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कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने उच्चतम न्यायालय की आलोचना पर जताई नाराजगी

Fri, 27 Nov 2020 12:26 AM IST
Kuldeep Singh पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: Kuldeep Singh Updated Fri, 27 Nov 2020 12:26 AM IST
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Union Law Minister Ravi Shankar Prasad expressed displeasure over criticism of Supreme Court
कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद - फोटो : Twitter

केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने न्यायिक कार्यशैली के लिए उच्चतम न्यायालय की आलोचना पर बृहस्पतिवार को नाराजगी जताई और फैसलों की आलोचना करते समय लोगों से निर्मम तरीके से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने से परहेज करने को कहा।

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उच्चतम न्यायालय द्वारा संविधान दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में प्रसाद ने कहा, कुछ कमियां हो सकती हैं लेकिन हमें अपनी न्यायपालिका पर गर्व करना चाहिए क्यों इसने गरीबों और वंचितों के हाथ थामे हैं।
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कानून मंत्री ने कहा, परेशान करने वाली एक प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। कुछ लोगों का दृष्टिकोण है कि किसी विशेष मामले में क्या फैसला होना चाहिए। इसके बाद अखबारों में विमर्श शुरू हो जाता है और सोशल मीडिया पर अभियान चलाया जाता है कि किस तरह का फैसला होना चाहिए।
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उन्होंने कहा, बहुत विनम्रता से मैं कहना चाहूंगा कि निर्मम तरीके से न्यायपालिका की आलोचना करना पूरी तरह अस्वीकार्य है। कद की परवाह नहीं करते हुए हमारी न्यायपालिका के बारे में अनर्गल चीजें कही गयी।

प्रसाद ने यह बात उस कार्यक्रम में कही, जिसमें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने शुरुआती संबोधन किया। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कोरोना वायरस महामारी ने हर किसी को प्रभावित किया है और लोगों से संकल्प लेने को कहा कि सबसे पहले टीका अग्रिम मोर्चा पर लड़ रहे स्वास्थ्यकर्मियों को दिया जाए।

उन्होने कहा कि अक्तूबर तक शीर्ष अदालत ने महामारी के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए लगभग 30,000 मामलों पर सुनवाई की। वहीं सभी अदालतों में लगभग 50 लाख मामलों पर सुनवाई हुई।

प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे ने कहा कि महामारी के समय न्यायपालिका ने कठिन मेहनत की और सभी नागरिकों तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता दिखायी। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने दूसरे देशों की अदालतों की तुलना में बहुत अच्छा काम किया।

न्यायमूर्ति बोबडे ने कहा कि अदालतों को महामारी के दौरान कुछ अप्रत्याशित चुनौतियों का सामना करना पड़ा और विकल्प बहुत स्पष्ट था कि या तो डिजिटल तरीके से सुनवाई की जाए या अदालतों को बंद कर दिया जाए।


उन्होंने कहा अदालतों को प्रवासियों, मृत लोगों के शवों की दर्दनाक स्थिति आदि मामलों पर सुनवाई करनी पड़ी। अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने सुझाव दिया कि सब लोगों तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए देश के चार कोनों में 15 न्यायाधीशों के साथ चार मध्यवर्ती अपीलीय अदालतें होनी चाहिए।

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