'सुप्रीम कोर्ट को अपना मूल काम करने के लिए वक्त नहीं'
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसे संवैधानिक मसलों से निपटने का समय नहीं मिलता है क्योंकि उसका अधिकांश वक्त दूसरी याचिकाओं को निपटाने में लग जाता है। वास्तव में शीर्ष अदालत ने यह बताने की कोशिश की है कि किस तरह लंबित मामलों से वह हांफ रहा है।
चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर और न्यायमूर्ति यूयू ललित की पीठ ने कहा कि आखिरकार सुप्रीम कोर्ट संविधान कोर्ट की तरह कैसे काम करें क्योंकि उसका 98 फीसदी वक्त तो अन्य याचिकाओं को निपटाने में लग जाता है। ये टिप्पणी मुंबई, चेन्नई और कोलकाता में नेशनल कोर्ट ऑफ अपील (सुप्रीम कोर्ट के समकक्ष) के गठन की गुहार संबंधी याचिका पर सुनवाई केदौरान की।
सुप्रीम कोर्ट से इस मसले की सुनवाई के लिए तीन सदस्यीय पीठ केपास भेज दिया है, जिससे कि इस मसले को संविधान पीठ केपास भेजा जा सके। पीठ ने अटॉर्नी जनरल और अमाइकस क्यूरी वरिष्ठ वकील केके वेणुगोपाल और सलमान खुर्शीद को इस संबंध में सलाह देने के लिए कहा है और आपस में सलाहों को साझा भी करने के लिए कहा है। तीन सदस्यीय पीठ केसमक्ष चार अप्रैल को सुनवाई होगी।
पीठ ने कहा कि संवैधानिक दायरे में रहकर क्या ऐसा करना संभव है? पीठ ने यह भी कहा कि कई मामले तो ऐसे होते हैं, जिसके बारे में याचिकाकर्ता को खुद ही पता होता है कि उनकी याचिकाएं खारिज हो जाएंगी तो भी वे याचिकाएं दायर करते हैं।
साथ ही पीठ ने यह भी कहा कि अभी सुप्रीम कोर्ट में 30 जज हैं जबकि लंबित मामलों की संख्या 15 लाख हो जाएगी तो 100 और जजों की जरूरत होगी। जजों की संख्या बढ़ाने से परस्पर विरोधी या असंगत फैसले आएंगे।
अटॉर्नी जनरल ने कहा, संविधान में संशोधन की जरूरत
वहीं केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि नेशनल कोर्ट ऑफ अपील (सुप्रीम कोर्ट के समकक्ष) का गठन न तो संभव है और न ही दरकार है। उन्होंने कहा कि इसके लिए संविधान में संशोधन की जरूरत है।
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के गठन को लेकर पूर्व में दाखिल कई याचिकाओं को खारिज हो गई है लिहाजा अब नेशनल कोर्ट ऑफ अपील (सुप्रीम कोर्ट के समकक्ष) के गठन का आग्रह किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान में भी नेशनल कोर्ट ऑफ अपील बनाने की कोशिश की थी लेकिन वह फेल हो गया।
वहीं अमाइकस क्यूरी केके वेणुगोपाल ने कहा कि आयरलैंड में छह वष्रों तक चली बहस केबाद इसका गठन किया गया। कई और देशों ने भी ऐसा किया है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने वाली अपील में 9.5 फीसदी अपील दिल्ली हाईकोर्ट की होती है जबकि केरल से महज 2.5 फीसदी। इसका कारण सुप्रीम कोर्ट से राज्यों की दूरी है।
शीर्ष अदालत ने वी वसंत कुमार की याचिका पर सुनवाई कर रही है। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के लिए कहा था। याचिका में चेन्नई, मुंबई और कोलकाता में नेशनल कोर्ट ऑफ अपील के गठन की गुहार की गई है।
याचिका में कहा गया है कि इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार ने ठुकरा दिया है। फरवरी 2014 में वी वसंत कुमार ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर केंद्र सरकार को छह महीने में इस मसले पर सुझाव देने के लिए कहा गया था। लेकिन बाद में सरकार ने इस सुझाव को ठुकरा दिया था। सरकार का कहना था कि इसके लिए संविधान केअनुच्छेद-130 में संशोधन करना होगा, यानी इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के गठन की पूरी परिकल्पना को बदलना होगा।
लिहाजा वी वसंत कुमार ने एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में कहा गया कि चेन्नई, मुंबई और कोलकाता में नेशनल कोर्ट ऑफ अपील के गठन से वादी-प्रतिवादियों को सहूलियत फायदा होगा। इससे न केवल समय की बचत होगी बल्कि उन्हें कम खर्च वहन करना होगा।