{"_id":"652baf526f3f891bb1006d07","slug":"telangana-assembly-election-brs-kcr-hattrick-maybe-in-jeopardy-as-congress-aimim-and-bjp-muscle-up-news-and-up-2023-10-15","type":"story","status":"publish","title_hn":"Election 2023: तेलंगाना में क्यों मुश्किल में है KCR की हैट्रिक! कांग्रेस और ओवैसी समेत BJP ने भी बढ़ाई चुनौती","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Election 2023: तेलंगाना में क्यों मुश्किल में है KCR की हैट्रिक! कांग्रेस और ओवैसी समेत BJP ने भी बढ़ाई चुनौती
सार
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बीते 10 सालों में कांग्रेस ने अपनी कमियों को न सिर्फ समझा बल्कि अपने उन दूर गए नेताओं को भी साथ में जोड़ना शुरु किया जिससे कभी संयुक्त राज्य रहे आंध्र प्रदेश में सत्ता संभाली जाती थी।
विज्ञापन
केसीआर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
अगले कुछ दिनों में होने वाले तेलंगाना के चुनाव में क्या केसीआर की हैट्रिक लगेगी या इस बार सियासत का ऊंट किसी और करवट बैठेगा। सियासी विश्लेषकों की मानें तो केसीआर के लिए 2023 में होने वाला चुनाव बीते दो चुनावों की तुलना में सबसे चुनौती भरा होने वाला है। इसके पीछे सियासी जानकारों के अपने कई तर्क हैं। इसमें कांग्रेस पार्टी की आक्रामक रणनीति और हिमाचल समेत कर्नाटक में जीते हुए चुनाव के आधार पर तैयार किया गया सियासी रोड मैप है। वहीं भारतीय जनता पार्टी का हिंदुत्व की पिच पर बनाया जा रहा माहौल और असदुद्दीन ओवैसी का इन सभी राजनैतिक दलों के सियासी रोड मैप के बीच में मजबूत जगह तलाशना सबसे बड़ा कारण केसीआर की हैट्रिक पर ब्रेक लगाने का माना जा रहा है। फिलहाल राज्य में सभी पार्टियों का दावा अपने अपने लिहाज से सरकार बनाने या किंग मेकर बनने का ही हो रहा है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 2014 में तेलंगाना बनने के बाद जब वहां चुनाव हुए तो केसीआर ने राज्य की सत्ता संभाली। तेलंगाना के वरिष्ठ पत्रकार और सियासी विश्लेषक के चक्रधर राव कहते हैं कि 2014 में केसीआर को जब सत्ता मिली तो उन्होंने नए राज्य में जितना बेहतरीन और जनता के सरोकार के लिए काम किया जाना चाहिए था वह जमकर किया। नतीजा यह हुआ की 2019 के विधानसभा चुनाव में वह बंपर तरीके से राज्य में दोबारा सत्ता संभालने के लिए वापसी कर गए। राव कहते हैं कि इन 5 सालों में भी केसीआर ने राज्य की बेहतरी के लिए खूब काम किया। लेकिन बीते 10 सालों से सत्ता से बाहर रही कांग्रेस ने भी सियासी तौर पर अपनी कमियों को दूर कर राज्य में वापसी की तैयारी शुरू कर दी। उनका कहना है कि जिस तरह से कांग्रेस ने तेलंगाना में अपनी मजबूती के दावे के लिए रैलियां जनसंपर्क और सम्मेलनों के साथ साथ डोर टू डोर अभियान चलाया उसने पार्टी में राज्य की सियासत में एक बड़ी ऊर्जा पैदा कर दी।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बीते 10 सालों में कांग्रेस ने अपनी कमियों को न सिर्फ समझा बल्कि अपने उन दूर गए नेताओं को भी साथ में जोड़ना शुरु किया जिससे कभी संयुक्त राज्य रहे आंध्र प्रदेश में सत्ता संभाली जाती थी। राजनीतिक विश्लेषक चक्रधर राव कहते हैं कि राहुल गांधी से लेकर प्रियंका गांधी और सोनिया गांधी से लेकर मल्लिकार्जुन खरगे तक ने तेलंगाना को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना कर जमकर रैलियां और जनसभाएं शुरू की हैं। पार्टी के प्रमुख नेता लगातार तेलंगाना में न सिर्फ दौरा कर रहे हैं बल्कि जनता से मुखातिब होकर कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में जीती गई बाजी के दांव को भी यहां आजमा रहे हैं। तेलंगाना कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रेवंथ रेड्डी कहते हैं कि इस बार राज्य में कांग्रेस की सरकार ही बनने वाली है। उनका दावा है कि जिस तरह से कांग्रेस ने कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में जनता के मुद्दों पर चुनाव लड़ा था उन्हीं मुद्दों के आधार पर वह तेलंगाना में भी जनता के बीच में है। वह कहते हैं कि जिस तरीके से हैदराबाद में सोनिया गांधी की रैली हुई और केसीआर की पार्टी के कई बड़े नेता कांग्रेस का दामन थाम कर इस बार उनके साथ राज्य के विकास का खाका खींच रहे हैं। उससे उनकी पार्टी पूरी तरीके से आश्वस्त है कि आने वाले दिनों में केसीआर सत्ता से बाहर होंगे।
विज्ञापन
हालांकि कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना यह भी है कि जिस तरीके से केसीआर ने तेलंगाना राज्य के बनने के बाद गांव और शहरों में तेजी से विकास किया उससे राज्य की जनता उनके साथ मजबूती से खड़ी है। लेकिन वह यह भी मानते हैं कि दस साल तक सत्ता में बने रहना किसी न किसी स्तर पर सत्ता विरोधी लहर से जूझने वाली परिस्थितियां भी पैदा करता है। बीआरएस पार्टी के नेता एम. दिनेशकुमार कहते हैं कि जिस तरीके से केसीआर ने राज्य में किसानों के लिए पानी से लेकर उनकी फसल और गांव से लेकर शहरों में विकास का नया डेवलपमेंट मॉडल तैयार किया है। उसी की बदौलत उनकी सरकार को एक बार फिर तेलंगाना की जनता बंपर वोटो से जिता कर सत्ता में भेजने वाली है। एम कुमार कहते हैं कि एक नए राज्य के बनने के बाद जिस तरीके की ज़रूरतें होती हैं, उनकी सरकार ने दिन रात मेहनत करके किया है। यही वजह है कि राज्य की जनता और उनकी पार्टी के बीच में रिश्ता राजनीतिक नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है। बीआरएस पार्टी के नेताओं का मानना है कि जब सभी राजनीतिक दल नफा नुकसान देखकर चुनाव के मौके पर सीटों का बंटवारा कर रहे हैं तो उनकी पार्टी में जनता के बीच में रहने वाले नेताओं को करीब डेढ़ महीने पहले ही प्रत्याशी बनाकर अपने-अपने क्षेत्र में और मेहनत मजबूती से काम करने का निर्देश दे दिया था।
वहीं अगर बीते दस सालों से राज्य में सत्ता से दूर रही कांग्रेस ने अपनी सियासी पिच को मजबूत करने की पूरी फील्डिंग सजाई है तो भारतीय जनता पार्टी ने भी इसमें कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है। केंद्र में मंत्री रहे और वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जी किशन रेड्डी भी सियासी मैदान में ताल ठोक कर भाजपा को बढ़त दिलाने की पूरी तैयारी में लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार चक्रधर राव कहते हैं जिस तरीके से भारतीय जनता पार्टी में राज्य में हिंदुत्व की पिच पर सियासी बैटिंग करनी शुरू की है उसे मामला राज्य के सियासत का पेचीदा होता जा रहा है। हालांकि वह कहते हैं कि इसका असर वोट के और सीट के तौर पर भारतीय जनता पार्टी को कितना होगा यह तो सियासी परिणाम बताएंगे। लेकिन यह बात तय है कि इस साल होने वाला विधानसभा का चुनाव केसीआर के लिए बिल्कुल आसान होगा यह कहना थोड़ा मुश्किल लग रहा है। क्योंकि 2019 के चुनाव में 119 में 101 सीटें जीतकर बीआरएस ने अगले कुछ सालों के सियासत का संदेश तो स्पष्ट दे दिया था। लेकिन इन पांच सालो में राज्य की सियासत में सत्ता से दूर रहने वाली पार्टियों ने बड़ी मेहनत कर चुनाव को रोचक तो कर ही दिया है।
वह कहते हैं कि इन सभी सियासी समीकरणों के बीच असदुद्दीन ओवैसी की भी राज्य में मजबूत पकड़ सियासत को एक नए नजरिए से देखने का बड़ा आयाम भी दे रही है। सियासी जानकारों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी ने अगर राज्य में हिंदुत्व की पिच पर मजबूत बैटिंग करने के लिहाज से फील्डिंग सजाई है तो इसका फायदा असदुद्दीन ओवैसी मजबूती से समूचे राज्य में लेने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इस वक्त असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी की राज्य में सात सीटें हैं। ओवैसी की पार्टी लगातार राज्य में अपनी सियासी जमीन को अपने ही राजनीतिक एजेंडे से मजबूत करने की कोशिश में बनी हुई है। राजनीतिक विश्लेषक राजू मन्नम कहते हैं कि तेलंगाना की सियासत में जातिवाद के लिहाज से जितना रंग गाढ़ा होता रहेगा उतना ही सियासी नजरिए से चुनाव अलग रंग में रंगता जाएगा।
यहां पर कांग्रेस भी उन्हीं जाति बिरादरी और समुदाय का वोट लेने की फिराक में है जो की बीआरएस का अपना कोर वोटर है। वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी में चार लोकसभा सीटें भी जीती हैं। इसलिए भाजपा भी इस राज्य में अपनी मजबूत दावेदारी के साथ सत्ता का रास्ता तलाश रही है। इन सब के बीच बहुजन समाज पार्टी भी दलित राजनीति के साथ तेलंगाना में सत्ता पक्ष और कांग्रेस के वोट बैंक में सेंधमारी की तैयारी में लग गई है। राजू मन्नम कहते हैं बीते 5 सालों में सियासत का राज्य में विस्तार भी खूब हुआ है। और राजनीतिक दलों ने अपनी सियासी जमीन भी मजबूत करने की पूरी कोशिश की है। ऐसे में यह विधानसभा का चुनाव राज्य बनने के बाद होने वाले किसी भी चुनाव से सबसे ज्यादा रोचक होने वाला है।
विज्ञापन
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 2014 में तेलंगाना बनने के बाद जब वहां चुनाव हुए तो केसीआर ने राज्य की सत्ता संभाली। तेलंगाना के वरिष्ठ पत्रकार और सियासी विश्लेषक के चक्रधर राव कहते हैं कि 2014 में केसीआर को जब सत्ता मिली तो उन्होंने नए राज्य में जितना बेहतरीन और जनता के सरोकार के लिए काम किया जाना चाहिए था वह जमकर किया। नतीजा यह हुआ की 2019 के विधानसभा चुनाव में वह बंपर तरीके से राज्य में दोबारा सत्ता संभालने के लिए वापसी कर गए। राव कहते हैं कि इन 5 सालों में भी केसीआर ने राज्य की बेहतरी के लिए खूब काम किया। लेकिन बीते 10 सालों से सत्ता से बाहर रही कांग्रेस ने भी सियासी तौर पर अपनी कमियों को दूर कर राज्य में वापसी की तैयारी शुरू कर दी। उनका कहना है कि जिस तरह से कांग्रेस ने तेलंगाना में अपनी मजबूती के दावे के लिए रैलियां जनसंपर्क और सम्मेलनों के साथ साथ डोर टू डोर अभियान चलाया उसने पार्टी में राज्य की सियासत में एक बड़ी ऊर्जा पैदा कर दी।
विज्ञापन
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बीते 10 सालों में कांग्रेस ने अपनी कमियों को न सिर्फ समझा बल्कि अपने उन दूर गए नेताओं को भी साथ में जोड़ना शुरु किया जिससे कभी संयुक्त राज्य रहे आंध्र प्रदेश में सत्ता संभाली जाती थी। राजनीतिक विश्लेषक चक्रधर राव कहते हैं कि राहुल गांधी से लेकर प्रियंका गांधी और सोनिया गांधी से लेकर मल्लिकार्जुन खरगे तक ने तेलंगाना को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना कर जमकर रैलियां और जनसभाएं शुरू की हैं। पार्टी के प्रमुख नेता लगातार तेलंगाना में न सिर्फ दौरा कर रहे हैं बल्कि जनता से मुखातिब होकर कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में जीती गई बाजी के दांव को भी यहां आजमा रहे हैं। तेलंगाना कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रेवंथ रेड्डी कहते हैं कि इस बार राज्य में कांग्रेस की सरकार ही बनने वाली है। उनका दावा है कि जिस तरह से कांग्रेस ने कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में जनता के मुद्दों पर चुनाव लड़ा था उन्हीं मुद्दों के आधार पर वह तेलंगाना में भी जनता के बीच में है। वह कहते हैं कि जिस तरीके से हैदराबाद में सोनिया गांधी की रैली हुई और केसीआर की पार्टी के कई बड़े नेता कांग्रेस का दामन थाम कर इस बार उनके साथ राज्य के विकास का खाका खींच रहे हैं। उससे उनकी पार्टी पूरी तरीके से आश्वस्त है कि आने वाले दिनों में केसीआर सत्ता से बाहर होंगे।
विज्ञापन
हालांकि कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना यह भी है कि जिस तरीके से केसीआर ने तेलंगाना राज्य के बनने के बाद गांव और शहरों में तेजी से विकास किया उससे राज्य की जनता उनके साथ मजबूती से खड़ी है। लेकिन वह यह भी मानते हैं कि दस साल तक सत्ता में बने रहना किसी न किसी स्तर पर सत्ता विरोधी लहर से जूझने वाली परिस्थितियां भी पैदा करता है। बीआरएस पार्टी के नेता एम. दिनेशकुमार कहते हैं कि जिस तरीके से केसीआर ने राज्य में किसानों के लिए पानी से लेकर उनकी फसल और गांव से लेकर शहरों में विकास का नया डेवलपमेंट मॉडल तैयार किया है। उसी की बदौलत उनकी सरकार को एक बार फिर तेलंगाना की जनता बंपर वोटो से जिता कर सत्ता में भेजने वाली है। एम कुमार कहते हैं कि एक नए राज्य के बनने के बाद जिस तरीके की ज़रूरतें होती हैं, उनकी सरकार ने दिन रात मेहनत करके किया है। यही वजह है कि राज्य की जनता और उनकी पार्टी के बीच में रिश्ता राजनीतिक नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है। बीआरएस पार्टी के नेताओं का मानना है कि जब सभी राजनीतिक दल नफा नुकसान देखकर चुनाव के मौके पर सीटों का बंटवारा कर रहे हैं तो उनकी पार्टी में जनता के बीच में रहने वाले नेताओं को करीब डेढ़ महीने पहले ही प्रत्याशी बनाकर अपने-अपने क्षेत्र में और मेहनत मजबूती से काम करने का निर्देश दे दिया था।
वहीं अगर बीते दस सालों से राज्य में सत्ता से दूर रही कांग्रेस ने अपनी सियासी पिच को मजबूत करने की पूरी फील्डिंग सजाई है तो भारतीय जनता पार्टी ने भी इसमें कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है। केंद्र में मंत्री रहे और वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जी किशन रेड्डी भी सियासी मैदान में ताल ठोक कर भाजपा को बढ़त दिलाने की पूरी तैयारी में लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार चक्रधर राव कहते हैं जिस तरीके से भारतीय जनता पार्टी में राज्य में हिंदुत्व की पिच पर सियासी बैटिंग करनी शुरू की है उसे मामला राज्य के सियासत का पेचीदा होता जा रहा है। हालांकि वह कहते हैं कि इसका असर वोट के और सीट के तौर पर भारतीय जनता पार्टी को कितना होगा यह तो सियासी परिणाम बताएंगे। लेकिन यह बात तय है कि इस साल होने वाला विधानसभा का चुनाव केसीआर के लिए बिल्कुल आसान होगा यह कहना थोड़ा मुश्किल लग रहा है। क्योंकि 2019 के चुनाव में 119 में 101 सीटें जीतकर बीआरएस ने अगले कुछ सालों के सियासत का संदेश तो स्पष्ट दे दिया था। लेकिन इन पांच सालो में राज्य की सियासत में सत्ता से दूर रहने वाली पार्टियों ने बड़ी मेहनत कर चुनाव को रोचक तो कर ही दिया है।
वह कहते हैं कि इन सभी सियासी समीकरणों के बीच असदुद्दीन ओवैसी की भी राज्य में मजबूत पकड़ सियासत को एक नए नजरिए से देखने का बड़ा आयाम भी दे रही है। सियासी जानकारों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी ने अगर राज्य में हिंदुत्व की पिच पर मजबूत बैटिंग करने के लिहाज से फील्डिंग सजाई है तो इसका फायदा असदुद्दीन ओवैसी मजबूती से समूचे राज्य में लेने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इस वक्त असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी की राज्य में सात सीटें हैं। ओवैसी की पार्टी लगातार राज्य में अपनी सियासी जमीन को अपने ही राजनीतिक एजेंडे से मजबूत करने की कोशिश में बनी हुई है। राजनीतिक विश्लेषक राजू मन्नम कहते हैं कि तेलंगाना की सियासत में जातिवाद के लिहाज से जितना रंग गाढ़ा होता रहेगा उतना ही सियासी नजरिए से चुनाव अलग रंग में रंगता जाएगा।
यहां पर कांग्रेस भी उन्हीं जाति बिरादरी और समुदाय का वोट लेने की फिराक में है जो की बीआरएस का अपना कोर वोटर है। वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी में चार लोकसभा सीटें भी जीती हैं। इसलिए भाजपा भी इस राज्य में अपनी मजबूत दावेदारी के साथ सत्ता का रास्ता तलाश रही है। इन सब के बीच बहुजन समाज पार्टी भी दलित राजनीति के साथ तेलंगाना में सत्ता पक्ष और कांग्रेस के वोट बैंक में सेंधमारी की तैयारी में लग गई है। राजू मन्नम कहते हैं बीते 5 सालों में सियासत का राज्य में विस्तार भी खूब हुआ है। और राजनीतिक दलों ने अपनी सियासी जमीन भी मजबूत करने की पूरी कोशिश की है। ऐसे में यह विधानसभा का चुनाव राज्य बनने के बाद होने वाले किसी भी चुनाव से सबसे ज्यादा रोचक होने वाला है।