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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   UP Election 2022: In Uttar Pradesh elections, former CM Akhilesh Yadav and BSP chief Mayawati are now moving forward on a new plan

उत्तर प्रदेश चुनाव: क्या है मायावती और अखिलेश का 'ई' प्लान, दांव पर अखिलेश की 'नाक' और बहन जी का 'अस्तित्व'

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Thu, 03 Feb 2022 07:46 PM IST
सार

राजनीतिक माहौल को देखें तो भाजपा व बसपा की टक्कर सपा से है। इस बार सपा आई तो बसपा खत्म हो सकती है। अखिलेश इस चुनाव को 'नाक की लड़ाई' मानकर चल रहे हैं। मायावती के लिए यह चुनाव 'अस्तित्व की लड़ाई' बना है। कांग्रेस पार्टी के लिए यह चुनाव अधिकतम पांच से दस फीसदी वोटों के बीच रहने की उम्मीद है...

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UP Election 2022: In Uttar Pradesh elections, former CM Akhilesh Yadav and BSP chief Mayawati are now moving forward on a new plan
अखिलेश और मायावती - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

उत्तर प्रदेश चुनाव में पूर्व सीएम अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती, अब एक नए प्लान पर आगे बढ़ रहे हैं। चूंकि ये विधानसभा चुनाव जहां एक तरफ सपा मुखिया अखिलेश यादव के लिए 'नाक' की लड़ाई बना है तो दूसरी ओर 'बहनजी' ने इसे अपने 'अस्तित्व' की लड़ाई मान लिया है। भले ही इन दोनों नेताओं ने चुनाव में अपने दलों का गठबंधन नहीं किया है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों ने इन्हें प्लान 'ई' बाबत तैयार रहने के लिए मजबूर कर दिया है। 'ई' मतलब 'इमरजेंसी', चुनावी नतीजे आने के बाद इस प्लान पर काम होगा।

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अगर सपा को बहुमत के लिए 30-35 सीटों की जरूरत पड़ती है तो वह बसपा का साथ ले सकती है। मायावती का भी यही प्रयास है कि उनकी पार्टी को 30-40 सीट मिलती हैं तो वे अखिलेश को समर्थन दे सकती हैं। हालांकि राजनीतिक जानकार यह भी कह रहे हैं कि चुनाव के बाद जो समीकरण बनेंगे, उनमें यदि भाजपा को कुर्सी तक पहुंचने के लिए 30-35 सीटों की जरूरत पड़ती है तो यहां भी बसपा की ओर से बातचीत करने की खातिर एक खिड़की खुली रखी गई है।

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नपे तुले ढंग से मायावती ने बोला हमला

मायावती ने बुधवार को आगरा में और गुरुवार को गाजियाबाद में चुनावी सभा की। उन्होंने लोगों को भरोसा दिलाया है कि वे लगातार चुनाव में सक्रिय हैं। दूसरी पार्टियां इसे जानबूझकर मुद्दा बना रही हैं। बसपा के वोटरों को गुमराह करने का प्रयास हो रहा है। दोनों रैलियों में मायावती ने नपे तुले ढंग से सपा, कांग्रेस और भाजपा पर हमला बोला। सपा के लिए उन्होंने कहा, इनकी सरकार में तो गुंडे-बदमाशों का राज रहा है। अखिलेश सरकार में सभी वर्गों के हितों की बात नहीं होती थी, केवल एक ही समुदाय के लिए काम किया गया। भाजपा शासन के दौरान दलितों के साथ अन्याय किया गया है। यहां पर तो आरएसएस का एजेंडा चलता है। इसके बाद कांग्रेस पर तंज कसते हुए पूर्व सीएम ने कहा, इस पार्टी को चुनाव के वक्त ही महिलाएं याद आती हैं। कांग्रेस पार्टी जब सत्ता में थी, तब उन्हें महिलाओं का कल्याण नजर नहीं आया। कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने वाले भी दलित, पिछड़े और आदिवासी ही थे। सत्ता प्राप्ति के बाद कांग्रेस पार्टी इन वर्गों को भूल गई थी। देशभर के किसान और मजदूर, भाजपा की केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई गलत नीतियों का खामियाजा भुगत रहे हैं।

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'बसपा' की राजनीतिक दुश्मन रही है ‘सपा’

उत्तर प्रदेश के चुनाव का गहराई से विश्लेषण कर रहे वरिष्ठ पत्रकार निर्मल यादव ने बताया, ये सभी जानते हैं कि 'बसपा' की राजनीतिक दुश्मन 'सपा' रही है। आज के चुनाव में सपा द्वारा बसपा के बड़े हिस्से में सेंध लगाने की बात कही जा रही है। दो दशक के चुनावी नतीजों को देखें, तो विधानसभा चुनाव में बसपा का मत प्रतिशत 20 से 30 फीसदी रहा है। इसी तरह लोकसभा चुनाव में बसपा को लगभग बीस फीसदी वोट मिले हैं। गत विधानसभा चुनाव में जब बसपा को 19 सीट मिलीं तो भी उसका वोट बैंक 22 फीसदी से कम नहीं हुआ। दूसरी तरफ सपा का वोट प्रतिशत 31 फीसदी पर रहता है। इस बार पार्टी को उम्मीद है कि यह 35 फीसदी से ऊपर चला जाएगा। भाजपा, सबसे ज्यादा यानी 41 फीसदी वोट बैंक पर टिकी है। राजनीतिक माहौल को देखें तो भाजपा व बसपा की टक्कर सपा से है। इस बार सपा आई तो बसपा खत्म हो सकती है। अखिलेश इस चुनाव को 'नाक की लड़ाई' मानकर चल रहे हैं। मायावती के लिए यह चुनाव 'अस्तित्व की लड़ाई' बना है। कांग्रेस पार्टी के लिए यह चुनाव अधिकतम पांच से दस फीसदी वोटों के बीच रहने की उम्मीद है।  

कांग्रेस और सपा पर निशाना क्यों…

अगर सपा या कांग्रेस अपने वोट बैंक में कुछ इजाफा करती हैं तो उसका सीधा नुकसान बसपा को होगा। यही वजह है कि मायावती ने अपनी पहली चुनावी रैली में कांग्रेस और सपा पर निशाना लगा दिया। इस चुनाव में मायावती का प्रयास है कि उनकी पार्टी को 40 से 50 सीट मिल जाएं। इससे वे चुनाव पश्चात होने वाली 'सौदेबाजी' में खुद को मजबूत स्थिति में खड़ा कर सकती हैं। निर्मल यादव का कहना है कि बसपा, दलित एवं पिछड़े, भाई-भाई का संवाद इस बार किसी के साथ भी कर सकती है। यानी मायावती ने दो खिड़की तैयार की हैं। इन पर नाम किसी का नहीं लिखा है, लेकिन इनमें से एक सपा व दूसरी भाजपा के लिए तैयार की गई है। यही वो 'इमरजेंसी' प्लान है, जो सपा और बसपा, दोनों ने तैयार किया है। इस प्लान के तहत अगर सपा, बहुमत के कुछ पीछे रहती है तो वह उसे आपातकालीन मदद दे सकती है। भाजपा, मदद मांगने की स्थिति में रहती है तो मायावती अपने 'इमरजेंसी' प्लान से भाजपा की मदद कर सकती हैं। मायावती अपनी आगामी रैलियों में जाटव के अलावा गैर जाटव वोटर, जैसे मुस्लिम, ब्राह्मण और अति पिछड़े वोटरों को रिझाने का प्रयास करेंगी।

जांच एजेंसियों के चलते कौन हुआ सॉफ्ट

क्या मायावती पर केंद्र सरकार ने अपनी जांच एजेंसियों के जरिए शिकंजा कस रखा है, इस बाबत राजनीतिक विश्लेषक निर्मल यादव कहते हैं, ऐसा तो है ही। आय से अधिक संपत्ति का केस मायावती और उनके परिवार पर चल रहा है। पिछले कई वर्षों से मायावती को भाजपा के प्रति सॉफ्ट देखा गया है। हालांकि सीबीआई केस तो अखिलेश यादव के खिलाफ भी है। वह खुलकर भाजपा से टक्कर ले रहे हैं। ये कहना गलत नहीं है कि मायावती ने अपने ई प्लान में भाजपा को भी रखा है। मायावती ने गुरुवार को गाजियाबाद के कविनगर रामलीला मैदान में आयोजित रैली में कहा, भाजपा सरकार, आरएसएस की संर्कीण नीतियां लागू करने में व्यस्त रहती है। धर्म के नाम पर तनाव और नफरत का माहौल तैयार किया जा रहा है। गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई बढ़ गई है। कांग्रेस और सपा के लिए मायावती ने कहा, इन दोनों दलों की दलित विरोधी नीतियां रही हैं। वे जानती हैं कि कांग्रेस, बसपा के वोट बैंक में सेंध लगा सकती है, इसलिए उन्होंने कांग्रेस को दलित विरोधी बता दिया। सपा सरकार में दलितों को सरकारी ठेकों में आरक्षण देना बंद कर दिया गया। चुनाव प्रचार खत्म होने तक मायावती का प्रयास यही रहेगा कि वे अखिलेश और कांग्रेस को निशाने पर रखें, ताकि ये दोनों दल बसपा के वोट बैंक में बड़ी सेंध न लगा सकें।

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