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मंजिलें और भी हैं : पहले लोग कहते थे पौधा चोर, पर अब हूं ट्री मैन
Thu, 04 Jul 2019 12:22 AM IST
Avdhesh Kumar
विष्णु लांबा
विष्णु लांबा
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Thu, 04 Jul 2019 12:22 AM IST
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विष्णु लांबा
- फोटो : amar ujala
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यह काम मैं खुद को साधारण-सा व्यक्ति मानकर करता हूं। मैं राजस्थान में टोंक जिले के लांबा गांव का रहने वाला हूं। मेरे पिता गांव के मंदिर में महंत हैं। मेरी मां हमेशा पौधे लगाने और उनकी देखभाल के लिए प्रेरित करती रहती थी, जिसके चलते बचपन से ही मेरा पेड़-पौधे, पशु-पक्षियों से लगाव हो गया। मैं तब सात वर्ष का था, जब अपने बाड़े (घर के पास स्थित जानवर रखने की जगह) में तरह-तरह के पौधे लगाना शुरू कर दिया। चूंकि मेरे पास तब पैसे नहीं होते थे, लेकिन पौधे लगाने के जुनून के चलते मैं किसी के भी घर और खेत से पौधा चुराने में हिचकता नहीं था।
मेरी इन आदतों से तंग आकर घरवालों ने मुझे बुआजी के यहां पढ़ने के लिए भेज दिया। पर एक-दो बार लालच में आकर मैंने वहां भी पौधों चुराए तो मुझे मेरे ताऊजी के पास जयपुर भेज दिया गया। जयपुर आकर मुझे तरह-तरह के पौधे देखने को मिले, जो बेहद खूबसूरत थे। जयपुर में जवाहर सर्किल में ताऊजी के घर से थोड़ी दूर पर कलेक्टर श्रीमत पांडे का घर बना हुआ था, जिसमें उनके कोई रिश्तेदार रहते थे। वहां बड़ी-सी नर्सरी थी, जिसमें खूब सारे पौधे थे। एक रात लघुशंका का बहाना बनाकर मैं घर से निकला और पांडे जी की नर्सरी में पहुंच गया। इसके बाद वहां से तुलसी, काजू, चीकू, अमरूद और अनार के पौधे चुराए और उन्हें चाचा जी के घर पर रोप दिया।
जब सुबह उठकर ताऊजी ने हरियाली देखी तो चौंक पड़े। मुझे बुलाया और कहा कि, मैं शाम तक सोच लूं कि मुझे अपनी सफाई में क्या कहना है। इधर मैं सोच रहा था कि आखिर होगा क्या। दो-चार डंडे पड़ेंगे, खा लेंगे, पौधे तो नहीं जाने दूंगा। शाम को ताऊजी ने खूब पिटाई की, अंत में बताना पड़ा कि पौधे कहां से लाया हूं। ताऊजी पांडेजी के घर ले गए, और बोले कि इससे सारे पौधे वापस लो और सजा दो। लेकिन पौधों के प्रति मेरा प्रेम देखकर श्रीमंत पांडेजी ने न सिर्फ मुझे माफ किया, बल्कि वह पौधे भी दे दिए।
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मेरी इन आदतों से तंग आकर घरवालों ने मुझे बुआजी के यहां पढ़ने के लिए भेज दिया। पर एक-दो बार लालच में आकर मैंने वहां भी पौधों चुराए तो मुझे मेरे ताऊजी के पास जयपुर भेज दिया गया। जयपुर आकर मुझे तरह-तरह के पौधे देखने को मिले, जो बेहद खूबसूरत थे। जयपुर में जवाहर सर्किल में ताऊजी के घर से थोड़ी दूर पर कलेक्टर श्रीमत पांडे का घर बना हुआ था, जिसमें उनके कोई रिश्तेदार रहते थे। वहां बड़ी-सी नर्सरी थी, जिसमें खूब सारे पौधे थे। एक रात लघुशंका का बहाना बनाकर मैं घर से निकला और पांडे जी की नर्सरी में पहुंच गया। इसके बाद वहां से तुलसी, काजू, चीकू, अमरूद और अनार के पौधे चुराए और उन्हें चाचा जी के घर पर रोप दिया।
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जब सुबह उठकर ताऊजी ने हरियाली देखी तो चौंक पड़े। मुझे बुलाया और कहा कि, मैं शाम तक सोच लूं कि मुझे अपनी सफाई में क्या कहना है। इधर मैं सोच रहा था कि आखिर होगा क्या। दो-चार डंडे पड़ेंगे, खा लेंगे, पौधे तो नहीं जाने दूंगा। शाम को ताऊजी ने खूब पिटाई की, अंत में बताना पड़ा कि पौधे कहां से लाया हूं। ताऊजी पांडेजी के घर ले गए, और बोले कि इससे सारे पौधे वापस लो और सजा दो। लेकिन पौधों के प्रति मेरा प्रेम देखकर श्रीमंत पांडेजी ने न सिर्फ मुझे माफ किया, बल्कि वह पौधे भी दे दिए।
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पढ़ाई में कमजोर होने के कारण उन्होंने मुझे एक संन्यासी के पास भेज दिया। कुछ दिन बाद मेरा मन संन्यासी बनने का हुआ। लेकिन जल्द ही मैंने यह विचार त्याग दिया और अपना जीवन पौधारोपण को समर्पित कर दिया। इसके साथ मेरे मन में एक विचार और आया कि आजादी की लड़ाई में शामिल क्रांतिकारियों के परिवारों की खोज की जाए और पौधारोपण के साथ उनका सम्मान किया जाए। तो मैंने देश के 22 राज्यों में भ्रमण कर लगभग 56 से अधिक क्रांतिकारियों के परिवारों को खोजा, और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी से उनका सम्मान करवाया।
इसी आयोजन में राष्ट्रपति जी ने मुझे ट्री मैन के नाम से संबोधित किया। अब यही मेरा नाम है। इसके बाद शहीदों के जन्म और बलिदान स्थलों पर पौधारोपण, और उनके पारिवारों का सम्मान करवाया। फिल्म 'पान सिंह तोमर' से प्रेरित होकर मैंने राजस्थान के चंबल से चित्रकूट तक फैले बीहड़ों की करीब दो साल तक खाक छानी और पूर्व कुख्यात दस्युओं को अपनी मुहिम से जोड़ा। इसके बाद पर्यावरण को समर्पित 'पहले बसाया बीहड़-अब बचाएंगे बीहड़' समारोह का आयोजन कर सभी पूर्व दस्युओं को
पर्यावरण संरक्षण की शपथ दिलाई।
बिना सरकारी सहयोग के अब तक करीब साढ़े आठ लाख पौधे लगा चुका हूं। साथ ही इस मुहिम से कई राज्यों के युवाओं को जोड़ा है और दस लाख से ज्यादा पौधे नि:शुल्क बांटे भी हैं। इन कामों में धनप्रकाश त्याजी ने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया और कठिन वक्त में हर प्रकार से मदद की। मैं चाहता हूं कि प्रधानमंत्री क्रांतिकारियों के नाम पर बने राष्ट्रीय स्मारकों पर स्वच्छता अभियान की तरह एक पौधारोपण अभियान शुरू कराएं जिससे आने वाली पीढ़ी को बलिदानियों की गाथाओं को याद रखने के साथ पर्यावरण बचाने की सीख मिल सके।
इसी आयोजन में राष्ट्रपति जी ने मुझे ट्री मैन के नाम से संबोधित किया। अब यही मेरा नाम है। इसके बाद शहीदों के जन्म और बलिदान स्थलों पर पौधारोपण, और उनके पारिवारों का सम्मान करवाया। फिल्म 'पान सिंह तोमर' से प्रेरित होकर मैंने राजस्थान के चंबल से चित्रकूट तक फैले बीहड़ों की करीब दो साल तक खाक छानी और पूर्व कुख्यात दस्युओं को अपनी मुहिम से जोड़ा। इसके बाद पर्यावरण को समर्पित 'पहले बसाया बीहड़-अब बचाएंगे बीहड़' समारोह का आयोजन कर सभी पूर्व दस्युओं को
पर्यावरण संरक्षण की शपथ दिलाई।
बिना सरकारी सहयोग के अब तक करीब साढ़े आठ लाख पौधे लगा चुका हूं। साथ ही इस मुहिम से कई राज्यों के युवाओं को जोड़ा है और दस लाख से ज्यादा पौधे नि:शुल्क बांटे भी हैं। इन कामों में धनप्रकाश त्याजी ने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया और कठिन वक्त में हर प्रकार से मदद की। मैं चाहता हूं कि प्रधानमंत्री क्रांतिकारियों के नाम पर बने राष्ट्रीय स्मारकों पर स्वच्छता अभियान की तरह एक पौधारोपण अभियान शुरू कराएं जिससे आने वाली पीढ़ी को बलिदानियों की गाथाओं को याद रखने के साथ पर्यावरण बचाने की सीख मिल सके।