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अंबेडकर यूनिवर्सिटी में बिना यूजीसी की मान्यता के चल रहे कई कोर्स, ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sun, 26 Nov 2017 06:30 AM IST
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Ambedkar University
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21 साल पुराने बाबा साहब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी पढ़ाई की बजाय राजनीतिक अखाड़ा बना हुआ है। इसके कैंपस में कई कोर्स बिना विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की मंजूरी के चल रहे हैं। इसका खुलासा यूजीसी की ओर से यूनिवर्सिटी की ऑडिट रिपोर्ट में हुआ है। साथ ही रिपोर्ट में जातिवाद और राजनीतिक दलों के चलते इस संस्थान के कबाड़ा होने का दर्द भी बयां किया गया है।
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यूजीसी की ओर से विश्वविद्यालयों की जांच के लिए गठित कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। इसके अनुसार, यूनिवर्सिटी के कैंपस में इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (यूआईईटी) में बीटेक में सौ और एमटेक में तीन छात्र पढ़ते हैं।
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हालांकि यूआईईटी में एक भी नियमित शिक्षक नहीं है, सिर्फ अस्थायी शिक्षकों से काम चल रहा है। साथ ही यहां सेल्फ फाइनेंस मोड से कोर्स चल रहे हैं। इसकी यूजीसी और एआईसीटीई से मंजूरी भी नहीं ली गई है। यूनविर्सिटी में 78 कोर्स चलते हैं, जिसमें से महज 27 को ही नियमित कोर्स की मंजूरी यूजीसी से मिली है। वहीं, 37 कोर्स सेल्फ फाइनेंस मोड से चल रहे हैं, जिसमें से 25 से अधिक की यूजीसी से मंजूरी ही नहीं ली गई।
आपसी तालमेल तक नहीं
ऑडिट रिपोर्ट में कमेटी ने लिखा है कि 21 साल में यूनिवर्सिटी ने 20 फीसदी अकेडमिक गोल तक पूरा नहीं किया है। किसी भी यूनिवर्सिटी को आगे बढ़ाने में प्रिंसिपल एडमिनिस्ट्रेटिव (कुलपति, रजिस्ट्रार व वित्त अधिकारी) के बीच वर्किंग संबंध तो छोड़िए सिविल संबंध जैसा भी कुछ नहीं है, जोकि हैरान करने वाला है।
उक्त तीनों एक कमरे में बैठकर किसी योजना पर बात तक नहीं करते हैं। वे आपस में बात तक नहीं करते हैं। कुलपति का कार्यकाल जनवरी 2018 में पूरा हो रहा है। यूनिवर्सिटी में जैसे काम हो रहा है, उससे इसका कोई भविष्य नहीं है। इसलिए उक्त अधिकारियों को पद से हटा दिया जाना चाहिए।
हिंदी विभाग में एक भी स्थायी फैकल्टी नहीं
रिपोर्ट में लिखा है कि हिंदी विभाग में एक भी स्थायी शिक्षक नहीं है। यूनिवर्सिटी में 52 छात्रों पर एक शिक्षक उपलब्ध है। स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में महज पांच फैकल्टी है। जबकि चार वर्षीय एमबीए प्रोग्राम में सौ छात्र पढ़ते हैं।
जातिवाद और राजनीति का बोलबाला
कैंपस में पचास फीसदी सीटें एससी व एसटी की हैं। यहां जाति का बोलबाला है और उसी के आधार पर भेदभाव भी होता है। यहां जातिवाद और राजनीतिक पार्टियां हावी है, जिसके चलते इसका कबाड़ा हो रहा है।
जांच रिपोर्ट के अहम बिंदु
- - मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कमेटी को 25 बिंदुओं पर जांच करने को कहा था। हालांकि कमेटी के समक्ष यूनिवर्सिटी प्रबंधन कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया।
- - होम साइंस विभाग के अधीनस्थ डिपार्टमेंट ऑफ फूड एंड न्यूट्रिशियन में दाखिले के लिए अकेडमिक काउंसिल या बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट से कोई अनुमति नहीं मिली। यूजीसी से भी कोई मंजूरी नहीं दी गई है। छात्रों को डिपार्टमेंट की ओर से हस्ताक्षर किए गए मॉर्क्सशीट जारी की जाती है।
- - इंटर्नशिप और प्लेसमेंट के लिए कोई योजना नहीं है। इस पर काम करने की बेहद जरूरत है, ताकि डिग्री पूरी होने के साथ उन्हें रोजगार के अवसर मुहैया कराया जाए।
- - 21 सालों से 169 फैकल्टी कार्यरत थे, लेकिन इतने वर्षों में कोई रिसर्च नहीं की गयी है। इनमें से एक भी शिक्षक को राष्ट्रपति अवार्ड या उसकी सिफारिश तक नहीं हुई है।
- - बैचलर ऑफ वोकेशनल कोर्स में छात्रों की कोई दिलचस्पी नहीं है। प्रोडक्शन एंड मैनेजमेंट (महज चार छात्र), डिप्लोमा इन लाइफस्टोक मैनेजमेंट (3 छात्र), फ्लोरीक्लचर एंड लैंडस्कैप ग्रार्डनिंग, एमएससी इन नैनोसाइंस एंड नैनोटेक्नोलॉजी (4 छात्र), एमएससी इन एनर्जी एंड इनवायरमेंट (6 छात्र), एमए इन एजुकेशन (5 छात्र) व डिप्लोमा इन हिंदी जर्नलिज्म में महज दो छात्रों ने दाखिला ले रखा है।
- - कुल 17626 छात्रों के लिए 190 पद मंजूर हैं, जिसमें से महज 120 ही शिक्षक हैं। जबकि 140 कांट्रेक्ट पर गेस्ट फैकल्टी कार्यरत है। इस गेस्ट फैकल्टी के कारण पढ़ाई पर बेहद प्रभाव पड़ता है।