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UN: 'चीन तिब्बती पहचान को मिटा रहा', यूएन रिपोर्ट में खुलासा; निर्वासित तिब्बतियों ने की हस्तक्षेप की मांग

Sun, 08 Feb 2026 03:24 AM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला Published by: हिमांशु चंदेल Updated Sun, 08 Feb 2026 03:24 AM IST
सार

संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की नीतियां तिब्बती पहचान और सभ्यता को कमजोर कर रही हैं। खास चिंता बोर्डिंग स्कूल सिस्टम को लेकर जताई गई है, जहां बच्चों को कम उम्र में संस्कृति और भाषा से दूर किया जा रहा है। 

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UN report warns China erasing Tibetan civilisation identity exile Tibetans say confirmation of truth
निर्वासित तिब्बती लोग - फोटो : ANI

विस्तार

संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की नीतियां तिब्बती पहचान और सभ्यता को कमजोर कर रही हैं। खास चिंता बोर्डिंग स्कूल सिस्टम को लेकर जताई गई है, जहां बच्चों को कम उम्र में संस्कृति और भाषा से दूर किया जा रहा है। धर्मशाला के निर्वासित तिब्बती समुदाय ने रिपोर्ट को सच्चाई की पुष्टि बताया है और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग की है।
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तिब्बत को लेकर जारी एक नई संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की नीतियां तिब्बती सभ्यता और पहचान की जड़ों को कमजोर कर रही हैं। इसमें खास तौर पर तिब्बत में चल रहे बोर्डिंग स्कूल सिस्टम को बड़ा कारण बताया गया है। रिपोर्ट सामने आने के बाद धर्मशाला में रह रहे निर्वासित तिब्बती समुदाय ने कहा है कि इससे उनके लंबे समय से किए जा रहे दावों की पुष्टि होती है।
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रिपोर्ट के अनुसार तिब्बत में बच्चों को बड़ी संख्या में बोर्डिंग स्कूलों में रखा जा रहा है। इससे वे कम उम्र में ही अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं से दूर हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि अगर यही स्थिति जारी रही तो तिब्बती लोग एक अलग सांस्कृतिक समुदाय के रूप में कमजोर पड़ सकते हैं। रिपोर्ट में शिक्षा व्यवस्था को पहचान बदलने के औजार के रूप में इस्तेमाल किए जाने की आशंका जताई गई है।
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बोर्डिंग स्कूल मॉडल पर सबसे ज्यादा चिंता
तिब्बत नीति संस्थान के उपनिदेशक टेम्पा ग्यात्सेन ने कहा कि रिपोर्ट जमीनी सच्चाई को सामने रखती है। उनके मुताबिक चीन ने बोर्डिंग स्कूलों पर खास जोर इसलिए दिया है क्योंकि नई पीढ़ी के जरिए पहचान को बदला जा सकता है। उन्होंने कहा कि छोटे बच्चों को परिवार और स्थानीय माहौल से अलग कर दिया जाता है। वहां उन्हें अलग भाषा और ढांचे में ढाला जाता है। इससे तिब्बती पहचान पर सीधा असर पड़ रहा है।

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भाषा और परंपरा से दूरी बढ़ने का खतरा
ग्यात्सेन ने कहा कि तिब्बती बच्चों को बहुत कम उम्र में ही अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक परंपराओं से दूर किया जा रहा है। उन्होंने इसे खतरनाक रुझान बताया। उनके अनुसार यह एक सुनियोजित प्रक्रिया है, जिससे तिब्बती सभ्यता की जड़ें कमजोर हों। उन्होंने कहा कि तिब्बती और चीनी पहचान अलग है और दोनों को मिलाकर एक नहीं बनाया जा सकता। अलग इतिहास और परंपरा को खत्म करने की कोशिश सफल नहीं होगी।


छह दशक से चल रही नीतियों का आरोप
तिब्बत म्यूजियम के निदेशक तेनजिन टोपधेन ने कहा कि ऐसी नीतियां पिछले 60 साल से जारी हैं। उनके मुताबिक तिब्बत इस नीति का सबसे बड़ा शिकार रहा है। उन्होंने कहा कि अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने समय रहते ध्यान नहीं दिया तो ऐसी स्थिति दूसरे क्षेत्रों में भी पैदा हो सकती है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की इस पहल को अहम और समय पर उठाया गया कदम बताया।

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वैश्विक हस्तक्षेप की मांग तेज
निर्वासित तिब्बती समुदाय ने कहा कि तिब्बत की हजारों साल पुरानी विरासत खतरे के मोड़ पर खड़ी है। रिपोर्ट आने के बाद अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग तेज हो गई है। समुदाय के प्रतिनिधियों ने कहा कि सांस्कृतिक पहचान को बचाना वैश्विक जिम्मेदारी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस रिपोर्ट के बाद तिब्बत के मुद्दे पर दुनिया का ध्यान और बढ़ेगा और सांस्कृतिक मिटाव को रोकने के प्रयास मजबूत होंगे।


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