मोदी के 'सोमालिया' वाले बयान के पीछे की यह है असली कहानी
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प्रधानमंत्री मोदी के चुनावी रैली के दौरान केरल की तुलना सोमालिया से करने वाले बयान पर जमकर बवाल मचा है। केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने प्रधानमंत्री पर पलटवार करते हुए कहा था कि केरल और सोमालिया में कहीं से भी कोई लिंक नहीं है, मोदी को अपने बयान को वापस लेना चाहिए।
सोशल मीडिया पर भी पीएम मोदी के बयान की काफी आलोचना हो रही है, लेकिन मोदी ने जिस तस्वीर को देखने के बाद केरल की तुलना सोमालिया से की थी उसके पीछे का सच कुछ और ही है।
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार पीएम मोदी ने यह बयान मातृभूमि अखबार में फोटो के साथ छपी एक खबर के बाद दिया था जिसमें चार बच्चों को कूड़े के ढेर में से भोजन ढूंढते हुए दिखाया गया था।
इस तस्वीर का संदर्भ देते हुए मोदी ने कहा था कि केरल के आदिवासी इलाकों में बच्चों की स्थिति सोमालिया से भी ज्यादा खतरनाक है। अखबार ने यह खबर 4 नवंबर 2015 को छापी थी। बाद में स्थानीय न्यूज चैनलों और अखबारों ने भी इस खबर को प्रमुखता से उठाया था।
असल में अखबार में छपी तस्वीर में कन्नूर जिले के पेरावूर डंपिंग यार्ड (कूडाघर) में चार बच्चों को भोजन को भोजन की तलाश करते हुए दिखाया गया था। इसी तस्वीर का संदर्भ देते हुए मोदी ने कहा था, 'यहां केरल में जनजाति में जो बच्चों की मृत्यु दर है वो सोमालिया से भी खतरनाक है। अभी कुछ दिन पहले मीडिया में दर्दनाक चित्र देखने को मिला, पेरावूर में शेड्यूल ट्राइब के बालक कूड़े के ढेर में भोजन तलाश कर रहे हैं'।
तस्वीर के आधार पर सोमालिया से की थी केरल की तुलना
असल में यह तस्वीर पांचवी और छठी कक्षा में पढ़ने वाले चार बच्चों की थी, जो ग्राम पंचायत द्वारा चलाए जा रहे डपिंग ग्राउंड से 500 मीटर दूर एक आदिवासी कालोनी में रहते हैं।
इस खबर को लिखने वाले मातृभूमि अखबार के पत्रकार नजर वैलीयेदथ बताते हैं कि उन्हें इन बच्चों के बारे में डंपिंग ग्राउंड के स्टाफ द्वारा बताया गया था। बच्चे डंपिंग यार्ड की दीवार कूदकर अंदर आ जाते थे, जहां पंचायत की ओर से रोजाना यहां कूड़ा डलवाया जाता था।
असल में बच्चे इस कूड़े में से अपने लिए भोजन की तलाश करते थे। मैंने उनके तस्वीरें खींची जिसने सरकार को इस मामले में जांच कराने के लिए मजबूर कर दिया। वहीं यार्ड में कूडा डालने वाले ट्रक के ड्राइवर टी विजेश बताते हैं कि वह यहां होटल और बेकरियों से बचा हुआ बासी भोजन लाकर डालते हैं।
बच्चे ट्रक जाने तक बाहर इंतजार करते रहते हैं और जैसे ही ट्रक बाहर निकलता है वह दीवार कूदकर अंदर आ जाते हैं और उस कूड़े में से अपने लिए फल, पेसट्रीज, समोसा की तलाश में लग जाते हैं।
वे बच्चे वैसे कचरा बीनने वाले ही हैं। हमने कई बार उन्हें यहां से दूर रहने के लिए कहा और कई बार अधिकारियों से भी इसकी शिकायत की थी। मामले में शिकायत के बाद पुलिस ने मेरे और तीन अधिकारियों के बयान भी दर्ज किए थे। विरोध प्रदर्शनों के बाद एसटी डेवलपमेंट डिपार्टमेंट ने मामले की जांच की और इसकी रिपोर्ट 18 नवंबर को सौंप दी।
कूड़े में भोजन नहीं, पेस्ट्रीज और फलों की तलाश में आते थे बच्चे
स्थानीय थाने के एसएचओ बताते हैं कि, बच्चों के खिलाफ स्कूल छोड़ने की शिकायत भी थी, वे कर्मचारियों की चेतावनी के बावजूद भी डंपिंग ग्राउंड में आ जाते थे। उनके घरवाले रोजाना कामकाज करते हैं और उन्हें भोजन आदि को लेकर कोई परेशानी भी नहीं है।
उन बच्चों के दोनों परिवारों को ट्राइबल रिहैबिलेटेशन सेंटर की ओर से गवर्नमेंट फार्म पर एक-एक एकड़ जमीन खेती करने के लिए दी गई है। लेकिन वह यह जगह छोड़कर जाने को तैयार ही नहीं होते हैं। आज भी वो छोटे से मकानों में ही रहते हैं। बच्चों को स्कूल छोड़ने के लिए स्कूल बस की भी व्यवस्था है लेकिन कभी वह इसके पास जाने को भी तैयार नहीं होते।
वहीं जिला कलेक्टर पी बालाकिरण कहते हैं बच्चों के बारे में जो खबर फैलाई गई वो पूरी तरह गलत थी। उनके घरों में पर्याप्त भोजन है। उनके घरवालों ने भी कोई शिकायत नहीं की। वह बताते हैं इस घटना के बाद चारों बच्चों को वयानद में आवासीय स्कूल भेजा गया था लेकिन वे वहां से भाग आए। इसके बाद हमने उन्हें नजदीक ही कॉलोनी में स्थित एक अन्य स्कूल में भेजा।