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तीन बीघा कॉरिडोर: इंदिरा गांधी की सरकार ने लीज पर दी थी जमीन, अब घुसपैठ के लिए बताया जा रहा बड़ा खतरा

Fri, 08 Nov 2024 08:13 AM IST
N Arjun एन अर्जुन
Updated Fri, 08 Nov 2024 08:13 AM IST
सार

तीन बीघा गलियारा या कॉरिडोर’ को लेकर सबसे बड़ा समझौता सितंबर 2011 में ढाका में हुआ। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के बीच एक समझौता हुआ। निर्णय लिया गया कि भारत के द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में पड़ने वाले 178 वर्ग मीटर लंबा 85 वर्ग मीटर चौड़ा भूखंड बांग्लादेश को लीज पर देगा।
 

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threat of infiltration into India from Three Bigha Corridor of Cooch Behar
भारत और बांग्लादेश के बीच मौजूद कॉरिडोर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

तीन बीघा कॉरिडोर भारत की जमीन का एक हिस्सा है, जो बांग्लादेश के दहग्राम-अंगरपोटा एनक्लेव को अपने देश के दूसरे हिस्सों से जोड़ता है। केवल यही जगह है जहां से बांग्लादेशी नागिरक बिना पासपोर्ट और बिना वीजा के आना-जाना कर सकते हैं।

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यही नहीं इस कॉरिडोर में आने जाने वालों की जांच भारतीय सुरक्षा अधिकारी नहीं कर सकते। भारत ने बांग्लादेश को यह जमीन लीज पर दी है। इससे पहले बांग्लादेश के दहग्राम-अंगरपोटा के लोग अपने देश से सीधे जुड़े हुए नहीं थे। यह समस्या आजादी के समय से थी लेकिन असली कहानी बांग्लादेश के बनने के बाद शुरू हुई।  16 जून 1974 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर्रहमान के बीच पहली बार समझौता हुआ लेकिन विरोध के कारण कॉरिडोर खोला नहीं जा सका। बाद में कोर्ट के आदेश पर 1992 में पहली बार इसे खोला गया। समझौते के तहत भारत ने आधा बेरुबाड़ी संघ अपने पास रखा और इसके बदले में भारत ने बांग्लादेश को तीन बीघा जमीन देना तय किया। हालांकि विशेषज्ञ अब इस कॉरिडोर को घुसपैठ के लिए खतरनाक मानते हैं।
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पूरी कॉरिडोर की फेंसिंग  बीएसएफ का रहता है पहरा
178 वर्ग मीटर लंबे और 85 वर्ग मीटर चौड़े इस कॉरिडोर की फेंसिंग की हुई है। बांग्लादेशियों को इसी रास्ते से आना-जाना होता है। इस कॉरिडोर के दोनों छोर पर दो गेट हैं। अंदर की तरफ बीएसएफ रहती है जबकि गेट के बाहर बांग्लादेश की तरफ बीजीबी रहती है।
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इस तरह अस्तित्व में आया तीन बीघा कॉरिडोर
16 जून, 1974 को पहली बार तीन बीघा कॉरिडोर का जिक्र हुआ। 1982 में एक बार फिर बांग्लादेश ने भारत से तीन बीघा कॉरिडोर की मांग की। इस पर स्थानीय भारतीय लोग भड़क गए और विरोध-प्रदर्शन हुआ। इस दौरान हुई फायरिंग में कई लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गए। इस बीच, मामला कोर्ट में पहुंच गया। क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय समझौता था, इसलिए 1992 में कोर्ट ने समझौते को बहाल रखा। इसके बाद 26 जून 1992 में पहली बार ‘तीन बीघा कॉरिडोर’ को खोला गया। इसके बाद भी समझौते में कई संशोधन होते रहे। ‘तीन बीघा गलियारा या कॉरिडोर’ को लेकर सबसे बड़ा समझौता सितंबर 2011 में ढाका में हुआ। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के बीच एक समझौता हुआ। निर्णय लिया गया कि भारत के द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में पड़ने वाले 178 वर्ग मीटर लंबा 85 वर्ग मीटर चौड़ा भूखंड बांग्लादेश को लीज पर देगा।

विशेषज्ञ बोले-भारत की सिरदर्दी बढ़ाएगा
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार सुशांत गुहा कहते हैं, यह तो घुसपैठ का कॉरिडोर बन गया है। यह कॉरिडोर भविष्य में देश के लिए सिर दर्द बन सकता है। क्योंकि एनक्लेव भारत के साथ सीमा साझा करता है। कई जगह ओपन बॉर्डर है। कोई भी घुसपैठिया किसी भी समय भारत में दाखिल हो सकता है।


भारत को सतर्क रहना चाहिए
बागडोगरा जीपी के उपाध्यक्ष धरेंद्र नाथ कहते हैं, भारत तो बड़े भाई की तरह है लेकिन बांग्लादेश है कि मानता ही नहीं। पहले सीमा से तस्करी होती थी। लेकिन बीएसएफ ने इस पर लगभग पर अंकुश लगा दिया है। बीएसएफ के होते हुए हालांकि कोई चिंता नहीं है फिर भी सीमाओं तारबंदी जरूरी है। साथ ही प्रकाश की व्यवस्था भी होनी चाहिए। क्योंकि इस समय बांग्लादेश के हालात अच्छे नहीं हैं।

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