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Health: रोज 10 मिनट का नृत्य किशोरियों को बीमारी से रखेगा महफूज, गैर-संक्रामक रोगों के समाधान के लिए बड़ा कदम
Sun, 27 Apr 2025 05:57 AM IST
शुभम कुमार
अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क
Published by: शुभम कुमार
Updated Sun, 27 Apr 2025 05:57 AM IST
सार
भारत की स्कूली बच्चियां (किशोरियां) अपने स्कूल के समय में प्रतिदिन केवल दस मिनट भी नृत्य करें तो वे कई प्रकार के गैर-संक्रामक रोगों (एनसीडी) से खुद को सुरक्षित रख सकती हैं। इतना ही नहीं, इस छोटे से प्रयास से उनके हृदय स्वास्थ्य में भी उल्लेखनीय सुधार देखा जा सकता है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : एजेंसी
विस्तार
यदि भारत की स्कूली बच्चियां (किशोरियां) अपने स्कूल के समय में प्रतिदिन केवल दस मिनट भी नृत्य करें तो वे कई प्रकार के गैर-संक्रामक रोगों (एनसीडी) से खुद को सुरक्षित रख सकती हैं। इतना ही नहीं, इस छोटे से प्रयास से उनके हृदय स्वास्थ्य में भी उल्लेखनीय सुधार देखा जा सकता है। यह निष्कर्ष जर्नल ऑफ डायबिटीज साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन में सामने आया है।
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विशेष रूप से निम्न आय वाले देशों में किशोरियों के लिए सक्रिय जीवनशैली को बढ़ावा देने के प्रयास अभी भी बहुत सीमित हैं। चेन्नई के दो सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में 13 से 15 वर्ष की आयु वर्ग की 108 किशोरियों पर यह अध्ययन 12 सप्ताह तक चला। इस दौरान प्रतिभागी छात्राओं ने सप्ताह में पांच दिन, दस-दस मिनट के नृत्य सत्रों में भाग लिया। प्रशिक्षित प्रशिक्षकों की निगरानी में इन सत्रों को नियमित रूप से आयोजित किया गया, जिससे सुनिश्चित किया जा सके कि गतिविधि प्रभावी और सुरक्षित रहे।
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परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे। मात्र तीन महीनों के भीतर किशोरियों के शरीर में वसा की मात्रा में दो फीसदी तक की कमी देखी गई, औसतन वजन 0.7 किलो ग्राम घटा, मांसपेशियों का द्रव्यमान लगभग 0.9 किलोग्राम बढ़ा और उनकी आराम करते समय हृदय गति में भी सकारात्मक परिवर्तन दर्ज किए गए। इसके अलावा उनका रक्तचाप नियंत्रण में रहा और उनकी पैदल चलने की गति (वाकिंग स्पीड) में भी सुधार हुआ।
गैर-संक्रामक रोगों के समाधान के लिए बड़ा कदम...
भविष्य के लिए यह पहल भारत में गैर-संक्रामक रोगों की बढ़ती समस्या के समाधान की दिशा में एक अभिनव कदम है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी बच्चों और किशोरों के लिए प्रतिदिन कम से कम 60 मिनट की शारीरिक गतिविधि की सिफारिश करता है। भारत जैसे देशों में जहां जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, ऐसे अभिनव और व्यवहारिक कार्यक्रमों को बड़े पैमाने पर लागू करने की आवश्यकता है।
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माताओं ने भी सक्रियता दिखाई
कम आय वाले शहरी समुदायों में किशोरियों को अक्सर खेलों से बाहर रखा जाता है। खासकर किशोर लड़कियों के बीच व्यायाम शब्द अक्सर नकारात्मक संदर्भों से जुड़ा होता है। ऐसे में इस नृत्य कार्यक्रम को एक सांस्कृतिक दृष्टिकोण से विकसित किया गया है ताकि किशोरियां सहजता से इसमें भाग लें। नृत्य को मनोरंजन और सामाजिक स्वीकृति से जोड़कर पेश करने से छात्राओं में शारीरिक गतिविधि के प्रति रुचि जागृत हुई। उल्लेखनीय है कि इस पहल के कारण उनकी माताओं ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया, जिससे पूरे समुदाय में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैली। स्वास्थ्य पर दूरगामी प्रभाव अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि इस तरह के छोटे और सुलभ उपाय शारीरिक निष्क्रियता की समस्या को कम कर सकते हैं।