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इन कीलों से 'पंचर' न हो जाए सरकार की साख, पार्टी के साथ सहयोगी दलों के नेता भी चिंतित

Thu, 04 Feb 2021 06:47 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 04 Feb 2021 06:47 PM IST
सार

कई नेता मान रहे कि किसान आंदोलन के रास्तों पर कीलें और कंटीली तारों की बाड़ लगाने से सरकार की लोकप्रियता पर पड़ रहा असर, जल्द चाहते हैं कोई समाधान...

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The government credibility should not be dent by police barricades and spikes at Farmers protest, leaders of allied parties along with the party are also worried
Police barricades - फोटो : PTI

विस्तार

किसानों को दिल्ली की तरफ आगे बढ़ने से रोकने के लिए सड़कों पर कीलें ठोंक दी गई हैं। कंटीले तारों की कई स्तर की बाड़ लगा दी गई है। लेकिन भाजपा के साथ-साथ एनडीए के सहयोगी दलों के कई नेता भी मानते हैं कि इन कीलों को ठोंकने से एनडीए सरकार की साख प्रभावित हो रही है। इससे देश-विदेश में एक नकारात्मक संदेश जा रहा है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस लोकप्रियता को प्रभावित कर सकता है, जो उन्होंने दुनिया भर के शीर्ष नेताओं से बात-मुलाकात करके बनाई है। इन नेताओं का मानना है कि अब स्वयं प्रधानमंत्री को किसानों से बातचीत कर इस मामले का तुरंत कोई हल निकालना चाहिए। बातचीत शुरू करने को लेकर कोई हठधर्मिता नहीं दिखाई जानी चाहिए।

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एनडीए के एक सहयोगी दल के शीर्ष नेता ने अमर उजाला से कहा कि जो भी भारत की आत्मा को समझता है वह तमाम असहमति होने के बाद भी किसानों के रास्तों में कीलें ठोंकने का सुझाव नहीं दे सकता। यह काम विदेशी अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ा कोई अंग्रेजीदां तो कर सकता है, लेकिन देश की माटी में पला बढ़ा, किसानों-मजदूरों के साथ संघर्ष करते हुए आगे पहुंचा कोई व्यक्ति इस तरह का काम नहीं कर सकता। सरकार को ये कीलें तुरंत हटानी चाहिए और किसानों से बातचीत करके मामले का एक उचित हल निकालना चाहिए।
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इस नेता ने कहा कि जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय इसी तरह जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन का बिगुल फूंका था तो वरिष्ठ समाजवादी नेता चंद्रशेखर ने इंदिरा जी को यह सुझाया था कि वे जेपी से संघर्ष का रास्ता न अपनाएं। वे एक संत हैं और इस देश का जनमानस किसी संत से सत्ता का संघर्ष कभी स्वीकार नहीं करता। आजादी के आंदोलन से लेकर इतिहास के सुदूर पन्नों में बार-बार इसी भावना की पुष्टि हुई है। नेता के मुताबिक, लेकिन कुछ लोगों की सलाह पर इंदिरा गांधी ने सुलह का रास्ता नहीं अपनाया, जिसके कारण देश को आपातकाल देखना प़ड़ा और स्वयं उन्हें सत्ता से बेदखल होना पड़ा। उन्होंने कहा कि आज के दौर में भी सरकार को किसानों से टकराव की बजाय उनसे मिलजुलकर एक रास्ता तलाश करने की कोशिश करनी चाहिए।
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वहीं, भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने अमर उजाला से कहा कि प्रधानमंत्री की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनी मजबूत छवि के पीछे सबसे बड़ा योगदान इस देश की जनता का है जिसने उन्हें अभूतपूर्व समर्थन दिया। लेकिन पहले शाहीन बाग और अब किसान आंदोलन के कई महीनों लंबे तक खिंचते रहने से ऐसा संदेश जा रहा है कि यह सरकार अपने ही लोगों से बातचीत नहीं करती। वह बातचीत के जरिए कोई समाधान निकालने की बजाय किसी मुद्दे पर हठधर्मी रुख बनाए रखने में विश्वास करती है। इससे एक नकारात्मक संदेश जा रहा है जिससे बचने की जरूरत है।

यह प्रधानमंत्री का अंदाज नहीं

किसान नेता अविक साहा ने अमर उजाला से कहा कि वे स्वयं भी यह नहीं मानते कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कहने पर या उनकी जानकारी में देकर इस तरह का कदम उठाया गया होगा। लेकिन किसानों के रास्ते में कीलें ठोंकने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वह साख अवश्य प्रभावित हो रही है, जो उन्होंने अपनी मेहनत से देश-विदेश में यात्रा करके और विश्व के शीर्ष नेताओं से मुलाकात करके बनाई है। प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे पहल कर इस गतिरोध को दूर करें क्योंकि अब बात केवल एक मुद्दे पर प्रदर्शन का नहीं रह गया है। इससे अब देश की साख प्रभावित होने लगी है और प्रधानमंत्री यह कभी नहीं चाहेंगे कि देश की छवि पर कोई असर पड़े।

कैसे निकले मुद्दे का समाधान

जनता दल यूनाइटेड के नेता केसी त्यागी ने अमर उजाला से कहा कि यह कटु सच्चाई है कि आजादी के पूर्व से लेकर आज तक किसानों को कभी उनकी उपज का सही मूल्य नहीं मिला। इसलिए एमएसपी या मंडियों के लिए किसानों की नाराजगी को बेवजह नहीं कहा जा सकता। सरकार को किसानों की बातों को ध्यान से सुनना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सरकार कृषि कानूनों को डेढ़ साल तक निलंबित रखने पर सहमत हो गई है। अब सरकार को आगे बढ़कर इन कानूनों को तब तक निलंबित रखने का प्रस्ताव कर देना चाहिए जब तक कि इसका किसानों और विशेषज्ञों की बनी कमेटी से कोई सर्वमान्य हल नहीं निकल जाता। उन्होंने कहा कि अगर सरकार यह प्रस्ताव कर देती है तो किसानों को भी इसे तुरंत खारिज करने पर नहीं अड़ना चाहिए।



केसी त्यागी ने कहा कि किसानों ओर सरकार दोनों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि कुछ लोग ऐसे हैं जो किसी भी कीमत पर समस्या का समाधान नहीं होने देना चाहते। किसानों की समस्याओं का सही हल खोजने के इच्छुक सही किसान नेताओं की इस सोच को सफल नहीं होने देना चाहिए।

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