क्या लोहड़ी अपने घर पर मना पाएंगे किसान? फेल होती दिख रही सरकार की ये योजना
सरकार किसानों के सुझावों को कानून में शामिल कर उन्हें घर वापस भेजने की योजना पर कर रही थी काम, लेकिन किसानों के कृषि कानूनों के वापसी पर कड़े रुख ने सरकार को मुश्किल में डाला...
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केंद्र सरकार किसानों से अगले दौर की बातचीत में उनके सुझावों को कृषि कानूनों में शामिल कर उनकी घर वापसी की योजना बना रही थी। लेकिन किसानों ने साफ कर दिया है कि केंद्र सरकार से वार्ता के दौरान तीनों विवादित कृषि कानूनों की वापसी से कम किसी विकल्प पर विचार नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही सरकार को फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पूरी खरीद की वैधानिक गारंटी भी देनी होगी। किसानों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले दिनों में उनका आंदोलन और तेज होगा और 26 जनवरी को वे पूरे देश में किसान गणतंत्र दिवस मनाएंगे। किसानों के इस एलान ने सरकार को मुश्किल में डाल दिया है।
दरअसल, केंद्र सरकार को भी अब इस बात का अहसास हो गया है कि किसान इस बार बिना अपनी मांगों को मनवाए घर वापस जाने के मूड में नहीं हैं। यही कारण है कि सरकार अब बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रही है। इसके लिए वह तीनों कानूनों को वापस लेने की जगह किसानों के सुझावों को कृषि कानूनों में शामिल करने की योजना बना रही है तो न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर वह मध्यप्रदेश का मॉडल अपनाने पर विचार कर रही है जहां एमएसपी से कम पर खरीद होने पर राज्य सरकार किसानों को उसकी भरपाई करती है।
सरकार की योजना थी कि चार जनवरी और इससे अगले एक-दो दौर की वार्ता के दौरान किसानों को अपने पक्ष में मोड़ लिया जाए जिससे 13 जनवरी के लोहड़ी के त्योहार तक किसानों को उनके घर वापस जाने की योजना बनाई जा सके। पंजाब-हरियाणा के लिए बेहद संवेदनशील इस त्योहार तक किसानों के घर वापस जाने से देश में किसानों के बीच केंद्र सरकार के प्रति एक सकारात्मक छवि उभर सकती थी, जो किसान आंदोलन के दौरान उपजी उसकी नकारात्मक छवि की भरपाई करने में मदद कर सकती थी।
इसी सोच के मद्देनजर 30 दिसंबर की वार्ता के बाद सरकार ने यह ढोल पीटने की कोशिश भी की कि उसने किसानों से अपने मुद्दे सुलझाने में 50 फीसदी तक सफलता पा ली है। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसानों से अपनी महिलाओं-बच्चों को आंदोलन से घर भेजने की अपील भी की थी। अगर ऐसा हो जाता तो सरकार के पक्ष में एक सकारात्मक संदश पैदा हो सकता था। फिलहाल किसानों ने ऐसा करने से सीधे इनकार कर उसकी योजनाओं पर पानी फेर दिया।
इधर, किसान अलग ही योजना पर काम कर रहे हैं। उनका अंदेशा है कि अगर बिना किसी ठोस उपलब्धि के केवल सरकार के आश्वासन पर एक बार घर वापसी कर ली जाएगी, तो दुबारा इसी स्तर का आंदोलन खड़ा कर पाना संभव नहीं होगा। यह निराशा किसानों को लंबे समय तक कोई दूसरा आंदोलन करने की हिम्मत नहीं देगा। यही कारण है कि किसान नेता चाहते हैं कि सरकार उन्हें ठोस काम करके दिखाए जो उनके आंदोलन की सफलता को प्रमाणित करे। इसके लिए उन्हें महीने-दो महीने और भी इंतजार करना पड़ जाए तो वे इसके लिए भी पूरी तरह तैयार हैं।
किसान चाहते हैं कि जब तक सरकार उनकी मांगों को एक कानून के जरिए लागू नहीं कर देती तब तक उन्हें दिल्ली में रामलीला मैदान, बोट क्लब या जंतर-मंतर पर एक जगह उपलब्ध करवा दी जाए, जहां वे शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करते रहें और इधर सरकार कानूनी प्रक्रियाओं को पूरी करती रहे। इससे धरने का आकार कम कर सरकार की मुश्किल कम की जा सकेगी तो किसानों का आंदोलन भी चलता रहेगा और सरकार के ऊपर दबाव भी बना रहेगा।
इसी योजना को आगे बढ़ाने के लिए किसान 23 जनवरी को राज्यों की सभी राजधानियों में राजभवन पर प्रदर्शन करने की योजा बना रहे हैं। अगर इसके जरिए वे 23 जनवरी को दिल्ली में प्रवेश कर जाते हैं, तो इसके बाद उन्हें वहां से वापस करना सरकार के लिए संभव नहीं होगा। इसके बाद वे 26 जनवरी को किसान गणतंत्र दिवस मनाने की रणनीति पर भी काम कर सकेंगे जो सरकार के लिए खासी मुश्किलें खड़ी करने वाला साबित हो सकता है।
शनिवार की किसानों की बात ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस आंदोलन का हल निकलना अभी काफी दूर है। वहीं, सरकार के सामने अपने अल्प आर्थिक संसाधनों में किसानों की मांग का रास्ता निकालने और अपनी राजनीतिक साख को भी बरकरार रखने की कठिन चुनौती है। अगर सरकार इसमें देर करती है तो लगभग साल भर में होने वाले कई राज्यों के महत्वपूर्ण चुनावों में उसको इसका भारी नुकसान हो सकता है।