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Champai Soren: तीन जुलाई को ही लिखी जा चुकी थी बगावत की स्क्रिप्ट, अकेले चंपई के गढ़ से करीब 20 फीसदी सीटें

Mon, 19 Aug 2024 04:30 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Mon, 19 Aug 2024 04:30 PM IST
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सार

तीन जुलाई को चंपई सोरेन को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए विधायक दल की बैठक में कहा गया था। उसी दिन तय हो गया था कि झारखंड की सियासत में आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले बड़ी बगावत देखने को मिल सकती है।

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The script of the Champai alone rebellion had been written on July 3 itself
चंपई सोरेन - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन की सियासी बगावत कहने को तो 24 घंटे पहले ही खुलकर सामने आई है। लेकिन हकीकत में इसकी पूरी पटकथा आज से तकरीबन 45 दिन पहले 3 जुलाई को ही लिखी जा चुकी थी। दरअसल, वह तीन जुलाई का दिन था, जब चंपई सोरेन को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए विधायक दल की बैठक में कहा गया था। उसी दिन तय हो गया था कि झारखंड की सियासत में आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बड़ी बगावत देखने को मिल सकती है। दरअसल झारखंड में चंपई सोरेन जिस आदिवासी कोल्हान इलाके से आते हैं, वहां पर पूरे राज्य की तकरीबन 20 फीसदी सीटें हैं। सियासी गलियारों में कहा जा रहा है कि अगर चंपई सोरेन भाजपा के साथ नहीं जाते हैं, तो आने वाले चुनाव में नई पार्टी बनकर सियासी मैदान में उतर सकते हैं।



झारखंड में सियासी तूफान 
झारखंड में जो सियासी तूफान चंपई सोरेन के बगावती सुर के साथ देखने को मिल रहा है, दरअसल उसकी पटकथा तो पहले ही लिखी जानी शुरू हो गई थी। जून के आखिरी सप्ताह में जब यह तय हुआ कि हेमंत सोरेन जेल से बाहर आ रहे हैं। तो ऐसा माना जा रहा था कि सत्ता का हस्तांतरण बहुत आसानी से हो जाएगा। चूंकि इसके लिए जो वैधानिक प्रक्रिया है, उसे अपनाने के लिए विधायक दल की बैठक बुलाने का प्रस्ताव रखा गया। झारखंड मुक्ति मोर्चा के वरिष्ठ सदस्य प्रविध उरांग कहते हैं कि 3 जुलाई को आयोजित होने वाली विधायक दल की बैठक में जब मुख्यमंत्री चंपई सोरेन से इस्तीफा देने की बात कही गई, तो बैठक के दौरान सब कुछ सामान्य नहीं था। पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने भी इस बात का जिक्र किया है कि उनके लिए मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने की घोषणा 3 जुलाई को ही विधायक दल की बैठक में की गई। चंपई सोरेन मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद खुद को पूरी तरह से टूटा हुआ महसूस करते रहे। राजनीतिक जानकार और झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार अनुरंजन पांडे कहते हैं कि 3 जुलाई की घटना वैसे तो एक बंद कमरे में हुई थी। लेकिन उस बैठक के अंदर क्या हुआ था इसे लेकर झारखंड के सियासी गलियारों में कई बातें निकलकर सामने आ रही थीं।


18 विधानसभा सीटों पर चंपई सोरेन की पकड़
वह कहते हैं कि दिल्ली के गलियारों में भले यह सियासी एपिसोड नया लग रहा हो। लेकिन झारखंड में यह बात पहले से ही कही जाने लगी थी कि देर सवेर यहां की सियासत में चंपई सोरेन कुछ बड़ा कर सकते हैं। उनका कहना है कि दरअसल पार्टी के सबसे पुराने नेताओं में शुमार किए जाने वाले चंपई सोरेन आदिवासियों के बड़े नेता तो हैं ही, बल्कि जिस कोल्हान इलाके से वह जीत कर आते हैं वहां पर और आसपास के इलाकों में आने वाली तकरीबन 18 विधानसभा सीटों पर चंपई सोरेन का अपना मजबूत प्रभुत्व रहता है। 81 सीटों वाली झारखंड विधानसभा में तकरीबन 20 फीसदी सीटें कोल्हान इलाके से आती हैं। ऐसे में अगर यहां के बड़े नेता और सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन जिस दल के साथ भी जाएंगे, उसका सियासी तौर पर फायदा माना जा रहा है। पांडे कहते हैं कि फिलहाल अभी पता नहीं है कि चंपई सोरेन भाजपा के साथ जाएंगे या नहीं। उनका कहना है कि एक चर्चा यह भी हो रही है कि चंपई सोरेन नई पार्टी बनाकर आने वाले विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमा सकते हैं। या फिर भारतीय जनता पार्टी का समर्थन लेकर खुद और अपने विधायकों को निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनावी मैदान में उतार सकते हैं।

झारखंड में चुनाव की तैयारी
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जब जेल गए, तो वह अपने सबसे करीबी और पार्टी के भरोसेमंद नेता चंपई सोरेन को मुख्यमंत्री बना कर गए थे। हालांकि उस वक्त सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की भी हो रही थी कि हेमंत सोरेन अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बन सकते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और चंपई सोरेन को यह मौका मिला। झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता सीबोन खोंड कहते हैं कि जब चंपई सोरेन को सत्ता स्थानांतरण किए जाने की बात सामने आई, तो पार्टी के कुछ नेताओं ने अंदरूनी तौर पर इसका विरोध भी किया था। हालांकि यह विरोध इसलिए बहुत ज्यादा सामने नहीं आया, क्योंकि चंपई सोरेन पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते थे। अब जब झारखंड में चुनाव होने की तैयारी चल रही है तो चंपई सोरेन के बगावती तेवर से तूफान मच गया है। सीबोन कहते हैं कि पार्टी आला कमान जो फैसला लेगा, उसके आधार पर ही आगे की सियासी रणनीति बनाई जाएगी।

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