आर्यन आक्रमण की थ्योरी पूरी तरह झूठी, भारत ही है दक्षिण एशियाई देशों का गुरुः रिसर्च

डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला Updated Sat, 07 Sep 2019 10:47 AM IST
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भारत में आर्यों और अनार्यों के नाम पर खूब राजनीति हुई है। दक्षिण भारत के कई दलों की राजनीति आर्यों के विरोध के मुद्दे पर ही टिकी हुई है। लेकिन एक नए रिसर्च में खुलासा हुआ है कि भारत के मूल निवासियों पर आर्यों के आक्रमण की थ्योरी पूरी तरह गलत है। सच्चाई तो यह है कि उस काल में भारत के मूल निवासियों पर किसी तरह का आक्रमण हुआ ही नहीं था।
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उलटे भारत के ही लोगों के कुछ पूर्वज ईरान और तु्र्कमेनिस्तान जैसे मिडल ईस्ट देशों में गए थे। उन्होंने ही वहां के लोगों को खेती करना और अन्य प्रमुख कलाओं से परिचित कराया था। रिसर्च में यह भी खुलासा हुआ है कि अविभाजित भारत के हड़प्पाकाल के निवासी ही लगभग सभी दक्षिण एशियाई राष्ट्रों के पूर्वज हैं। यह रिपोर्ट हड़प्पाकालीन सभ्यता के प्रमुख शहरों में से एक राखीगढ़ी पर हुए रिसर्च के बाद सामने आई है।
हरियाणा के हिसार में स्थित राखीगढ़ी पर रिसर्च कर रही टीम के निदेशक प्रोफेसर वसंत शिंदे के मुताबिक भारत पर आर्यों के आक्रमण की कहानी पूरी तरह गलत है। राखीगढ़ी में दबे शवों के कंकालों के डीएनए परीक्षण के बाद यह तथ्य सामने आया है कि हड़प्पाकालीन भारतीय क्षेत्र में रह रहे लोग ही समय के साथ दक्षिण के राज्यों तक गए थे। उन कंकालों के डीएनए और आज के दक्षिण भारतीय लोगों के डीएनए यह बात साबित करते हैं। इतना ही नहीं, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और श्रीलंका तक के देशों के लोगों के लोगों के डीएनए परीक्षण यह बताते हैं कि वे सब हड़प्पाकालीन सभ्यता के लोगों के वंशज हैं।
प्रोफेसर वसंत शिंदे के मुताबिक हड़प्पाकालीन लोग ईरान और तुर्कमेनिस्तान तक गए थे और वहां के लोगों को उन्होंने अपनी सभ्यता से परिचित कराया था। इस बात की दोनों जगहों के निवासियों के डीएनएए के वैज्ञानिक परीक्षण के बाद सामने आई है।

रिसर्च टीम के एक अन्य विद्वान डॉ. नीरज राय ने कहा कि हड़प्पाकालीन लोग इतने दक्ष थे कि उन्होंने ही कृषि की कला का आविष्कार किया था। उन्होंने ही पशुओं को पालने की कला इरानी  लोगों को सिखाई थी। जबकि अभी तक की खोज के आधार पर यह माना जाता था कि हड़प्पाकालीन लोगों ने मध्य पूर्व के लोगों से खेती करना सीखा था। उन्होंने कहा कि हड़प्पाकाल के लोगों के घर बनाने की तकनीकी आज की सबसे उन्नत घर-सड़क बनाने की शैली से मिलती जुलती थी। उनके घरों में तीन से चार कक्ष होते थे जिन्हें अलग-अलग ढंग से स्नान घर, किचन और भंडारगृह के रुप में इस्तेमाल किया जाता था।
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