल जाते हैं। चुनाव के बाद अगर यह पार्टी कुछ सीट जीतती है तो वह सपा की बजाए, भाजपा के लिए फायदे का सौदा हो सकता है। लोगों का कहना है कि अंदरखाते ऐसा कुछ चल रहा है। हर सीट पर बसपा ने प्रत्याशी खड़े किए हैं। कम से कम वह सपा को कुछ नुकसान तो अवश्य पहुंचाएगी। कांग्रेस की स्थिति के बारे में डॉ. शर्मा कहते हैं, इनका घर जल गया है, मगर अब इन्हें मजा लेना है, उत्तरप्रदेश में इस पार्टी की मौजूदा स्थिति तो यही है। जिन पार्टियों में बड़े दावेदारों को टिकट नहीं मिलेगा, वे कांग्रेस में आ सकते हैं। इससे पार्टी का वोट बैंक तो बढ़ सकता है, मगर सीटों में कोई बढ़ोतरी होगी, ऐसा बिल्कुल नजर नहीं आता। अखिलेश यादव को संभलकर और सतर्कता से आगे बढ़ना चाहिए। ध्यान रहे कि बिहार में बहुत कुछ हासिल करने के बाद भी आज तेजस्वी यादव कहां खड़े हैं। उनकी स्थिति क्यों ऐसी बनी है। ये तो उत्तरप्रदेश है, यहां मोदी और शाह, बाजी जीतने के लिए पूरा जोर लगा देंगे। भले ही चुनाव के बाद योगी को हटाने की अफवाहें चल रही हैं, लेकिन भाजपा का पलड़ा कमजोर नहीं है। असली खेल तो अभी शाह दिखाएंगे।