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खास बातचीत: तराली सरमा बोलीं- भूपेन दा के गीतों में झलकती है गंगा से बोल्गा तक की संस्कृति

Sun, 02 Oct 2022 04:35 PM IST
अभिषेक दीक्षित एन. अर्जुन, कोलकाता
एन. अर्जुन, कोलकाता Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Sun, 02 Oct 2022 04:35 PM IST
सार

असमिया फिल्मी इंडस्ट्री की प्रख्यात गायिका और संगीत निर्देशिका तराली कहती हैं कि उनकी गीतों में मिट्टी की खुशबू है, जीवन के प्रति एक लगाव है। कहीं पवित्र गंगा की लहर सी लय है तो कहीं पवन सी जीवन दायिनी है, उनका संगीत। उनकी संगीत सांस्कृतिक विरासत को अपने संग लेकर चलती है।

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Tarali Sarma said Culture from Ganga to Bolga is reflected in the songs of Bhupen Da Latest News
Tarali Sarma - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

भूपेन दा (डॉ. भूपेन हाजरिका) केवल एक महान संगीतकार ही नहीं, बल्कि एक बहु-आयामी व्यक्तित्व थे। वे भारतीय सांस्कृतिक विरासत के वाहक थे। उन्हें जितना असम और पूर्वोत्तर प्यारा था, उतना ही प्यारा पूरा देश था। उनके रग-रग में संगीत के माध्यम से देश सेवा रची-बसी थी। उन्होंने अपनी आवाज से पूर्वोत्तर को एक अलग पहचान दी। उनके गीतों में गंगा से लेकर बोल्गा तक की संस्कृति झलकती है। उनके बारे में हम कुछ भी कहें, वह सब कुछ सूरज को दीया दिखाने जैसा है। यह बात भूपेन दा की याद में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने आईं, सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित, हर दिल अजीज असमिया गायिका तरली सरमा ने अमर उजाला से खास बातचीत में कही।

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बाहरी दुनिया के लोग पूर्वोत्तर को भूपेन दा के गानों से पहचानते हैं, जी, आपने बिल्कुल सही कहा कि एक समय था जब बाहर के लोग हमारे पूर्वोत्तर को भूपेन दा के गीतों से पहचाना जाता था। उन्होंने जो गीत गाया, वह दिल को छूने वाला गाया। उनका हर गीत, आज देश और दुनिया के लोग गुनगुनाते हैं। रूदाली का गाना दिल हूम हूम करे..... हो या फिर चाय बागान को लेकर गाया गीत एक फूल दो पत्तिया....दिल को बहुत सुकून देने वाला है।
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असमिया फिल्मी इंडस्ट्री की प्रख्यात गायिका और संगीत निर्देशिका तराली कहती हैं कि उनकी गीतों में मिट्टी की खुशबू है, जीवन के प्रति एक लगाव है। कहीं पवित्र गंगा की लहर सी लय है तो कहीं पवन सी जीवन दायिनी है, उनका संगीत। उनकी संगीत सांस्कृतिक विरासत को अपने संग लेकर चलती है। चलायमान है उनका संगीत। कहीं चाय की खुशबू है तो कहीं पंक्षियों की चहचहाहट है। कहीं बादलों की गर्जन है तो कहीं रूदाली का दर्द है। उनका संगीत सर्वकालिक है। उन्होंने जो गाया, वह उनका भारतीय ही नहीं, बल्कि विश्व संगीत के लिए एक विरासत है। भूपेन दा का बहुत समय कोलकाता में गुजरा। यहां पर उनका घर भी है, जो अब बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है। यह ऐतिहासिक है, इसे संभालना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी इस ऐतिहासिक विरासत को देख सके और प्रेरणा ले सके।
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उन्होंने बताया कि हमारे परिवार का माहौल ही संगीतमय था। पिता जी, प्रभात सरमा संगीत नाटक अवॉर्डी थे। वे ख्यातप्राप्त बांसुरीवादक थे और संगीत निर्देशक थे। मैं उस परिवार में पली और बढ़ी जहां संगीत से बहुत लगाव था। वहीं से मुझे भी प्रेरणा मिली और धीरे-धीरे, आगे बढ़ी। बड़ों का आशीर्वाद मिला और यहां तक पहुंची। पूर्वोत्तर के युवा बहुत सुरीले हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बहुत कम चमक पाते हैं, यह बात आपकी काफी हद तक सत्य है, लेकिन अब माहौल बदल रहा है। हमारे पूर्वोत्तर के युवा अब धीरे-धीरे आगे आ रहे हैं। संगीत हो या नृत्य, वे अब आगे बढ़ रहे हैं। हमारे जैसों का दायित्व काफी ज्यादा है। मैं तो हमेशा कोशिश करती हूं कि जिनमें संगीत

के प्रति लगाव है, ऐसे बच्चों को आगे बढ़ाऊं।

उन्होंने बताया कि दुनिया भर से लोग असमिया संगीत और शास्त्रीय नृत्य सीखने आ रहे हैं। सत्रीय संगीत को लेकर दुनियाभर के लोगों में काफी क्रेज है। पूर्वोत्तर खासकर असम में सत्रीय संगीत को सीखने के लिए बाहर से छात्र-छात्राएं आते हैं। यहां का संगीत बहुत मीठा और नृत्य बहुत सुंदर है। यहां के बरगीत सुनकर दुनियाभर में सुने जाते हैं। निश्चित रूप से अमसिया संगीत का भविष्य बहुत उज्ज्वल है।

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