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उत्तर प्रदेश: समाजवादी पार्टी और भाजपा ने एक ही 'ब्रह्मास्त्र' से लड़ा इस बार का विधानसभा चुनाव, लेकिन चित हो गए अखिलेश!

Fri, 25 Mar 2022 04:15 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Fri, 25 Mar 2022 04:15 PM IST
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सार
समाजवादी पार्टी ने भाजपा और योगी आदित्यनाथ की सरकार को हराने वाली पार्टी के रूप में खुद को नंबर एक पर प्रोजेक्ट किया। चुनाव सर्वेक्षणों में सक्रिय रहने वाले रवि प्रकाश कहते हैं कि भाजपा ने सपा के इस अभियान को और मजबूती दे दी। दोनों पार्टियों ने वोटों के ध्रुवीकरण की राजनीति की...
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UP election 2022: BJP was know that akhilesh yadav can defeat yogi adityanath, but BJP projected samajwadi party as yadav muslim allaiance
अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ - फोटो : Amar Ujala (File Photo)

विस्तार

यूपी में चुनाव नतीजों को लेकर ढेर सारे विश्लेषण होते रहे हैं, हार-जीत के कारण तलाशे जाते रहे हैं लेकिन आखिरकार इन नतीजों ने प्रदेश के माहौल को एक बार फिर योगीमय बना दिया है। भीतर ही भीतर समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव को पार्टी का 125 सीटों से कम आना अखर रहा है। चुनाव के दौरान मैदान में पसीना बहा रहे सर्वेक्षण एजेंसियों के प्रतिनिधियों की मानें तो यह चुनाव ही निराला था। चुनाव में जातिगत अवधारणाएं खूब बनीं, लेकिन समाजवादी पार्टी के मंसूबों को पूरा नहीं कर पाई।



दूसरी तरफ जातिगत चुनाव से डर रही भाजपा ने पहले, दूसरे चरण के बाद राहत की सांस ले ली। दिलचस्प है कि भाजपा और सपा ने चुनाव को जीतने के लिए एक ही ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया और वो यह था कि अगर भाजपा और योगी को किसी से खतरा है तो वह है सपा और अखिलेश का गठबंधन। लेकिन यह दांव भी योगी आदित्यनाथ ही जीत गए।

भाजपा और योगी को सपा और अखिलेश ही हरा सकते हैं

समाजवादी पार्टी ने भाजपा और योगी आदित्यनाथ की सरकार को हराने वाली पार्टी के रूप में खुद को नंबर एक पर प्रोजेक्ट किया। चुनाव सर्वेक्षणों में सक्रिय रहने वाले रवि प्रकाश कहते हैं कि भाजपा ने सपा के इस अभियान को और मजबूती दे दी। दोनों पार्टियों ने वोटों के ध्रुवीकरण की राजनीति की। रवि प्रकाश कहते हैं कि वोटों के ध्रुवीकरण में भाजपा को पछाड़ना मुश्किल है। उसने हिंदुत्व के मुद्दे के उभार के साथ विकास, एक्सप्रेस-वे के निर्माण, सख्त प्रशासन का प्रचार करने के साथ-साथ मुख्य प्रतिद्वंदी के रूप में अखिलेश यादव को ही बनाए रखा है। बताते हैं कि समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश के सात चरणों वाले चुनाव में लगातार इसे अपने लिए वरदान समझा और भाजपा ने भी इसे इसी तरह से लिया।

लेकिन साथ में सपा की यादव-मुस्लिम की पार्टी वाली छवि बनाने में सफल हो गई। सपा पूरे अभियान में भाजपा के आक्रमण की काट खोजने और प्रयोग करने में चूक गई। भाजपा ने यादव प्रत्याशी को सीमित टिकट दिया, मुसलमान को दिया ही नहीं। अरविंद मिश्रा कहते हैं कि नतीजतन पहले चरण से ही अधिकांश मुसलमान वोट एक तरह से सपा के साथ चला गया। यादव भी सपा के साथ रहे लेकिन और जातियां खुलकर नहीं जुड़ सकीं। बसपा का साथ दलितों ने दिया। पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाट मतों का सपा-रालोद गठबंधन तथा भाजपा में बंटवारा हो गया। पहले के दो चरण ऐसे थे जहां यादव मतों की संख्या सीमित थी। यहां दलित-मुसलमान मिलकर जीत का समीकरण तय कर रहे थे। नतीजन भाजपा ने बाजी मार ली।

क्यों छिटक गए जाट, रालोद-सपा के साथ आए टुकड़े में  

डा. नरेंद्र तोमर जाट हैं। सुरेंद्र राणा भी जाट हैं। एक ने सपा की पैरोकारी की, तो दूसरे ने भाजपा की। तर्क सुनिए लाजवाब है। सुरेंद्र कहते हैं कि मथुरा की मांट सीट जाट बाहुल है। यहां से राष्ट्रीय लोकदल ने प्रत्याशी खड़ा किया था। वह प्रत्याशी पिछले 2017 के चुनाव में कुछ सौ वोट से हारा था। लेकिन समाजवादी पार्टी के मुखिया के दबाव में वहां सपा का प्रत्याशी लड़ा। इसी तरह सपा-रालोद ने जाट लैंड में भी मुसलमानों को जमकर टिकट दिया। दूसरा बड़ा कारण सर्वेक्षण एजेंसी के लिए काम करने वाले नितिन प्रधान बताते हैं।


नितिन का कहना है कि यादव और जाटों में चौधरी अजीत सिंह के जमाने से समीकरण फिट नहीं बैठते। मुलायम सिंह यादव के समय में हमेशा इस समीकरण को समझकर रालोद के साथ समाजवादी पार्टी राजनीतिक रिश्ता बनाती थी। तब दोनों को फायदा होता था। विधानसभा चुनाव 2022 में नए जयंत और युवा अखिलेश इस समीकरण को भूल गए। लिहाजा किसान आंदोलन से भाजपा से नाराज समाज फिर भ्रमित होकर भाजपा की तरफ लौट गया। इसे अखिलेश और जयंत अपने पक्ष में नहीं खींच पाए। जबकि डा. संजीव बालियान समेत तमाम नेताओं के सहारे गृह मंत्री अमित शाह ने लगातार भाजपा के पाले में उन्हें बनाए रखना जारी रखा।

छह जिलों में भाजपा नहीं जीत पाई सीट तो 30 में सपा का नहीं खुला खाता

विधानसभा चुनाव में जातिगत समीकरण और भाजपा या सपा के गढ़ का भी दांव खूब चला। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में पूरा सिक्का जमा दिया। जौनपुर, आजमगढ़, गाजीपुर समेत तमाम जिलों में समाजवादी पार्टी की साइकिल भी खूब चली। 30 जिलों में समाजवादी पार्टी को शून्य सीटें आईं, तो छह जिलों में भाजपा को भी सफलता हाथ नहीं लगी। रोहतास रस्तोगी कहते हैं कि चला सब कुछ, लेकिन प्रत्याशियों के चयन में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल दोनों ने पर्याप्त गंभीरता नहीं दिखाई।

जबकि भाजपा ने हर सीट के उम्मीदवारों के मामले में गंभीरता को बनाए रखा। अखिलेश चतुर्वेदी कहते हैं कि 403 सीटों में से मानकर चलिए 120 सीटों पर बसपा के कारण समाजवादी पार्टी हार गई। मायावती ने चुनाव प्रचार को धीमा रखा। बताते हैं कि वोट का प्रतिशत केवल भाजपा का ही नहीं बढ़ा, समाजवादी पार्टी का भी बढ़ा है। इसी तरह से वोट प्रतिशत केवल बसपा का ही नहीं घटा है, बल्कि कांग्रेस का भी घटा है। दूसरे लगभग विधानसभा सीटों पर बसपा को जीत भले नहीं मिली, लेकिन वोट ठीक-ठाक मिले हैं।

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