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ग्राउंड रिपोर्ट: विधवा मोहल्ला दिल्ली के दामन पर दाग, कुछ ऐसे जी रहे हैं सिख दंगों के पीड़ित

Thu, 20 Dec 2018 05:41 PM IST
Avdhesh Kumar अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली Published by: Avdhesh Kumar Updated Thu, 20 Dec 2018 05:41 PM IST
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thousands of victims of Sikh riots are living family
1984 sikh riots
1984 के सिख दंगों के गुजरे 35 साल बीत चुके हैं। इस दरम्यान एक पूरी पीढ़ी गुजर चुकी है। लेकिन आंखों के सामने उनके अपने लोगों का कत्लेआम हुआ था, वक्त का ये मलहम भी उनके घाव भरने में नाकाम साबित हुआ है। दंगों की गवाह कुछ चंद आंखें बची हैं जो बताती हैं कि कैसे दंगाइयों ने एक-एक घर से पुरुषों को खींच-खींच कर बाहर निकाला और उनका कत्लेआम कर दिया था। 
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उन्होंने घर की महिलाओं-बच्चियों को जिंदा छोड़ दिया। बाद में सरकार ने इन्हीं बेसहारा औरतों-बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए घटनास्थल से दूर दिल्ली के तिलक विहार इलाके में एक कॉलोनी बसा दी। चूंकि यहां आने वाले हर सिख परिवार के पुरुषों का क़त्ल हो चुका था, इनमें केवल विधवा महिलाएं और उनके बच्चे ही थे, इसलिए इसकी पहचान विधवा मोहल्ला या विधवा कॉलोनी के रूप में की गई। आज भी इस मोहल्ले की पहचान इसी रूप में की जाती है।
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विधवा मोहल्ले के आज के हालात देखकर किसी को भी यह बात आसानी से समझ में आ सकती है कि जिन बच्चों के सर पर पिता का साया नहीं होता, उनकी जिंदगी किन मुश्किलों से गुजरती है, और ऐसे बच्चों के भविष्य में किस राह पर जाने की संभावना ज्यादा होती है। विधवा मोहल्ले में हजारों परिवार हैं। दंगों के बाद महिलाओं को अपने बच्चों को पालने के लिए दूसरे के घरों में झाड़ू-पोंछा मारने का काम करना पड़ा। 
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पीछे से बच्चों की उचित परवरिश नहीं हो पाई। बच्चे अशिक्षित रह गए या बहुत कम पढ़-लिख सके। बड़ी संख्या में बच्चे नशे के शिकार हो गये। कल के बच्चे आज इन परिवारों के मुखिया बन चुके हैं। लेकिन आज भी कई परिवारों के मुखिया नशे की लत के शिकार हैं और पीछे से उनके घर को चलाने के लिए कुछ भी नहीं है। पैसे की कमी से बच्चों की परवरिश भी ठीक से नहीं हो रही है और इस तरह उनकी अगली पीढ़ी का भविष्य भी अंधेरे में है।

विधवा मोहल्ले के ज्यादातर परिवारों के लोग रेहड़ी लगाने, रिक्शे चलाने या छोटी-मोटी दुकानदारी करने के लिए मजबूर हैं। पार्कों में नशेड़ी लोगों का कब्जा है या पार्किंग माफिया का। बच्चों की जिंदगी सड़कों के आसपास गुजर रही है जो कल इन्हें भी उसी अंधेरे में खींच सकती है, इसका खतरा गंभीर है।

बेटा नशे का शिकार, मां की पेंशन से चल रहा घर

परमजीत कौर (70) बताती हैं कि उनकी शादी हुए डेढ़-दो साल ही हुए थे। उनकी गोद में एक बेटा आ गया था। पति डीटीसी में बस ड्राईवर थे। अपना घर था, खेत थे। गुजारा अच्छे से चल रहा था। लेकिन इसी बीच एक नवंबर 1984 का वह दिन आया जिसने उनकी पूरी दुनिया ही उजाड़ कर रख दी। वे घर में कुछ काम कर रहीं थीं। अचानक धड़ से दरवाजा खोल उनके पति और उनके भाई घर में घुसे और घर का दरवाजा बंद कर लिया। डरे-सहमे वे हमें चुप रहने को कह एक कोने में छिप गये। 

हम समझ भी नहीं पाए कि हो क्या रहा है। इसी बीच कुछ लोग उनके घरों के दरवाजे पीटने लगे। हमने दरवाजे नहीं खोले तो उन्होंने दरवाजे तोड़ दिए। हाथों में तलवार लहराते दर्जनों लोग हमारे घर में घुस आये और हमारे पति और उनके भाई को बाहर ले गये। उन्होंने हमारी आंखों के सामने दोनों का कत्ल कर दिया। कौर बताती हैं कि ऐसे समय में उन्होंने अपने चार महीने के बच्चे के मुंह पर कपड़ा ठूंस दिया जिससे उसके रोने की आवाज बाहर न निकले, वरना उस दिन वो भी दंगों का शिकार हो गया होता।

अपनी कहानी बताते हुए परमजीत कौर की आंखें छलक पड़ीं। उन्होंने आंसू पोछे और फिर बताना शुरू किया- बेटे को उस दिन तो मैं बचा ले गई, लेकिन पेट की आग बुझाने मुझे घर से बाहर जाना पड़ा। बच्चे को ठीक से पालपोस नहीं सकी। वह नशे का शिकार हो गया। अब वह ई-रिक्शा चलाता है। कमाई नशे की भेंट चढ़ जाती है। उसके बच्चे आज उनकी पेंशन पर जी रहे हैं। परमजीत कौर की आंखें डबडबा जाती हैं जब वे यह सोचती हैं कि उनके जाने के बाद इन बच्चों का क्या होगा। 

परमजीत कौर का परिवार यह बताने के लिए काफी है कि दंगों में सिर्फ एक व्यक्ति नहीं मरा था, बल्कि तीन पीढ़ियां बर्बाद हो गयीं थीं। और विधवा मोहल्ले में ऐसे न जाने कितनी परमजीत कौर हैं। पहले दंगों ने, अब नशे ने, इन परिवारों को कभी न खत्म होने वाला दर्द दे दिया है। 

'उसे कोई फांसी क्यों नहीं देता'

जस्सी कौर आज नब्बे साल की हो चुकी हैं। आंखों से ठीक से दिखाई नहीं देता। घर के सामने एक चारपाई पर पड़ी रहती हैं। जब कोई जरूरत होती है, वे आवाज लगा देती हैं। पड़ोस की दो-तीन महिलायें आकर उनकी चारपाई एक तरफ से दूसरी तरफ कर देती हैं। जस्सी कौर भरभरायी आवाज में बताती हैं कि अगर आज उनका बेटा जिंदा होता तो उसके बाल-बच्चे होते। 

आज उन्हें एक कदम चलने के लिए किसी दूसरे का मोहताज न होना पड़ता। उन्होंने कहा- पति किरपाल सिंह बाहर काम कर रहे थे। पास के लोगों ने बताया कि घर चले जाओ, नहीं तो लोग तुम्हें मार देंगे। वे घर आये। पीछे से भीड़ आई। उन्हें घर के सामने ही क़त्ल कर दिया। हम चिल्ला भी नहीं सके। उन्होंने हमारे सामने हमारे पंद्रह साल के बेटे मोदू सिंह को टायरों में लपेट कर आग लगा दी थी।

वो चिल्ला रहा था और दंगाइयों की भीड़ कह रही थी- देखो बंदर नाच रहा है। दंगाइयों ने उनके घर के कुछ दूर पर ही एक जगह आग लगा दी थी। उनके एक सगे रिश्तेदार के बेटे को दंगाइयों ने उठाकर आग में फेंक दिया। कुछ देर उसके चीखने की आवाज आई और फिर सब शांत हो गया।

जस्सी कौर बताती हैं कि एक बड़ा नेता था। अगर एक इशारा कर देता तो भीड़ रुक जाती। उनकी दुनिया तबाह होने से बच जाती, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। पड़ोसी रेशम की दुकान से ये पता किया कि एक-एक घर में कितने पुरुष हैं। सबको घर में घुस-घुस कर खींचकर निकाल लिया और मार डाला। कौर कहती हैं- सज्जन कुमार को आजीवन कारावास क्यों हुई? उसे कोई फांसी क्यों नहीं देता। हमने उसका क्या बिगाड़ा था। 

जस्सी कौर कहती हैं कि पति और बेटा तो चले गये। अब वे पड़ोसियों की रहमोकरम पर जिंदा हैं और अपनी मौत का इंतज़ार कर रही हैं। कोई कैसे समझे कि उनकी मौत तो पैतीस साल पहले ही हो गई थी। अब तो बस वो एक सजा काट रही हैं। 
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