फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Up election 2022: 57 seats in the 6th phase and 54 seats in the 7th phase, will write the fate of the new Chief Minister of the state

UP Election 2022: निर्णायक मोड़ पर पहुंचा चुनाव, दो चरणों के बाद तय हो जाएगा कौन बनेगा अगला सिकंदर?

Mon, 28 Feb 2022 06:04 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Mon, 28 Feb 2022 06:04 PM IST
विज्ञापन
सार
छठे चरण में 10 जिलों की 57 विधानसभा सीटों का चुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ में होने जा रहा है। चुनाव लड़कर विधायक बनने के लिए पहली बार मुख्यमंत्री भी चुनाव मैदान में हैं और उनकी सीट को चुनावी समर में फंसा देने के इरादे से अखिलेश यादव ने पूरा जोर लगा दिया है। गोरखपुर शहरी सीट से भाजपा नेता स्व. उपेन्द्र दत्त शुक्ला की पत्नी सुभावती शुक्ला मुख्यमंत्री के खिलाफ मैदान में हैं...
loader
Up election 2022: 57 seats in the 6th phase and 54 seats in the 7th phase, will write the fate of the new Chief Minister of the state
योगी आदित्यनाथ - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

छठे चरण की 57 और सातवें चरण की 54 सीटों के साथ ही प्रदेश की बची हुईं 111 विधानसभा सीटों का चुनाव प्रदेश के नए सिंकदर का भाग्य लिखने वाला होगा। इसे ध्यान में रखकर भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस ने पूरा जोर लगा दिया है। प्रधानमंत्री मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ-साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल के नेताओं ने पूर्वी उत्तर प्रदेश का रुख कर लिया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी पूरी ताकत झोंक दी है। कांग्रेस के रणनीतिकारों को इन दोनों चरणों में दर्जन भर सीटें जीत लेने का भरोसा है। जबकि बसपा प्रमुख मायावती के लिए भी यह चरण काफी अहम है।



भाजपा के उत्तर प्रदेश के संगठन मंत्री सुनील बंसल हर रोज और लगातार विधानसभा सीट के प्रभारियों, नेताओं, प्रत्याशियों से फीडबैक लेने में जुटे हैं। मंत्री पीयूष गोयल, अनुराग ठाकुर और स्मृति ईरानी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के आखिरी दो चरणों की लड़ाई के लिए कमर कस ली है। भाजपा के शीर्ष नेता भी मान रहे हैं कि लड़ाई कांटे की है। एक केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हमारे गृहमंत्री अमित शाह ने भी अभी उत्तर प्रदेश में सीटों को लेकर अपनी भविष्यवाणी नहीं की है। हालांकि वह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में सरकार भाजपा बनाएगी। भाजपा में ही एक गुट और है, वह भावी मुख्यमंत्री को लेकर संवेदनशील हो रहा है। समझा जा रहा है कि सात मार्च को मतदान खत्म होते ही इसकी भी कसरत शुरू हो जाएगी।

प्रोपेगैंडा वॉर भी खूब, सोशल मीडिया पर फैला जीत हार का गणित

इस बार के चुनाव में सोशल मीडिया भी खूब राजनीतिक रंग में रंगा है। भाजपा, सपा, बसपा, और कांग्रेस के पक्ष में सोशल मीडिया पर जमकर पोस्ट चलाई जा रही हैं। करहल में मतदान के दिन राजनीतिक प्रोपेगैंडा ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के चुनाव हारने की भविष्यवाणी कर दी थी। 27 फरवरी को उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, 90 के दशक से निर्दलीय जीत रहे कुंडा के रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के चुनाव हारने की भविष्यवाणी हो चुकी है। अगली भविष्यवाणी छठे चरण में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, स्वामी प्रसाद मौर्य, ओमप्रकाश राजभर, दारा सिंह चौहान की सीट फंसने, चुनाव हारने की खबरों ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया है। खबरों में जौनपुर की मल्हनी सीट से चुनाव लड़ रहे बाहुबली धनंजय सिंह भी हॉट उम्मीदवार बने हुए हैं। इसी तरह से सातवें चरण के लिए नौ जिलों की 54 विधानसभा सीटों पर भी मुकाबला कड़ा बताया जा रहा है।

मुख्यमंत्री की अग्निपरीक्षा और अखिलेश के सामने दमखम दिखाने की चुनौती

छठे चरण में 10 जिलों की 57 विधानसभा सीटों का चुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ में होने जा रहा है। इसमें दर्जनों विधानसभा सीटों पर मुख्यमंत्री के प्रिय उम्मीदवार मैदान में हैं। चुनाव लड़कर विधायक बनने के लिए पहली बार मुख्यमंत्री भी चुनाव मैदान में हैं और उनकी सीट को चुनावी समर में फंसा देने के इरादे से अखिलेश यादव ने पूरा जोर लगा दिया है। गोरखपुर शहरी सीट से भाजपा नेता स्व. उपेन्द्र दत्त शुक्ला की पत्नी सुभावती शुक्ला मुख्यमंत्री के खिलाफ मैदान में हैं। गोरखपुर के चुनाव प्रचार को टक्कर का बनाने के लिए अखिलेश यादव ने सहयोगियों को भी विशेष तौर से लगाया है। बसपा के ख्वाजा समशुद्दीन, भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद भी ताल ठोंक रहे हैं। कांग्रेस की चेतना पांडे योगी को चुनौती दे रही हैं। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के लिए भी गोरखपुर अहम है। बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, महराजगंज, कुशीनगर, बस्ती, संतकबीर नगर, अंबेडकरनगर, देवरिया में से तीन दर्जन सीटें ऐसी हैं, जहां परोक्ष रूप से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। इसी चरण में भाजपा को छोड़कर समाजवादी पार्टी में आए स्वामी प्रसाद मौर्य का भी इम्तिहान हो जाएगा। माना जा रहा है कि स्वामी प्रसाद मौर्य को काफी कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रचार के लिए बबलू राय, युवा हिन्दू वाहिनी के नेताओं तथा पदाधिकारियों ने पूरी ताकत झोंक दी है। कुल मिलाकर मकसद योगी की जीत के अंतर को एतिहासिक बनाना है।

मंदिर का क्या होगा, क्या बरकार रहेगा मठ का परचम!

गोरखपुर की मुख्य पहचान गीता प्रेस और गोरक्षा पीठ (गोरखनाथ मंदिर) है। 60 के दशक से मंदिर चुनाव में कभी नहीं हारा है। इस बार मंदिर के महंत, प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहली बार विधायकी का चुनाव लड़ने के लिए मैदान में हैं। गोरखपुर ब्राह्मण बहुल सीट है। शहरी सीट पर 60-65 हजार ब्राह्मण मतदाता हैं। मुख्यमंत्री को जिस जाति (क्षत्रिय) से राजनीतिक रूप से टैग किया जा रहा है, उसके मतदाताओं की संख्या 28-35 हजार है। वैश्य समाज ठीक-ठाक संख्या में है, लेकिन लगातार कई बार के विधायक राधामोहन दास अग्रवाल का टिकट कटने, उनके मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से समीकरण न होने का खतरा भी है। हालांकि योगी के लिए अच्छी बात यह है कि ब्राह्मण वोट कुछ हद तक कांग्रेस प्रत्याशी चेतना पांडे को भी मिलेगा। ऐसे में सपा की प्रत्याशी सुभावती शुक्ला के मजबूत दावे में थोड़ा सेंध लगेगी। बसपा ने ख्वाजा शमशुद्दीन को उतारा है। वह अल्पसंख्यक मतों में सेंध लगाएंगे। चंद्र शेखर आजाद दलित मतों में बंटवारा कर सकते हैं। इन सबके बाद भी गोरखपुर शहरी सीट पर इस बार मंदिर के महंत और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के लिए चुनौती मानी जा रही है। इस सीट को बड़े अंतर से जीत लेने के लिए भाजपा ने खास प्लान तैयार किया है। अमित शाह गोरखपुर को लेकर संवेदनशील हैं और प्रधानमंत्री मोदी प्रचार करके योगी की जीत का अंतर बड़ा करने के उपाय पर गंभीर हैं। माना जा रहा है कि महंत की झंडा बरदारी ही मतदाताओं के बीच में प्रमुख मुद्दा भी रहेगी।

जातिवाद चलेगा या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण?

छठवें और सातवें चरण का चुनाव जातिवाद या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की भी प्रयोगशाला होगा। सातवें चरण में 9 जिलों की 54 विधानसभा सीटों पर 2017 के विधानसभा चुनाव को छोड़ दें, तो जातिगत समीकरण चरण 90 के दशक से हमेशा प्रभावी रहे हैं। आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, जौनपुर, मिर्जापुर, वाराणसी, चंदौली, सोनभद्र में इसका खासा प्रभाव दिखाई देता है। छठे चरण में बलिया, देवरिया, गोरखपुर, कुशीनगर, बस्ती, संतकबीरनगर, अंबेडकर नगर, सिद्धार्थनगर में इसकी बानगी देखने को मिलती है। राजनीति के पंडितों का कहना है कि चुनावी लड़ाई भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच में है। वरिष्ठ पत्रकार श्याम नारायण पांडे का कहना है कि 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव है, जहां सांप्रदायिक ध्रुवीकरण केवल 15-20 प्रतिशत चल पा रहा है। जबकि पिछले दो लोकसभा और एक विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा 70-80 प्रतिशत तक प्रभावी था। चुनाव जातिगत मुद्दे पर हो रहा है और छुट्टा गौवंश, बेरोजगारी, मंहगाई भी इसमें तड़का लगा रही है। देखना है कि नतीजे किस तरफ करवट लेते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed