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UP Election 2022: तालिबान के बाद अब ‘अब्बाजान', क्या कड़वे चुनाव अभियान का टोन सेट हो गया
Tue, 14 Sep 2021 06:31 PM IST
प्रतिभा ज्योति
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
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Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Tue, 14 Sep 2021 06:31 PM IST
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सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
- फोटो :
amar ujala
विस्तार
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘अब्बाजान’ वाले बयान ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पक्ष-विपक्ष दोनों को एक मुद्दा दे दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहली बार अब्बाजान (पिता) शब्द का इस्तेमाल अगस्त में अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव के लिए किया था। अब्बाजान वाले इस बयान पर उत्तर प्रदेश में घमासान शुरू हो गया था। दूसरी बार मुख्यमंत्री ने इसका इस्तेमाल रविवार को कुशीनगर की रैली में किया। जिसके बाद फिर विपक्ष उन पर हमलावर हो गया है।हालांकि सपा इस पर अभी सधी हुई प्रतिक्रिया दे रही है ताकि वह भाजपा की ध्रुवीकरण की जाल में न फंस जाएं। वैसे भी सपा प्रमुख अखिलेश यादव हमेशा अपने पिता पर की गई किसी भी टिप्पणी के बारे में बहुत संवेदनशील रहे हैं इसलिए इस विवाद पर उन्होंने इतना कहा शासन की भाषा बदल गई है। इससे पहले अखिलेश यादव ने कहा था मुख्यमंत्री को अपनी भाषा पर संयम रखना चाहिए।
दरअसल चुनावी सर्वे यह बता रहे हैं कि इस चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच है। इसिलए भाजपा सपा पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाकर लगातार उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। मुख्यमंत्री से लेकर दूसरे भाजपा नेता भी अक्सर यह पूछते रहते हैं कि अखिलेश यादव को अब्बाजन शब्द में क्या आपत्तिजनक लगता है। भाजपा का आरोप है "समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोट चाहती है, लेकिन अब्बाजन शब्द से समस्या है।"
वही दूसरी तरफ सपा नेताओं का कहना है कि सीएम 2019 के चुनावों की तरह और भाजपा 2017 के विधानसभा चुनाव की तरह ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है। सपा के एक नेता ने कहा पिछला चुनाव आपको याद होगा जब मुख्यमंत्री ने अली-बजरंगबली का इस्तेमाल यह बताने के लिए किया था कि चुनाव में हिंदू भाजपा का समर्थन कर रहे हैं। वे इस बार भी यही करने की कोशिश कर रहे हैं। मुख्यंत्री को अपने काम पर भरोसा नहीं है इसलिए चुनाव अभियान के लिए उन्हें ऐसे मुद्दों की जरूरत फिर पड़ने लगी है।
सियासी हथियार से दुश्मनों पर वार
राजनीतिक विश्लेषक भी यही कहते हैं अब्बाजान शब्द का इस्तेमाल करने में कोई तात्कालिक वजह नजर नहीं आती है। यदि बिना किसी तात्कालिक वजह के इस तरह की शब्दावली का प्रयोग हो रहा है, तो इसका मतलब है 2017 में भाजपा का ध्रुवीकरण का जो फॉर्मूला कामयाब था उसे दुहराने की कोशिश की जा रही है। पिछले चुनाव में हिंदू-मुसलमान, श्मशान-कब्रिस्तान करके भाजपा ने रिकॉर्ड तोड़ बहुमत हासिल की थी, पार्टी एक बार फिर उसी फॉर्मूले को आजमाना चाहती है। पिछली चुनाव में भाजपा हर फेज में एक नया जुमला उड़ाती गई। भाजपा ने उस समय एक नैरेटिव सेट कर दिया था। ठीक वही अभी कर रही है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
- फोटो :
amar ujala
बयान पर हैरानी नहीं
विश्लेषक कहते हैं कि इस तरह की बयानबाजी पर हैरानी भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह तय है कि इस चुनाव में भी भाजपा अपने पुराने सियासी हथियार निकाल कर विपक्ष पर वार करेगी। इसलिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अभी से चुनावी रंग में नजर आ रहे हैं और यूपी में तालिबान, अब्बाजान की बात होने लगी है। योगी आदित्यनाथ बिना दुराव-छिपाव के लव जिहाद, धर्मांतरण, जनसंख्या नियंत्रण सरीखे कानूनों के सहारे हिंदू मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में मोड़ने के दांव पहले ही चलते रहे हैं।
एक बार वे फिर अब्बजान के बहाने विरोधियों पर निशाना साध रहे हैं। ‘सबका साथ-सबका विकास’ के साथ ‘सबका विश्वास’ जोड़ने वाली भाजपा सरकार यह बताने से नहीं चूकना चाहती है कि पिछली सरकारों की मुस्लिम तुष्टिकरण की वजह से प्रदेश का कितना नुकसान हुआ। यही वजह है कि यूपी चुनाव में तालिबान का जिक्र हो रहा है।
सूत्र बताते हैं कि भाजपा कार्यकर्ता तालिबान के शासन की बात गांव में पहुंचा रहे हैं। वहीं योगी आदित्यनाथ से लेकर भाजपा के बाकी नेता भी तालिबानी सोच को लेकर सपा को घेर रहे हैं। तालिबान का अफगानिस्तान में कब्जा और इसके मद्देनजर विभिन्न मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर उत्तर प्रदेश भाजपा के सोशल मीडिया अभियान के निशाने पर समाजवादी पार्टी है। तालिबानी शासन को लेकर भाजपा के प्रचार अभियान में सबसे ज्यादा निशाने पर सपा है। जिसमें सपा पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि सपा मुसलमानों का तुष्टिकरण करती है।
भाजपा का टेस्टेड फार्मूला
उत्तर प्रदेश की राजनीति को बीते तीन दशक से करीब से देख रहे वरिष्ठ पत्रकार राजकेश्वर सिंह कहते हैं, ऐसा नहीं है कि प्रदेश की सियासत में इस तरह की शब्दावली का प्रयोग अचानक होने लगा है। पार्टी सोच-समझ कर ऐसा कर रही है। भाजपा के तीन दशक के चुनाव अभियान को देखें तो अयोध्या में राम मंदिर निर्माण हमेशा उसके एजेंडे पर था, फिर भी वह प्रदेश की सत्ता में कभी अपने बूते क़ाबिज़ नहीं हो सकी। लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में जब उसने सबसे ज्यादा जोर देकर ध्रुवीकरण का फॉर्मूला अपनाया तो वह चुनावी जीत की उस बुलंदी पर पहुंच गई, जहां कई दशक से कोई पार्टी नहीं पहुंच सकी थी।
ऐसे में यह उसका टेस्टेड फार्मूला है और नहीं लगता कि वह उसे फिर नहीं आजमाएगी। इसलिए संभव है कि पार्टी एक बार फिर चुनाव जीतने की उसी रणनीति पर काम कर रही हो। इस बार भी चुनाव में पार्टी मंदिर निर्माण की बात करेगी और सरकार की उपलब्धियां भी बताएगी लेकिन चुनाव में हिंदू-मुसलमान का मुद्दा उठ सकता है।
विश्लेषक कहते हैं कि इस तरह की बयानबाजी पर हैरानी भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह तय है कि इस चुनाव में भी भाजपा अपने पुराने सियासी हथियार निकाल कर विपक्ष पर वार करेगी। इसलिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अभी से चुनावी रंग में नजर आ रहे हैं और यूपी में तालिबान, अब्बाजान की बात होने लगी है। योगी आदित्यनाथ बिना दुराव-छिपाव के लव जिहाद, धर्मांतरण, जनसंख्या नियंत्रण सरीखे कानूनों के सहारे हिंदू मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में मोड़ने के दांव पहले ही चलते रहे हैं।
एक बार वे फिर अब्बजान के बहाने विरोधियों पर निशाना साध रहे हैं। ‘सबका साथ-सबका विकास’ के साथ ‘सबका विश्वास’ जोड़ने वाली भाजपा सरकार यह बताने से नहीं चूकना चाहती है कि पिछली सरकारों की मुस्लिम तुष्टिकरण की वजह से प्रदेश का कितना नुकसान हुआ। यही वजह है कि यूपी चुनाव में तालिबान का जिक्र हो रहा है।
सूत्र बताते हैं कि भाजपा कार्यकर्ता तालिबान के शासन की बात गांव में पहुंचा रहे हैं। वहीं योगी आदित्यनाथ से लेकर भाजपा के बाकी नेता भी तालिबानी सोच को लेकर सपा को घेर रहे हैं। तालिबान का अफगानिस्तान में कब्जा और इसके मद्देनजर विभिन्न मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर उत्तर प्रदेश भाजपा के सोशल मीडिया अभियान के निशाने पर समाजवादी पार्टी है। तालिबानी शासन को लेकर भाजपा के प्रचार अभियान में सबसे ज्यादा निशाने पर सपा है। जिसमें सपा पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि सपा मुसलमानों का तुष्टिकरण करती है।
भाजपा का टेस्टेड फार्मूला
उत्तर प्रदेश की राजनीति को बीते तीन दशक से करीब से देख रहे वरिष्ठ पत्रकार राजकेश्वर सिंह कहते हैं, ऐसा नहीं है कि प्रदेश की सियासत में इस तरह की शब्दावली का प्रयोग अचानक होने लगा है। पार्टी सोच-समझ कर ऐसा कर रही है। भाजपा के तीन दशक के चुनाव अभियान को देखें तो अयोध्या में राम मंदिर निर्माण हमेशा उसके एजेंडे पर था, फिर भी वह प्रदेश की सत्ता में कभी अपने बूते क़ाबिज़ नहीं हो सकी। लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में जब उसने सबसे ज्यादा जोर देकर ध्रुवीकरण का फॉर्मूला अपनाया तो वह चुनावी जीत की उस बुलंदी पर पहुंच गई, जहां कई दशक से कोई पार्टी नहीं पहुंच सकी थी।
ऐसे में यह उसका टेस्टेड फार्मूला है और नहीं लगता कि वह उसे फिर नहीं आजमाएगी। इसलिए संभव है कि पार्टी एक बार फिर चुनाव जीतने की उसी रणनीति पर काम कर रही हो। इस बार भी चुनाव में पार्टी मंदिर निर्माण की बात करेगी और सरकार की उपलब्धियां भी बताएगी लेकिन चुनाव में हिंदू-मुसलमान का मुद्दा उठ सकता है।
भदोही में अखिलेश यादव
- फोटो :
अमर उजाला
मीडिया जैसा दिखा रही वैसा नहीं है
मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के पूर्व चांसलर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खास माने जाने वाले जफर सरेशवाला कहते हैं मैंने एक ट्वीट किया था मेरे अब्बाजान 1957 में आईआईटी खड़गपुर से पढ़ाई की थी और उन्होंने अमेरिका की स्कॉलरशिप को ठुकरा दिया। मेरे अब्बाजान ने इस देश में रहना स्वीकार किया और उन्होंने मुझे नैतिकता सिखाई। इसलिए अब्बाजान को गलत तरीके से नहीं लेना चाहिए।
वे कहते हैं मैंने यूपी की काफी यात्राएं की हैं और मुझे लगता है कि ध्रुवीकरण की बात गलत है और इस बार चुनाव अभियान वैसा नहीं होगा जैसा मीडिया सोच रही है। क्योंकि जमीन पर ऐसी कोई बात नहीं है। सियासी पार्टियों की बात अलग है, मुसलमान अब प्रतिक्रिया नहीं देना चाहता। जिसको हुकूमत करनी है वो करे आम मुसलमान शिक्षा और रोजगार पर ध्यान दे रहा है। आम मुसलमान यह सोचता है कि इस सरकार ने ऐसा हमारा क्या छीन लिया जो पिछली सरकार ने दिया था।
काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती
उत्तर प्रदेश की राजनीति को बेहतर ढंग से समझने वाले बीबीसी के पूर्व पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी कहते हैं ‘अब्बाजान’ की बात शुरू करना यह भाजपा की सोची-समझी रणनीति है। यह कुछ अलग नहीं है। वह इस तरह की शब्दावली का प्रयोग करके यह दिखाने की कोशिश करती है केवल वह ही हिंदू परस्त है और बांकी पार्टियों में उनका भविष्य नहीं है। लेकिन जरूरी नहीं कि हर बार हिंदुत्व का फॉर्मूला कामयाब ही हो जाए।
त्रिपाठी कहते हैं काठ की हांडी हर बार नहीं चढाई जा सकती। योगी सरकार इस बार चुनाव में अपने काम को लेकर चुनाव में उतर सकती है। यदि काम के बजाए यदि आप हिंदू-मुस्लिम की बात की जा रही है तो इसका मतलब है कि आप अपने परफॉर्मेंस को लेकर खुद आश्वस्त नहीं है।
क्यों है सपा भाजपा के निशाने पर
कई राज्यों में चुनाव नजदीक आने के साथ, हर साल 'इफ्तार' आयोजित करने वाली 'धर्मनिरपेक्ष' पार्टियां अब 'इच्छाधारी हिंदू' बनने के लिए तैयार हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कुछ महीने दूर हैं, और उससे पहले अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी मंदिर की दौड़ में हैं। पिछले कुछ साल तक तक लगभग हर पार्टी मुसलमानों को खुश करने और जीत सुनिश्चित करने के लिए उन्हें अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही थी। समाजवादी पार्टी लंबे समय तक एमवाई समीकरण के सहारे अपने सियासी आधार को मजबूत करती रही है। इस सूची में कांग्रेस और बसपा भी शामिल है। जबकि भाजपा पूरी तरह हिंदू वोटों पर निर्भर थी।
मुस्लिम तुष्टीकरण सपा, बसपा और कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा था। इसलिए यह पार्टियां और उनके नेता मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए भाजपा के निशाने पर हैं। चूंकि मुख्य मुकाबला इस बार सपा के साथ है और योगी आदित्यनाथ से पहले की सरकार सपा की थी इसलिए निशाने पर अखिलेश यादव ज्यादा हैं। 2017 में भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे के आगे फेल होने वाली सपा ने 2019 में आम चुनाव से पहले विष्णु मंदिर के निर्माण की बात कही।
अखिलेश यादव ने घोषणा की कि वह चंबल क्षेत्र में एक शानदार विष्णु मंदिर का निर्माण करेंगे, लेकिन सॉफ्ट हिंदुत्व का यह कार्ड नहीं चल पाया। 2017 के चुनाव से ठीक पहले अखिलेश ने मदरसों और इबादतगाहों में दस्तक दी। लखनऊ की कांशीराम उर्दू, अरबी फारसी यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती यूनिवर्सिटी कर दिया।
सहारनुपर के मेडिकल कालेज का नाम महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना महमूद हसन के नाम पर किया गया। हथकरघा बुनकर पेंशन योजना, उर्दू अकादमी, हज यात्रियों को दी जाने वाली सहूलियत, गाजियाबाद हज हाउस का लोकार्पण, लगभग 8000 कब्रिस्तानों की चारदीवारी का निर्माण, मदरसों में सेवा नियमावली लागू करने, और मुस्लिम बहुल इलाकों में मॉडल इंटर कालेज खोलने की योजना का बढ़-चढ़ कर प्रयास किया गया।
मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के पूर्व चांसलर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खास माने जाने वाले जफर सरेशवाला कहते हैं मैंने एक ट्वीट किया था मेरे अब्बाजान 1957 में आईआईटी खड़गपुर से पढ़ाई की थी और उन्होंने अमेरिका की स्कॉलरशिप को ठुकरा दिया। मेरे अब्बाजान ने इस देश में रहना स्वीकार किया और उन्होंने मुझे नैतिकता सिखाई। इसलिए अब्बाजान को गलत तरीके से नहीं लेना चाहिए।
वे कहते हैं मैंने यूपी की काफी यात्राएं की हैं और मुझे लगता है कि ध्रुवीकरण की बात गलत है और इस बार चुनाव अभियान वैसा नहीं होगा जैसा मीडिया सोच रही है। क्योंकि जमीन पर ऐसी कोई बात नहीं है। सियासी पार्टियों की बात अलग है, मुसलमान अब प्रतिक्रिया नहीं देना चाहता। जिसको हुकूमत करनी है वो करे आम मुसलमान शिक्षा और रोजगार पर ध्यान दे रहा है। आम मुसलमान यह सोचता है कि इस सरकार ने ऐसा हमारा क्या छीन लिया जो पिछली सरकार ने दिया था।
काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती
उत्तर प्रदेश की राजनीति को बेहतर ढंग से समझने वाले बीबीसी के पूर्व पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी कहते हैं ‘अब्बाजान’ की बात शुरू करना यह भाजपा की सोची-समझी रणनीति है। यह कुछ अलग नहीं है। वह इस तरह की शब्दावली का प्रयोग करके यह दिखाने की कोशिश करती है केवल वह ही हिंदू परस्त है और बांकी पार्टियों में उनका भविष्य नहीं है। लेकिन जरूरी नहीं कि हर बार हिंदुत्व का फॉर्मूला कामयाब ही हो जाए।
त्रिपाठी कहते हैं काठ की हांडी हर बार नहीं चढाई जा सकती। योगी सरकार इस बार चुनाव में अपने काम को लेकर चुनाव में उतर सकती है। यदि काम के बजाए यदि आप हिंदू-मुस्लिम की बात की जा रही है तो इसका मतलब है कि आप अपने परफॉर्मेंस को लेकर खुद आश्वस्त नहीं है।
क्यों है सपा भाजपा के निशाने पर
कई राज्यों में चुनाव नजदीक आने के साथ, हर साल 'इफ्तार' आयोजित करने वाली 'धर्मनिरपेक्ष' पार्टियां अब 'इच्छाधारी हिंदू' बनने के लिए तैयार हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कुछ महीने दूर हैं, और उससे पहले अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी मंदिर की दौड़ में हैं। पिछले कुछ साल तक तक लगभग हर पार्टी मुसलमानों को खुश करने और जीत सुनिश्चित करने के लिए उन्हें अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही थी। समाजवादी पार्टी लंबे समय तक एमवाई समीकरण के सहारे अपने सियासी आधार को मजबूत करती रही है। इस सूची में कांग्रेस और बसपा भी शामिल है। जबकि भाजपा पूरी तरह हिंदू वोटों पर निर्भर थी।
मुस्लिम तुष्टीकरण सपा, बसपा और कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा था। इसलिए यह पार्टियां और उनके नेता मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए भाजपा के निशाने पर हैं। चूंकि मुख्य मुकाबला इस बार सपा के साथ है और योगी आदित्यनाथ से पहले की सरकार सपा की थी इसलिए निशाने पर अखिलेश यादव ज्यादा हैं। 2017 में भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे के आगे फेल होने वाली सपा ने 2019 में आम चुनाव से पहले विष्णु मंदिर के निर्माण की बात कही।
अखिलेश यादव ने घोषणा की कि वह चंबल क्षेत्र में एक शानदार विष्णु मंदिर का निर्माण करेंगे, लेकिन सॉफ्ट हिंदुत्व का यह कार्ड नहीं चल पाया। 2017 के चुनाव से ठीक पहले अखिलेश ने मदरसों और इबादतगाहों में दस्तक दी। लखनऊ की कांशीराम उर्दू, अरबी फारसी यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती यूनिवर्सिटी कर दिया।
सहारनुपर के मेडिकल कालेज का नाम महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना महमूद हसन के नाम पर किया गया। हथकरघा बुनकर पेंशन योजना, उर्दू अकादमी, हज यात्रियों को दी जाने वाली सहूलियत, गाजियाबाद हज हाउस का लोकार्पण, लगभग 8000 कब्रिस्तानों की चारदीवारी का निर्माण, मदरसों में सेवा नियमावली लागू करने, और मुस्लिम बहुल इलाकों में मॉडल इंटर कालेज खोलने की योजना का बढ़-चढ़ कर प्रयास किया गया।
अखिलेश यादव व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ।
- फोटो :
amar ujala
योगी-अखिलेश के बीच मुकाबला
योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव आगामी यूपी चुनाव में एक-दूसरे से लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 से पहले, पूर्व सीएम अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए वोट शेयर हथियाने के लिए हिंदुओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। सत्ता में दोबारा आने के लिए उन्होंने दावा किया कि वह योगी आदित्यनाथ की तुलना में एक 'बड़े हिंदू' हैं। जबकि भाजपा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेगी और वे हिंदुत्व का ब्रांड माने जाते हैं।
2022 का चुनाव भाजपा के सामने बड़ी चुनौती
उत्तर प्रदेश में मौजूदा सीएम योगी आदित्यनाथ और भाजपा के सामने कई दलों की चुनौती है। समाजवादी पार्टी के साथ तो भाजपा की कड़ी टक्कर है ही इसके अलावा चुनौती देने के लिए कई मोर्चे और सामने आए हैं। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लमीन ने घोषणा की है कि वे सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी गठबंधन में चुनाव लड़ रही है।
आप, शिवसेना और जदयू जैसी पार्टियों ने घोषणा की है कि वे यूपी चुनाव लड़ेंगे। सपा प्रमुख अखिलेश सिंह यादव ने कहा है कि सपा केवल 2022 के विधानसभा चुनावों के लिए छोटे राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करेगी। मायावती पहले ही घोषणा कर चुकी हैं कि उनकी पार्टी केवल पंजाब में अकाली दल के साथ गठबंधन करते हुए यूपी और उत्तराखंड में अकेले चुनाव लड़ेगी। कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही है प्रियंका गांधी के नेतृत्व में आक्रामक रूप से जुटी हुई है। इस लिहाज से भाजपा के लिए चुनौती बड़ी है।
योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव आगामी यूपी चुनाव में एक-दूसरे से लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 से पहले, पूर्व सीएम अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए वोट शेयर हथियाने के लिए हिंदुओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। सत्ता में दोबारा आने के लिए उन्होंने दावा किया कि वह योगी आदित्यनाथ की तुलना में एक 'बड़े हिंदू' हैं। जबकि भाजपा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेगी और वे हिंदुत्व का ब्रांड माने जाते हैं।
2022 का चुनाव भाजपा के सामने बड़ी चुनौती
उत्तर प्रदेश में मौजूदा सीएम योगी आदित्यनाथ और भाजपा के सामने कई दलों की चुनौती है। समाजवादी पार्टी के साथ तो भाजपा की कड़ी टक्कर है ही इसके अलावा चुनौती देने के लिए कई मोर्चे और सामने आए हैं। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लमीन ने घोषणा की है कि वे सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी गठबंधन में चुनाव लड़ रही है।
आप, शिवसेना और जदयू जैसी पार्टियों ने घोषणा की है कि वे यूपी चुनाव लड़ेंगे। सपा प्रमुख अखिलेश सिंह यादव ने कहा है कि सपा केवल 2022 के विधानसभा चुनावों के लिए छोटे राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करेगी। मायावती पहले ही घोषणा कर चुकी हैं कि उनकी पार्टी केवल पंजाब में अकाली दल के साथ गठबंधन करते हुए यूपी और उत्तराखंड में अकेले चुनाव लड़ेगी। कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही है प्रियंका गांधी के नेतृत्व में आक्रामक रूप से जुटी हुई है। इस लिहाज से भाजपा के लिए चुनौती बड़ी है।