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आखिर कैसे तैयार किए जाते हैं भारतीय वायु सेना के फाइटर पायलट?

Wed, 09 Mar 2016 06:37 PM IST
अमित कुमार तिवारी/ अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित कुमार तिवारी/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 09 Mar 2016 06:37 PM IST
सार

  • देश की पहली महिला फाइटर पायलट
  • बहुत कठिन होती है इनकी ट्रेनिंग
  • इस तरह होती है ट्रेनिंग
  • एक पायलट पर करोड़ो खर्च करती है सरकार

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Training process of fighter pilot, IAF invests 13 crore on each pilot
महिला फाइटर पायलट - फोटो : pti

विस्तार

भारतीय वायु सेना एक ऐसी संस्था है जो युवाओं को देश की सेवा करने का एक सुनहरा अवसर मुहैया कराती है। ये हजारों युवाओं के सपनों को साकार करने में भी अहम भूमिका निभाती है। बचपन में बच्चों का सबसे बड़ा सपना होता है कि वह हवा में उड़े, हवाई जहाज का सफर करें और उससे भी ज्यादा वह फाइटर पायलट बने। हवा में उड़ने और हवाई सफर करने का सपना तो कभी भी पूरा किया जा सकता है लेकिन एक फाइटर पायलट बनने का सपना केवल भारतीय वायु सेना ही पूरा कर सकती है।

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हाल ही में वायु सेना ने महिलाओं को बतौर फाइटर पायलट नियुक्त करने की घोषणा की थी जिसके बाद तीन महिला पायलटों को इसके लिए चयनित किया गया है। इन महिला पायलटों की ट्रेनिंग जारी है और जून में ये भी फाइटर पायलट बनकर सुखोई विमान उड़ाती हुई दिखाई देंगी।
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तो आइए जानते हैं आखिर वायु सेना कैसे तैयार करती है भविष्य के फाइटर पायलट।

बहुत कठिन होती है चयन प्रक्रिया

Training process of fighter pilot, IAF invests 13 crore on each pilot
भारतीय वायु सेना - फोटो : Getty Images

भारतीय वायु सेना तीन स्तरों पर पायलटों का चुनाव करती है। इसमें से सबसे पहले स्तर में युवाओं को महज 17 साल की उम्र में ही इस प्रक्रिया में सम्मिलित होने का मौका दिया जाता है। इसके लिए बच्चों को साल में दो बार आयोजित होने वाले नेशनल डिफेंस अकादमी (एनडीए) की परीक्षाओं में सम्मिलित होना पड़ता है। परीक्षा पास कर लेने के बाद उन्हें ट्रेनिंग के लिए बुलाया जाता है। एनडीए में ट्रेनिंग के दौरान ही उन्हें स्नातक की उपाधि दी जाती है और यहां उनके पायलट बनने का पहला चरण पूरा हो जाता है।

वायु सेना यूपीएसी के माध्यम से एक अन्य परीक्षा का भी आयोजन करती है। इसे सीडीएस के नाम से जाना जाता है। इसके लिए इंटरमीडिएट में भौतिक और गणित के अलावा प्रथम श्रेणी से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य होता है। सीडीएस के अलावा वायु सेना एयरफोर्स कॉमन एडमिशन टेस्ट (एफकैट) का आयोजन भी कराती है जिसके माध्यम से भी पायलट बनने का सपना पूरा किया जा सकता है।

वायु सेना एनसीसी के कैडेट्स के लिए भी एक स्पेशल एंट्री प्रोग्राम का संचालन करती है। इसके लिए एनसीसी के एयर विंग से 'सी' प्रमाणपत्र हासिल करना अनिवार्य होता है। इसके अलावा डीजी एनसीसी के माध्यम से अप्लाई किया जा सकता है।

ऐसे पूरा होता है चयन का दूसरा चरण

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भारतीय वायु सेना - फोटो : Getty Images

दूसरे चरण को सर्विस सेलेक्शन बोर्ड (एसएसबी) परीक्षा प्रक्रिया के नाम से जाना जाता है। इसके लिए पहले चरण का पास करना अनिवार्य होता है। दूसरे चरण के लिए चयनित होने पर अगली प्रक्रिया के लिए देश में स्थित सेलेक्शन बोर्ड्स में बुलाया जाता है। ये बोर्ड वाराणसी, देहरादून, मैसूर, गांधीगर और कंचरापारा में स्थित है। इन बोर्ड में युवाओं के एक अधिकारी बनने की काबिलियत की जांच होती है। इसके लिए युवाओं को कई तरह के परीक्षणों से होकर गुजरना पड़ता है।

इस प्रक्रिया के दौरान युवाओं में ऑफिसर बनने की काबिलियत के अलावा उनके पायलट एप्टीट्यूट टेस्ट की भी जांच की जाती है। इसके बाद ग्रुप टेस्ट भी किया जाता है। यह प्रक्रिया पूरे हफ्ते चलती है और प्रत्येक दिन चयनित छात्रों को ही अगले दिन के परीक्षा में शामिल होने का मौका दिया जाता है। बाकि को वापस घर भेज दिया जाता है।


एसएसबी टेस्ट पास करने के बाद चयनित छात्रों को चिकित्सकीय जांच के लिए बुलाया जाता है और इस जांच के ही आधार पर ही ऑल इंडिया मेरिट लिस्ट तैयार की जाती है। इसमें सफल छात्रों को पायलट ट्रेनिंग के लिए एयर फोर्स अकादमी (एएफए) डुंडीगुल बुलाया जाता है और यहीं पर पायलट बनने की प्रक्रिया की शुरुआत होती है।

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फिर शुरू होती है कठिन ट्रेनिंग

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भारतीय वायु सेना - फोटो : Getty Images

एएफए में आने के बाद फ्लाइंग ब्रांच के ट्रेनिंग की शुरुआत होती है। यहां पर युवाओं को फाइटर पायलट बनने के लिए तीन श्रेणियों से होकर गुजरना पड़ता है। हर स्तर में पायलट बनने की प्रक्रिया जटिल होती जाती है। इन प्रक्रियाओं के दौरान उन्हें प्लेन उड़ाने से लेकर उसके हर पहलू से अवगत कराया जाता है। साथ में पढ़ाई भी जरूरी होती है। 

पहला चरण
फाइटर पायलट बनने के लिए होने वाले पहले चरण की प्रक्रिया में छह महीने का वक्त लगता है। इस दौरान कैडेट को जहाज के बारे में बेसिक जानकारी दी जाती है। इस अवधि में उन्हें 55 घंटे की फ्लाइंग एक्सपीरिएंस भी कराई जाती है।

प्रारंभिक ट्रेनिंग के लिए कैडेट को स्विस मेड बेसिक ट्रेनर एयरक्राफ्ट पिलाटस पीसी-7 को उड़ाने का मौका मिलता है। इस दौरान उन्हें फ्लाइंग के नए गुर सिखाए जाते हैं।

दूसरा चरण
पहले चरण में सफल छात्रों को दूसरे चरण की ट्रेनिंग के लिए आगे भेजा जाता है। यह ट्रेनिंग भी छह महीने की होती है लेकिन इसमें उड़ान के घंटे, विमान के बारे में जानकारियां और विमान तीनों बदल जाते हैं।

इसे इंटरमीडिएट ट्रेनिंग भी कहा जाता है। इसमें पायलट को कम से कम 87 घंटों का उड़ान अनुभव होना अनिवार्य होता है। साथ ही उन्हें हवाई जहाज में मैन्यूवर्स की ट्रेनिंग भी दी जाती है। इसमें कैडेट जहाज से हवा में कलाबाजी करना सिखता है। उनकी यह ट्रेनिंग किरण मार्क-II विमानों में होती है। इस विमान में उन्हें आधुनिक तकनीकों के साथ कई जरूरी चीजों को जानने का मौका मिलता है।

बहुत महत्वपूर्ण होता है तीसरा चरण

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भारतीय वायु सेना - फोटो : Getty Images

तीसरा चरण
 

किसी भी फाइटर पायलट के लिए यह चरण सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। तीसरे और अंतिम चरण की ट्रेनिंग अवधि 12 महीनों की होती है और साथ में उड़ान के घंटे भी बढ़ जाते हैं।

अंतिम प्रक्रिया में पायलटों को हॉक जहाजों में ट्रेनिंग दी जाती है। यह जहाज एडवांस ट्रेनिंग जेट है जिसमें युद्ध के समय इस्तेमाल की जाने वाले हर वो तकनीक मौजूद होते हैं जिसकी पायलटों को जरूरत होती है।

इस प्रक्रिया में महीने दर महीने पायलटों की ट्रेनिंग और जटिल होती जाती है। इस दौरान पायलटों को मिग, जगुआर, तेजस, मिराज जैसे सुपरसोनिक विमानों की ट्रेनिंग दी जाती है।

इस तरह मिलता है एक नया पायलट

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भारतीय वायु सेना - फोटो : Getty Images

अंतिम चरण पास होने के साथ ही पायलटों को लाइसेंस दिया जाता है और देश को एक नया फाइटर पायलट मिलता है। इस चरण के समाप्ति के बाद पायलटों को उनके देश के विभिन्न स्क्वाड्रनों में तैनात कर दिया जाता है।

फाइटर पायलट बनाने की इस पूरी प्रक्रिया में एक पायलट के पीछे एयर फोर्स करीब 13 से 15 करोड़ रुपए खर्च करती है। यह रकम इतनी ज्यादा होती है कि एक सामान्य आदमी अपने पूरी जिंदगी में इतने पैसे नहीं कमा पाएगा। 

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