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खबरों के खिलाड़ीः पूर्वोत्तर में तो जीत गई भाजपा, पर असल मुकाबला राजस्थान-एमपी में; जानें विश्लेषकों की राय
Sat, 04 Mar 2023 09:15 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Sat, 04 Mar 2023 09:15 PM IST
सार
पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के चुनावी नतीजों से भाजपा उत्साहित है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, उसकी असली परीक्षा तो मध्यप्रदेश-राजस्थान में होनी है। जानिए, अमर उजाला की विशेष प्रस्तुति 'खबरों के खिलाड़ी' में इस बार क्या है राजनीतिक विश्लेषकों की राय...
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खबरों के खिलाड़ी का राजनैतिक विश्लेषण
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
अमर उजाला अपनी विशेष प्रस्तुति 'खबरों के खिलाड़ी' की दूसरी कड़ी के साथ एक बार फिर आपके बीच मौजूद है। यह राजनीतिक और चुनावी चर्चा आप अमर उजाला के यू-ट्यूब चैनल पर देख रहे हैं। साथ ही इसे रविवार सुबह 9 बजे दोबारा भी देखा जा सकते हैं। पिछले दिनों मेघालय, त्रिपुरा, नगालैंड के चुनाव और महाराष्ट्र में उपचुनाव के नतीजे सामने आए। राहुल गांधी का कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में दिया गया संबोधन विवादों में आ गया। जानिए, इन मुद्दों पर इस बार की विशेष चुनावी चर्चा में राजनीतिक विश्लेषकों की क्या राय सामने आई...
इस बार चर्चा में जाने माने पत्रकार जयशंकर गुप्त, सुमित अवस्थी, हर्षवर्धन त्रिपाठी, मेघा प्रसाद, अशोक वानखेड़े और विनोद अग्निहोत्री मौजूद रहे।
सुमित अवस्थी
'पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के नतीजे सामने आ गए हैं। बीते हफ्ते देश में काफी कुछ हुआ। राहुल गांधी विदेश गए और कैम्ब्रिज में उनके बयान की खूब चर्चा हुई। इलाहाबाद में उमेश पाल हत्याकांड के बाद योगी सरकार का बुलडोजर चला। चुनाव नतीजों से साफ है कि भाजपा को कोई हिला नहीं पाया है। कांग्रेस की जो तैयारी है, क्या उससे भाजपा को मात दी जा सकेगी? कांग्रेस ने जिस तरह से पूर्वोतर में लापरवाही बरती ऐसे में क्या वह अगले चुनावों में भाजपा का सामना करने के लिए तैयार है? यह बड़ा सवाल है।'
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यह भी पढ़ें: North East Election Result: त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड चुनाव में क्यों फेल हुई कांग्रेस? जानें चार बड़े कारण
जयशंकर गुप्त
'पूर्वोतर के चुनाव सत्ता का सेमीफाइनल नहीं हैं क्योंकि वहां यही ट्रेंड रहा है कि पूर्वोत्तर में उसी की सरकार बनी है, जिसकी केंद्र में सरकार होती है। ऐसे में इसे सेमीफाइनल नहीं कहा जा सकता है। भाजपा का चरित्र दोहरा है। राजस्थान में गौमांस खाने पर हत्या हो जाती है और पूर्वोतर में खुद भाजपा नेता गौमांस खाने की बात कह रहे हैं। उद्धव ठाकरे की पार्टी खत्म नहीं हुई है। चुनाव आयोग ने जिस तरह से फैसला दिया, उस पर सवाल उठ रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग कांग्रेस ने किया, उसे अब भाजपा आगे बढ़ा रही है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के मंत्री भ्रष्टाचार में पकड़े गए, लेकिन उनके घर पर बुलडोजर नहीं चला। मीडिया में इस पर कोई बात नहीं हुई। हालांकि भाजपा के लिए तारीफ की बात यह है कि उसके नेता 365 दिन राजनीति करते हैं और लगातार सक्रिय रहते हैं। कांग्रेस इस मामले में बहुत पीछे है।'
हर्षवर्धन त्रिपाठी
'जो केंद्र जीत लेता है, उसे पूर्वोतर मिल जाता है, यह एक भ्रम है। त्रिपुरा वामपंथ का गढ़ रहा है। नगालैंड लगभग ईसाई प्रदेश है, वहां भी भाजपा सरकार बना लेती है। ऐसे में भाजपा पर हिंदू-मुस्लिम की राजनीति का आरोप गलत है। पूर्वोतर की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है। जहां सीमा विवाद है, वहां भाजपा का सत्ता हासिल करना बड़ी बात है। ...अभी रायपुर के अधिवेशन में पवन खेड़ा ने राहुल गांधी की दाढ़ी को परिपक्वता से जोड़ा था, लेकिन वे अपनी इस परिपक्वता पर खुद ही नहीं टिक पाए। राहुल ने विदेश में अपने बयान में कहा कि चीन सद्भावना की बात करता है, लेकिन उन्हें लगता है कि भारत में सद्भावना नहीं है। ...महाराष्ट्र की बात करें तो उद्धव ठाकरे को अगर हमदर्दी मिलती है तो ये ध्यान रखने वाली बात है कि शिवसेना की शाखाएं एकनाथ शिंदे के कब्जे में गई हैं। हालांकि, कस्बापेठ की हार भाजपा के लिए बड़ा झटका है।'
यह भी पढ़ें- Election: 2014 तक पूर्वोत्तर के एक भी राज्य में नहीं थी BJP की सरकार, नौ साल में ऐसे बदला सियासी नक्शा
अशोक वानखेड़े
'भाजपा तो यूनिवर्सिटी में चुनाव जीतने पर भी ढोल बजाती है। त्रिपुरा की जीत की अहमियत है, लेकिन अगर आदिवासी हित में काम किया गया होता तो टिपरा मोथा को जीत नहीं मिलती। भाजपा ने आदिवासी को राष्ट्रपति बनाया, लेकिन त्रिपुरा या तमिलनाडु का आदिवासी इससे कैसे जुड़ पाएगा? भाजपा ने पूर्वोतर की जीत से जनमत गढ़ने की कोशिश की है। पूर्वोतर के नतीजों के बजाय मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान के चुनाव नतीजे अहम होंगे। भाजपा राहुल गांधी की छवि को धूमिल करने की कोशिश करती है। कर्नाटक में भाजपा विधायक के बेटे के पास से आठ करोड़ रुपए मिले लेकिन मीडिया में यह मुद्दा कहीं नहीं दिखा! ...महाराष्ट्र में कस्बापेठ सीट पर भाजपा की हार बेहद अहम है। महाराष्ट्र में भाजपा में अलग-अलग पार्टियों से इतने नेता आ गए हैं कि भाजपा खुद भ्रमित हो गई है। भाजपा के साथ जाकर उद्धव ठाकरे बर्बाद हुए।'
मेघा प्रसाद
'पूर्वोतर के नतीजों से भाजपा जनता के बीच अच्छा संदेश देने में सफल रही है। पूर्वोतर में जाति-धर्म की राजनीति को नकारकर लोगों ने विकास के नाम पर वोट किया। त्रिपुरा, नगालैंड में भाजपा को जो जीत मिली है, वह पूर्वोतर में हुए विकास की देन है। पूर्वोतर में बुनियादी ढांचे का विकास हो रहा है। एयरपोर्ट बन रहे हैं। विकास पर अगर लोग वोट कर रहे हैं, तो उसके भाजपा के लिए बड़े मायने हैं। ...शिवसेना के लिए सहानुभूति ही एकमात्र रास्ता है, जिससे उद्धव ठाकरे का उद्धार हो सकता है क्योंकि जिस कांग्रेस का बाल ठाकरे विरोध करते रहे, उद्धव ठाकरे ने उसी कांग्रेस के साथ सरकार बना ली! इससे शिवसेना समर्थकों में नाराजगी है।'
विनोद अग्निहोत्री
'नगालैंड में गठबंधन को जीत मिली है, लेकिन वहां बड़े भाई की भूमिका में एनडीपीपी है, लेकिन इसे भाजपा की जीत दिखाया जा रहा है। लेकिन इस जीत को कम नहीं माना जा सकता। सरकार अगर रिपीट हो रही है तो यह भाजपा की जीत है। पूर्वोतर में राज्य छोटे हैं और उनकी कुछ विवशताएं है कि केंद्र के साथ जाना उनकी मजबूरी हो जाती है क्योंकि इससे उन्हें आर्थिक मदद मिलने में आसानी रहती है। हालांकि असली परीक्षा बड़े राज्यों के चुनाव में होगी। कांग्रेस की पूर्वोतर की हार उसकी कमजोरी है। कांग्रेस ने ना चुनाव प्रचार किया और ना ही उनके पास कोई बड़ा नेता है। कांग्रेस अपने नेता, मुद्दे और संगठन को नहीं संभाल पा रही है। भाजपा के सामने संयुक्त विपक्ष की चुनौती नहीं है, लेकिन अलग-अलग राज्यों में भाजपा को क्षेत्रीय दलों से चुनौती मिल रही है।'
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इस बार चर्चा में जाने माने पत्रकार जयशंकर गुप्त, सुमित अवस्थी, हर्षवर्धन त्रिपाठी, मेघा प्रसाद, अशोक वानखेड़े और विनोद अग्निहोत्री मौजूद रहे।
सुमित अवस्थी
'पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के नतीजे सामने आ गए हैं। बीते हफ्ते देश में काफी कुछ हुआ। राहुल गांधी विदेश गए और कैम्ब्रिज में उनके बयान की खूब चर्चा हुई। इलाहाबाद में उमेश पाल हत्याकांड के बाद योगी सरकार का बुलडोजर चला। चुनाव नतीजों से साफ है कि भाजपा को कोई हिला नहीं पाया है। कांग्रेस की जो तैयारी है, क्या उससे भाजपा को मात दी जा सकेगी? कांग्रेस ने जिस तरह से पूर्वोतर में लापरवाही बरती ऐसे में क्या वह अगले चुनावों में भाजपा का सामना करने के लिए तैयार है? यह बड़ा सवाल है।'
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यह भी पढ़ें: North East Election Result: त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड चुनाव में क्यों फेल हुई कांग्रेस? जानें चार बड़े कारण
जयशंकर गुप्त
'पूर्वोतर के चुनाव सत्ता का सेमीफाइनल नहीं हैं क्योंकि वहां यही ट्रेंड रहा है कि पूर्वोत्तर में उसी की सरकार बनी है, जिसकी केंद्र में सरकार होती है। ऐसे में इसे सेमीफाइनल नहीं कहा जा सकता है। भाजपा का चरित्र दोहरा है। राजस्थान में गौमांस खाने पर हत्या हो जाती है और पूर्वोतर में खुद भाजपा नेता गौमांस खाने की बात कह रहे हैं। उद्धव ठाकरे की पार्टी खत्म नहीं हुई है। चुनाव आयोग ने जिस तरह से फैसला दिया, उस पर सवाल उठ रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग कांग्रेस ने किया, उसे अब भाजपा आगे बढ़ा रही है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के मंत्री भ्रष्टाचार में पकड़े गए, लेकिन उनके घर पर बुलडोजर नहीं चला। मीडिया में इस पर कोई बात नहीं हुई। हालांकि भाजपा के लिए तारीफ की बात यह है कि उसके नेता 365 दिन राजनीति करते हैं और लगातार सक्रिय रहते हैं। कांग्रेस इस मामले में बहुत पीछे है।'
हर्षवर्धन त्रिपाठी
'जो केंद्र जीत लेता है, उसे पूर्वोतर मिल जाता है, यह एक भ्रम है। त्रिपुरा वामपंथ का गढ़ रहा है। नगालैंड लगभग ईसाई प्रदेश है, वहां भी भाजपा सरकार बना लेती है। ऐसे में भाजपा पर हिंदू-मुस्लिम की राजनीति का आरोप गलत है। पूर्वोतर की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है। जहां सीमा विवाद है, वहां भाजपा का सत्ता हासिल करना बड़ी बात है। ...अभी रायपुर के अधिवेशन में पवन खेड़ा ने राहुल गांधी की दाढ़ी को परिपक्वता से जोड़ा था, लेकिन वे अपनी इस परिपक्वता पर खुद ही नहीं टिक पाए। राहुल ने विदेश में अपने बयान में कहा कि चीन सद्भावना की बात करता है, लेकिन उन्हें लगता है कि भारत में सद्भावना नहीं है। ...महाराष्ट्र की बात करें तो उद्धव ठाकरे को अगर हमदर्दी मिलती है तो ये ध्यान रखने वाली बात है कि शिवसेना की शाखाएं एकनाथ शिंदे के कब्जे में गई हैं। हालांकि, कस्बापेठ की हार भाजपा के लिए बड़ा झटका है।'
यह भी पढ़ें- Election: 2014 तक पूर्वोत्तर के एक भी राज्य में नहीं थी BJP की सरकार, नौ साल में ऐसे बदला सियासी नक्शा
अशोक वानखेड़े
'भाजपा तो यूनिवर्सिटी में चुनाव जीतने पर भी ढोल बजाती है। त्रिपुरा की जीत की अहमियत है, लेकिन अगर आदिवासी हित में काम किया गया होता तो टिपरा मोथा को जीत नहीं मिलती। भाजपा ने आदिवासी को राष्ट्रपति बनाया, लेकिन त्रिपुरा या तमिलनाडु का आदिवासी इससे कैसे जुड़ पाएगा? भाजपा ने पूर्वोतर की जीत से जनमत गढ़ने की कोशिश की है। पूर्वोतर के नतीजों के बजाय मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान के चुनाव नतीजे अहम होंगे। भाजपा राहुल गांधी की छवि को धूमिल करने की कोशिश करती है। कर्नाटक में भाजपा विधायक के बेटे के पास से आठ करोड़ रुपए मिले लेकिन मीडिया में यह मुद्दा कहीं नहीं दिखा! ...महाराष्ट्र में कस्बापेठ सीट पर भाजपा की हार बेहद अहम है। महाराष्ट्र में भाजपा में अलग-अलग पार्टियों से इतने नेता आ गए हैं कि भाजपा खुद भ्रमित हो गई है। भाजपा के साथ जाकर उद्धव ठाकरे बर्बाद हुए।'
मेघा प्रसाद
'पूर्वोतर के नतीजों से भाजपा जनता के बीच अच्छा संदेश देने में सफल रही है। पूर्वोतर में जाति-धर्म की राजनीति को नकारकर लोगों ने विकास के नाम पर वोट किया। त्रिपुरा, नगालैंड में भाजपा को जो जीत मिली है, वह पूर्वोतर में हुए विकास की देन है। पूर्वोतर में बुनियादी ढांचे का विकास हो रहा है। एयरपोर्ट बन रहे हैं। विकास पर अगर लोग वोट कर रहे हैं, तो उसके भाजपा के लिए बड़े मायने हैं। ...शिवसेना के लिए सहानुभूति ही एकमात्र रास्ता है, जिससे उद्धव ठाकरे का उद्धार हो सकता है क्योंकि जिस कांग्रेस का बाल ठाकरे विरोध करते रहे, उद्धव ठाकरे ने उसी कांग्रेस के साथ सरकार बना ली! इससे शिवसेना समर्थकों में नाराजगी है।'
विनोद अग्निहोत्री
'नगालैंड में गठबंधन को जीत मिली है, लेकिन वहां बड़े भाई की भूमिका में एनडीपीपी है, लेकिन इसे भाजपा की जीत दिखाया जा रहा है। लेकिन इस जीत को कम नहीं माना जा सकता। सरकार अगर रिपीट हो रही है तो यह भाजपा की जीत है। पूर्वोतर में राज्य छोटे हैं और उनकी कुछ विवशताएं है कि केंद्र के साथ जाना उनकी मजबूरी हो जाती है क्योंकि इससे उन्हें आर्थिक मदद मिलने में आसानी रहती है। हालांकि असली परीक्षा बड़े राज्यों के चुनाव में होगी। कांग्रेस की पूर्वोतर की हार उसकी कमजोरी है। कांग्रेस ने ना चुनाव प्रचार किया और ना ही उनके पास कोई बड़ा नेता है। कांग्रेस अपने नेता, मुद्दे और संगठन को नहीं संभाल पा रही है। भाजपा के सामने संयुक्त विपक्ष की चुनौती नहीं है, लेकिन अलग-अलग राज्यों में भाजपा को क्षेत्रीय दलों से चुनौती मिल रही है।'