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Supreme Court: कोर्ट ने कहा- सजा से पहले अतिरिक्त आरोपियों को किया जा सकता है समन, विस्तृत दिशा-निर्देश जारी
Mon, 05 Dec 2022 10:49 PM IST
गुलाम अहमद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: गुलाम अहमद
Updated Mon, 05 Dec 2022 10:49 PM IST
सार
Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि सीआरपीसी की धारा 319 का प्रयोग सजा के आदेश की घोषणा से पहले किया जाना चाहिए, जहां अभियुक्त की दोषसिद्धि का फैसला हो।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : Social Media
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि निचली अदालत दंड प्रक्रिया संहिता(सीआरपीसी) की धारा- 319 के तहत अपने असाधारण शक्ति का प्रयोग करते हुए सजा सुनाए जाने से पहले अतिरिक्त आरोपियों को समन कर सकती है। जस्टिस एस अब्दुल नजीर, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस वी रामासुब्रमण्यन और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने मुकदमे के दौरान सामने आए नए सबूतों या सामग्रियों के आधार पर स्वत संज्ञान लेते हुए या अभियोजन पक्ष द्वारा आवेदन के आधार पर अतिरिक्त अभियुक्तों को समन करने को लेकर अदालत के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश पारित किए।
पीठ इस बात की पड़ताल कर रही थी कि क्या निचली अदालत के पास अन्य आरोपियों के खिलाफ एक आपराधिक मामले का फैसला करने के बाद भी अतिरिक्त अभियुक्तों को समन करने की शक्ति है? संविधान पीठ ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 319 का प्रयोग सजा के आदेश की घोषणा से पहले किया जाना चाहिए, जहां अभियुक्त की दोषसिद्धि का फैसला हो। दोषमुक्ति के मामले में, दोषमुक्ति का आदेश सुनाए जाने से पहले शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए। इसलिए, समन जारी करने आदेश मामले में मुकदमे के निष्कर्ष से पहले होना चाहिए। यदि आदेश उसी दिन पारित हो जाता है, प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर इसकी जांच करनी होगी और यदि ऐसा समन आदेश या तो बरी होने के आदेश के बाद या सजा के मामले में सजा सुनाए जाने के बाद पारित किया जाता है, तो वह दीर्घकालिक नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में न्यायामूर्ति बीआर गवई, न्यायामूर्ति एएस बोपन्ना, न्यायामूर्ति वी रामासुब्रमण्यन और न्यायामूर्ति बीवी नागरथना भी शामिल थे। शीर्ष अदालत ने 2019 में भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 319 के दायरे को लेकर तीन प्रश्न तैयार किए थे और इस मामले को बड़ी बेंच को भेज दिया था।
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पीठ द्वारा तय किए गए तीन मुद्दों में शामिल था कि क्या ट्रायल कोर्ट के पास सीआरपीसी की धारा 319 के तहत अतिरिक्त अभियुक्तों को समन करने की शक्ति है, जब अन्य सह-अभियुक्तों के संबंध में मुकदमा पूरा हो गया है। शीर्ष अदालत ने इस मामले को बड़ी पीठ को भेजते हुए कहा था कि उसका विचार है कि सीआरपीसी की धारा 319 के तहत जटिलताओं से बचने और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए अभियुक्तों को तलब करते समय निचली अदालतों को सतर्क रहना चाहिए।
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पीठ इस बात की पड़ताल कर रही थी कि क्या निचली अदालत के पास अन्य आरोपियों के खिलाफ एक आपराधिक मामले का फैसला करने के बाद भी अतिरिक्त अभियुक्तों को समन करने की शक्ति है? संविधान पीठ ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 319 का प्रयोग सजा के आदेश की घोषणा से पहले किया जाना चाहिए, जहां अभियुक्त की दोषसिद्धि का फैसला हो। दोषमुक्ति के मामले में, दोषमुक्ति का आदेश सुनाए जाने से पहले शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए। इसलिए, समन जारी करने आदेश मामले में मुकदमे के निष्कर्ष से पहले होना चाहिए। यदि आदेश उसी दिन पारित हो जाता है, प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर इसकी जांच करनी होगी और यदि ऐसा समन आदेश या तो बरी होने के आदेश के बाद या सजा के मामले में सजा सुनाए जाने के बाद पारित किया जाता है, तो वह दीर्घकालिक नहीं होगा।
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सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में न्यायामूर्ति बीआर गवई, न्यायामूर्ति एएस बोपन्ना, न्यायामूर्ति वी रामासुब्रमण्यन और न्यायामूर्ति बीवी नागरथना भी शामिल थे। शीर्ष अदालत ने 2019 में भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 319 के दायरे को लेकर तीन प्रश्न तैयार किए थे और इस मामले को बड़ी बेंच को भेज दिया था।
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पीठ द्वारा तय किए गए तीन मुद्दों में शामिल था कि क्या ट्रायल कोर्ट के पास सीआरपीसी की धारा 319 के तहत अतिरिक्त अभियुक्तों को समन करने की शक्ति है, जब अन्य सह-अभियुक्तों के संबंध में मुकदमा पूरा हो गया है। शीर्ष अदालत ने इस मामले को बड़ी पीठ को भेजते हुए कहा था कि उसका विचार है कि सीआरपीसी की धारा 319 के तहत जटिलताओं से बचने और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए अभियुक्तों को तलब करते समय निचली अदालतों को सतर्क रहना चाहिए।