कोरोना संक्रमण को रोकने वाली औषधियों के पौधों से लहलहाएंगे गंगा के किनारे
- केंद्रीय जल शक्ति, आयुष और कृषि मंत्रालय के मध्य हुआ एमओयू
- किसानों की आय में 5 हजार करोड़ के इजाफे की संभावना
विस्तार
कोरोना संक्रमण के चलते आयुर्वेदिक दवाओं की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अब गंगा के तटीय इलाकों के किसानों को औषधीय पौधे और जड़ी-बूटियों की खेती के लिए प्रेरित किया जाएगा। इसके लिए गंगा नदी के किनारों पर औषधीय पौधों को उगाने के लिए बीज डालने का काम शुरू हो गया है। अभी तक तटीय इलाकों में किसान अमूमन सब्जियों और फसलों की खेती करते थे।
नमामी गंगे योजना के तहत केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय, आयुष मंत्रालय और केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने इस आश्य के एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किया है। इसका मकसद गंगा के किनारों को रसायनों से मुक्त करना और इसके माध्यम से किसानों की आय को दोगुना करने की योजना को गति देना है।
मंत्रालयों ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत औषधि खेती के माध्यम से कोरोना संक्रमण की लड़ाई में योगदान के साथ किसानों को आय और गंगा को प्रदूषण से मुक्त कराने के लिए इस योजना का आगाज किया है। इसमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में 14.96 करोड़ रुपयों की लागत से 14 से ज्यादा औषधीय पौधों और जड़ी-बूटियों के बड़े पार्क बनाए जाएंगे।
इसमें उत्तर प्रदेश में वन विभाग की मदद से नमामी गंगे प्रोजेक्ट से जुड़े 10 जिलों में 60 ऐसे कलस्टर बनाए जा चुके हैं। इसमें 180 ग्राम पंचायतें 2500 हजार हेक्टेयर भूमि पर 3546.59 लाख रुपय की लागत से औषधीय पौधों की खेती कर रहे हैं।
किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरने की उम्मीद
इसके लिए उत्तर प्रदेश में 17 विभागीय पौधशालाओं और 50 कृषक पौधशालाएं स्थापित की जा चुकी हैं। इसमें लखनऊ स्थिति सीएसआईआर- केंद्रीय औषधि और सुगंधित पौध संस्थान किसानों को इस तरह की खेती के लिए संपूर्ण सहायता दे रहा है।
इसमें पौध की गुणवत्ता जांच, बाजार की स्थिति और आर्थिक और तकनीकी सहायता शामिल है। इससे अभी 7800 किसान जुड़े हैं, जिन्हें इस खेती से लाभ और आर्थिक स्थिति में सुधार होने की पूरी उम्मीद है।
साबित हो सकता है रामबाण औषधि
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक राजीव रंजन मिश्र कहते हैं कि इस प्रोजेक्ट के लागू होने और इसका जमीनी कार्यान्वयन, गंगा की सफाई के साथ उसके स्वास्थ के लिए भी रामबाण औषधि साबित हो सकता है। इसलिए कृषि क्षेत्र में सही तरीके से ध्यान देना जरूरी है।
उन्होंने कहा इसी को ध्यान में रखकर वैसे तो पिछले तीन साल से गंगा के किनारे खेती के पैटर्न को बदलने के लिए कई तरह के कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। लेकिन कोरोना महामारी के दौर में गंगा के किनारे औषधीय पौधे संक्रमण की दवाओं को तैयार करने में आयुर्वेद की मदद के साथ गंगा को भी संवारने में सहायता करेंगे।
गंगा की शुद्धता को बढ़ावा
उन्होंने कहा कि गंगा के किनारे इस तरह के वन विकसित करने पर काम किया जा रहा है, जिससे आसपास के वातावरण के साथ गंगा के किनारे भी औषधीय पौधों से लहलहा उठें। ताकि गंगा की शुद्धता को भी बढ़ावा मिले।
रंजन मिश्र के मुताबिक गंगा के तटीय इलाकों को लेकर आत्मनिर्भर भारत में वित्तमंत्री ने गंगा किनारे औषधीय पौधों का गलियारा बनाने की घोषणा की है। इसके लिए नेशनल मेडिसिनल प्लांट बोर्ड ने गंगा के किनारे की 800 हेक्टेयर जमीन को चिन्हित कर लिया है।
10 लाख हेक्टेयर भूमि पर अगले दो साल में जड़ी-बूटियों का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हो जाएगा। उन्होंने कहा कि एक अनुमान मुताबिक इससे किसानों को 5000 करोड़ रुपये की आय प्राप्त हो सकेगी।