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आंखों देखी: देर से होती है 'छोटे आजम' की सुबह, रामपुर के कार्यकर्ता महसूस कर रहे 'बड़े आजम' की कमी

Fri, 11 Feb 2022 06:29 PM IST
Rahul Sampal राहुल संपाल
Updated Fri, 11 Feb 2022 06:29 PM IST
सार

उत्तर प्रदेश का रामपुर जिला समाजवादी पार्टी का गढ़ कहा जाता है और इसकी वजह भी साफ है, पिछले कई सालों से यहां समाजवादी पार्टी का वर्चस्व रहा है।

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UP Election 2022 Rampur assembly Azam Khan situation equation and political analysis all you need to know in Hindi
आजम खान - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

रात करीब आठ बजे... रामपुर शहर के जेल रोड इलाके की मुमताज पार्क कॉलोनी इन दिनों चुनावी शोरगुल से बिल्कुल अनजान है। न तो कोई बड़ा पोस्टर नजर आता है न ही कोई बैनर। कहने को तो यहां समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और उम्मीदवार आजम खान रहते हैं। लेकिन फिलहाल उनके घर के बाहर दो पुलिस जवानों के अलावा कोई नहीं है। पूछने पर पता चलता है कि घर से करीब दो किलोमीटर दूर ही खान साहब का चुनावी कार्यालय बना है... आप वहीं जाइए... चुनाव का काम वहीं से देखा जा रहा है। यहां आपको भी कोई नहीं मिलेगा... खान साहब तो नहीं हैं इसलिए अब यहां आने वालों की भीड़ कम हो गई है। 

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शहर की मुस्लिम बहुल कॉलोनी में दारुल अवाम नाम की कोठी में खान का दफ्तर करीब 40 सालों से चल रहा है। यहां उनके भरोसेमंद आसिफ राजा पूरा काम संभाल रहे हैं। फिर चाहे कार्यकर्ताओं की बैठक हो या फिर चाहे रामपुर कचहरी में खान पर चल रहे केस की जानकारी क्यों न देना हो... सब कुछ राजा ने अपने कंधों पर ले रखा है। पूछने पर वे कहते हैं, 20 वर्षों से खान साहब का चुनावी प्रबंधन देख रहा हूं... ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा... बस यही कह सकता हूं कि हमारे साहब रामपुर से जीत रहे हैं। फिर दबी जुबान में पूछते हैं कि आप तो शहर में घूमकर आ रहे हैं... लोगों से बातें भी खूब हुई होंगी... आप ही बताइए कि क्या माहौल है... फिर कहते हैं कि ये सच है कि चुनाव आयोग की सख्ती के कारण खान साहब के पोस्टर-बैनर नहीं दिख रहे है। हम कैंपेन तो कर रहे है लेकिन जेल में होने के कारण उनकी गैरमौजूदगी सभी को खल रही है। नहीं तो उनके चुनावी जलसे देखने और सुनने वाले होते थे।
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हालांकि इस कार्यालय में कार्यकर्ताओं की जुबान पर आजम खान के बड़े बेटे अब्दुल्ला आजम की चर्चा है। रात 12 बजे ठंड के बीच कार्यकर्ता उनसे मिलने के लिए इंतजार करते हैं। वे अब्दुल्ला को अपना बड़ा भाई बताते हुए कहते हैं कि हमारे भाई के पास दो जिम्मेदारियां हैं। पहली खान साहब की सीट की और यहां से 23 किलोमीटर दूर स्वार विधानसभा सीट जहां से वे खुद चुनावी लड़ रहे हैं। इसी बची रात 12.45 बजे मौजूद लोगों को फोन पर जानकारी मिलती है कि अब्दुल्लाह थोड़ी देर में रामपुर कार्यालय पहुंच जाएंगे। देरी होने पर पूछने पर एक कार्यकर्ता दबी जुबान में कहता है कि हम तो सालों से खान साहब के साथ जुड़े हैं। हमें तो मिलना है... चेहरा भी देखना है... क्योंकि चुनाव सिर पर हैं... लेकिन बस मिलने के लिए रात तक इंतजार करना ही पड़ता है। क्योंकि शहजादे खान साहब सुबह देर से उठते है। फिर टाइम होता है तो लोगों से मिलते नहीं तो सीधे प्रचार में चले जाते हैं।
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रात करीब डेढ़ बजे अब्दुल्लाह क्षेत्र के लोगों से मिलकर अपने पिता के चुनावी कार्यालय पर कार्यकर्ताओं से मिलने आते हैं। आते ही मौजूद लोगों से सलाम दुआ सलाम करते हुए सीधे आसिफ राजा के कमरे में जाते है ओर दिनभर का फीडबैक लेते हैं और अगले दिन की तैयारियों में जुट जाते हैं। अमर उजाला की टीम से चर्चा में वे कहते हैं, देखिए इस समय तो बात करना मुश्किल है... रात भी बहुत हो गई है... आप भी दिल्ली से आ रहे हैं... आप भी थके होंगे... आज देहात में प्रचार पर गया तो बहुत लेट हो गया... कल आप घर आइए... फ्रेश माइंड के साथ आपके साथ चर्चा होगी... शुक्रवार सुबह हमारे नेताजी अखिलेश यादव भी यहां प्रचार के लिए आ रहे हैं।

अमर उजाला की टीम जब अगले दिन शुक्रवार सुबह नौ बजे जब उनके चुनावी कार्यालय पहुंची तो कार्यालय पूरा सूनसान नजर आता है। मौजूद कार्यकर्ता कहते हैं कि आज अखिलेश भैया और खान साहब के बेटे का रामपुर में रोड शो है। सभी उसकी तैयारी में लगे हैं। अब्दुल्ला खान के घर पर होने के सवाल पर कार्यकर्ता कहते हैं कि साहब, अभी छोड़िए आप तो 11 बजे तक जाइये क्योंकि अभी तो वह सोकर नहीं उठे होंगे। फिर वो तर्क देते हैं कि चुनावी थकान के साथ मौसम का मिजाज भी समझिए... उन्हें सुबह उठने में देर हो ही जाती है। जब अमर उजाला की टीम उनसे मिलने मुमताज पार्क कॉलोनी के घर पहुंचती है तो मौजूद एक पुलिसकर्मी कहता है कि, घंटी बजाइए देखते हैं कौन आता है... क्योंकि आज बहुत मीडिया वाले आ चुके हैं और अभी तक तो गेट खुले नहीं हैं। सभी लौट रहे हैं। शायद अभी तक साहब सोकर नहीं उठे होंगे। इस बीच घर का आधा दरवाजा खोलकर एक महिला बोलती है कि सर, अभी तो साहब सोए हैं... रात में देर हो गई थी।

क्या कहता है चुनावी समीकरण
उत्तर प्रदेश का रामपुर जिला समाजवादी पार्टी का गढ़ कहा जाता है और इसकी वजह भी साफ है, पिछले कई सालों से यहां समाजवादी पार्टी का वर्चस्व रहा है। रामपुर जिले में कुल पांच विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें स्वार, चमरब्बा, बिलासपुर, रामपुर और मिलक हैं। साल 2017 के चुनाव में समाजवादी पार्टी को यहां की पांच में से तीन सीटों पर जीत हासिल हुई थी बाकि दो सीटें भाजपा ने जीती थीं। रामपुर विधानसभा सीट से सपा के कद्दावर नेता आजम खान लगातार नौ बार विधायक रह चुके हैं और यहां से मौजूदा सांसद भी हैं। रामपुर के जातीय समीकरण की बात करें तो 50 फीसदी से ज्यादा आबादी मुस्लिम है। लगभग 45 फीसदी हिंदू और तीन से चार फीसदी आबादी सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और अन्य आबादी है।

सपा का गढ़ रहा है रामपुर
समाजवादी पार्टी इन चुनावों में कई छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ रही हैं। इस बार बीजेपी और सपा में सीधी टक्कर मानी जा रही है। जिसकी वजह से सपा रामपुर में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती। इस बार एसपी ने अपने सबसे मजबूत उम्मीदवार को जेल बंद होने के बावजूद मैदान में उतारा है, जो फिलहाल सीतापुर जेल में बंद हैं।


रामपुर में समाजवादी पार्टी की अगर बात करें तो तीन विधानसभा सीटों पर अब आजम खान का वर्चस्व देखने को मिल सकता है क्योंकि यह न केवल मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र हैं बल्कि इन क्षेत्रों में आजम खान का सिक्का आज भी बुलंद है। इन तीनों विधानसभाओं में रामपुर की शहर विधानसभा, स्वार टांडा विधानसभा और चमरौआ विधानसभा है। मौजूदा स्थिति में भी इन तीनों विधानसभाओं में समाजवादी पार्टी के विधायक काबिज हैं। इसके अलावा मिलक विधानसभा पर भी इस बार सपा और भाजपा के बीच जबरदस्त टकराव देखने को मिलेगा।

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