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Ground Report: तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी का मुद्दा चर्चा में, आस्था के दीपम और इतिहास के साथ जल रही सियासत की लौ
सार
Tamilnadu Assembly Election 2026: तमिलनाडु में 23 अप्रैल को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है, लेकिन उससे पहले सभी दल तमाम मुद्दों के साथ जनता के बीच पहुंच रहे हैं। इसी बीच तिरुपरनकुंद्रम का मुद्दा भी खूब चर्चा में है। यह वह इलाका है, जहां हिंदू और मुसलमानों के बीच मोहल्ले, कारोबार और रिश्तों की साझी दुनिया बसती है। पढ़िए, तिरुपरनकुंद्रम पर एक विशेष रिपोर्ट...
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तमिलनाडु विधानसभा चुनाव- तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी का मुद्दा
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
मदुरै से 15 किमी दूर तिरुपरनकुंद्रम। यहां की तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी यहां रहने वालों के बचपन और बुढ़ापे की सबसे गहरी पहचान है। उसके ठीक नीचे मंदिर। ऊपर दरगाह और विधानसभा चुनाव के कांधे पर बंदूक धरकर, इन दोनों के बीच खिंची सियासत वाली एलओसी। पहाड़ी के आंचल में मुरुगन मंदिर है और उसके शिखर पर सिकंदर बदुशा दरगाह है। 14वीं शताब्दी की इस दरगाह को लेकर पिछले साल दिसंबर में कार्तिगई दीपम उत्सव के दौरान विवाद शुरू हो गया।
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पिछले महीने मार्च में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मंदिर में दर्शन के लिए आए थे। उन्होंने कार्तिगई दीपम विवाद को लेकर तमिलनाडु सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि राज्य में अपनी आस्था और सांस्कृतिक जुड़ाव को अहमियत दी जानी चाहिए। मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एमके. स्टालिन लगातार बयान दे रहे हैं कि भाजपा मदुरै को मणिपुर बनाना चाहती है।
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डीएमके और अन्नाद्रमुक के बीच सीधा मुकाबला
वैसे तिरुपरनकुंद्रम सीट डीएमके और अन्नाद्रमुक के सीधे मुकाबले वाली है। यहां जीत और हार टिकट किसे दिया, इससे तय होती है। डीएमके ने इस बार महिला प्रत्याशी कृथिका थंगपंडियान को टिकट दिया है। वह युवा हैं और यह उनका पहला चुनाव है। पिछली बार के विधायक अन्नाद्रमुक के वीवी राजन चेलप्पा फिर चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं टीवीके से सीटीआर निर्मलकुमार मैदान में हैं। पिछले चुनाव ने चेलप्पा ने सीपीआई एम नेता को 30 हजार वोट से हराया था। इलाके में 3.21 लाख मतदाता हैं, जिनमें महिलाएं थोड़ी ज्यादा हैं। डीएमके के प्रचार में महिला प्रत्याशी के लिए महिला कार्यकर्ता ज्यादा हैं। वे हिंदी तो नहीं बोल पातीं, लेकिन टूटी फूटी अंग्रेजी में कहती हैं कि वे डीएमके का साथ दे रही हैं। डीएमके उन्हें और उनकी बहन को मदद करती है। उनका इशारा उन सब घोषणाओं की ओर था, जिसमें सरकार अलग-अलग योजनाओं के जरिए पैसे बांट रही है।
शाम होते-होते मंदिर में भीड़ बढ़ने लगती है। मदुरै के अलावा आसपास के कई जिलों, यहां तक की राज्यों के लोग भी इस मंदिर में आते हैं। मंदिर के ठीक सामने फूलों की दुकान लगानेवाले मनोहर को लगता है कि हिंदुओं को पहाड़ी पर दीपम जलाने दिया जाना चाहिए था। मुसलमानों को इससे शायद कोई दिक्कत नहीं होती। याकूब मंदिर से चार गली छोड़कर रहते हैं। चार पीढ़ियों से यहीं घर है और सब्जियों का कारोबार करते हैं। वह कहते हैं, पहले वह छुट्टी या जुमे पर बिरयानी लेकर दरगाह पर दोस्तों के साथ जाते थे। अब कुछ महीनों से उस पर पाबंदी है। वह कहते हैं उनके यहां के मुसलमानों को इससे कोई खास दिक्कत नहीं है।
तिरुपरनकुंद्रम में विधानसभा चुनाव के कंधे पर बंदूक रखकर मंदिर और दरगाह के बीच खिंची सियासत वाली एलओसी - तिरुपरनकुंद्रम वह इलाका है, जहां हिंदू और मुसलमानों के बीच मोहल्ले, कारोबार और रिश्तों की साझी दुनिया बसती है। दिसंबर से मार्च के बीच चार महीनों में कैसे एक धार्मिक मसला राजनीतिक मसले में बदल गया, इस पर यहां के बाशिंदे भी हैरान हैं।
क्या है विवाद?
विवाद की जड़ एक परंपरा को लेकर है, जिसे लेकर मंदिर और दरगाह के बीच टकराव बढ़ा। मंदिर समिति पहाड़ी पर दरगाह के भीतर एक जगह दीप जलाना चाहती थी। हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई। हाईकोर्ट के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने परंपरा के हवाले से इसकी इजाजत दे दी। लेकिन डीएमके सरकार ने बात नहीं मानी। याचिका को चुनौती दी। धारा 144 लगा दी। भाजपा ने इसे हिंदू विरोधी कहा, लेफ्ट पार्टियों ने सांप्रदायिक तनाव का आरोप लगाया। इसी बीच एक वीडियो वायरल हुआ। उसमें दरगाह में बकरे की बलि और बिरयानी खाते लोग दिखाई दिए। बवाल हुआ तो मुसलमान पक्ष को दरगाह में बलि के लिए जाने से रोक दिया गया। यहां तक की वहां ले जाकर बिरयानी खाने से भी। हिंदू संगठन पहाड़ी का नाम बदलकर श्रीकंदर मलाई रखने की मांग करने लगे।
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घरों और लोगों के बीच सौहार्द की बुनावट
एम नचियप्पन, तमिलनाडु में भाजपा के मंदिर सेल के प्रमुख हैं। वह कहते हैं, दीपम नहीं जलाने देकर डीएमके की स्टालिन सरकार मुसलमानों को दिखाना चाहती है कि वह उनकी सुरक्षा कर रहे हैं। ऐसा करने से मुसलमान उन्हें वोट देंगे, पर ऐसा नहीं होगा। बल्कि हिंदू वोटर डीएमके के खिलाफ हो गए हैं। राजनीतिक विशेषज्ञ रामू मणिवन्नन कहते हैं, तमिलनाडु में चुनाव में धर्म से ज्यादा पार्टी बड़ी होती है। यही वजह है कि भाजपा का अयोध्या वाला मॉडल यहां काम नहीं आ रहा। मंदिर से दो सौ मीटर दूर एक गली के मुहाने पर बोर्ड लगा है, यह रास्ता सिकंदर दरगाह को जाता है। उस गली में पहले दो घर मुसलमानों के हैं, फिर तीन हिंदुओं के, फिर एक मुसलमान का और फिर चार हिंदुओं के।
अन्य वीडियो
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पिछले महीने मार्च में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मंदिर में दर्शन के लिए आए थे। उन्होंने कार्तिगई दीपम विवाद को लेकर तमिलनाडु सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि राज्य में अपनी आस्था और सांस्कृतिक जुड़ाव को अहमियत दी जानी चाहिए। मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एमके. स्टालिन लगातार बयान दे रहे हैं कि भाजपा मदुरै को मणिपुर बनाना चाहती है।
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डीएमके और अन्नाद्रमुक के बीच सीधा मुकाबला
वैसे तिरुपरनकुंद्रम सीट डीएमके और अन्नाद्रमुक के सीधे मुकाबले वाली है। यहां जीत और हार टिकट किसे दिया, इससे तय होती है। डीएमके ने इस बार महिला प्रत्याशी कृथिका थंगपंडियान को टिकट दिया है। वह युवा हैं और यह उनका पहला चुनाव है। पिछली बार के विधायक अन्नाद्रमुक के वीवी राजन चेलप्पा फिर चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं टीवीके से सीटीआर निर्मलकुमार मैदान में हैं। पिछले चुनाव ने चेलप्पा ने सीपीआई एम नेता को 30 हजार वोट से हराया था। इलाके में 3.21 लाख मतदाता हैं, जिनमें महिलाएं थोड़ी ज्यादा हैं। डीएमके के प्रचार में महिला प्रत्याशी के लिए महिला कार्यकर्ता ज्यादा हैं। वे हिंदी तो नहीं बोल पातीं, लेकिन टूटी फूटी अंग्रेजी में कहती हैं कि वे डीएमके का साथ दे रही हैं। डीएमके उन्हें और उनकी बहन को मदद करती है। उनका इशारा उन सब घोषणाओं की ओर था, जिसमें सरकार अलग-अलग योजनाओं के जरिए पैसे बांट रही है।
शाम होते-होते मंदिर में भीड़ बढ़ने लगती है। मदुरै के अलावा आसपास के कई जिलों, यहां तक की राज्यों के लोग भी इस मंदिर में आते हैं। मंदिर के ठीक सामने फूलों की दुकान लगानेवाले मनोहर को लगता है कि हिंदुओं को पहाड़ी पर दीपम जलाने दिया जाना चाहिए था। मुसलमानों को इससे शायद कोई दिक्कत नहीं होती। याकूब मंदिर से चार गली छोड़कर रहते हैं। चार पीढ़ियों से यहीं घर है और सब्जियों का कारोबार करते हैं। वह कहते हैं, पहले वह छुट्टी या जुमे पर बिरयानी लेकर दरगाह पर दोस्तों के साथ जाते थे। अब कुछ महीनों से उस पर पाबंदी है। वह कहते हैं उनके यहां के मुसलमानों को इससे कोई खास दिक्कत नहीं है।
तिरुपरनकुंद्रम में विधानसभा चुनाव के कंधे पर बंदूक रखकर मंदिर और दरगाह के बीच खिंची सियासत वाली एलओसी - तिरुपरनकुंद्रम वह इलाका है, जहां हिंदू और मुसलमानों के बीच मोहल्ले, कारोबार और रिश्तों की साझी दुनिया बसती है। दिसंबर से मार्च के बीच चार महीनों में कैसे एक धार्मिक मसला राजनीतिक मसले में बदल गया, इस पर यहां के बाशिंदे भी हैरान हैं।
क्या है विवाद?
विवाद की जड़ एक परंपरा को लेकर है, जिसे लेकर मंदिर और दरगाह के बीच टकराव बढ़ा। मंदिर समिति पहाड़ी पर दरगाह के भीतर एक जगह दीप जलाना चाहती थी। हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई। हाईकोर्ट के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने परंपरा के हवाले से इसकी इजाजत दे दी। लेकिन डीएमके सरकार ने बात नहीं मानी। याचिका को चुनौती दी। धारा 144 लगा दी। भाजपा ने इसे हिंदू विरोधी कहा, लेफ्ट पार्टियों ने सांप्रदायिक तनाव का आरोप लगाया। इसी बीच एक वीडियो वायरल हुआ। उसमें दरगाह में बकरे की बलि और बिरयानी खाते लोग दिखाई दिए। बवाल हुआ तो मुसलमान पक्ष को दरगाह में बलि के लिए जाने से रोक दिया गया। यहां तक की वहां ले जाकर बिरयानी खाने से भी। हिंदू संगठन पहाड़ी का नाम बदलकर श्रीकंदर मलाई रखने की मांग करने लगे।
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घरों और लोगों के बीच सौहार्द की बुनावट
एम नचियप्पन, तमिलनाडु में भाजपा के मंदिर सेल के प्रमुख हैं। वह कहते हैं, दीपम नहीं जलाने देकर डीएमके की स्टालिन सरकार मुसलमानों को दिखाना चाहती है कि वह उनकी सुरक्षा कर रहे हैं। ऐसा करने से मुसलमान उन्हें वोट देंगे, पर ऐसा नहीं होगा। बल्कि हिंदू वोटर डीएमके के खिलाफ हो गए हैं। राजनीतिक विशेषज्ञ रामू मणिवन्नन कहते हैं, तमिलनाडु में चुनाव में धर्म से ज्यादा पार्टी बड़ी होती है। यही वजह है कि भाजपा का अयोध्या वाला मॉडल यहां काम नहीं आ रहा। मंदिर से दो सौ मीटर दूर एक गली के मुहाने पर बोर्ड लगा है, यह रास्ता सिकंदर दरगाह को जाता है। उस गली में पहले दो घर मुसलमानों के हैं, फिर तीन हिंदुओं के, फिर एक मुसलमान का और फिर चार हिंदुओं के।
- घरों और लोगों के बीच सौहार्द की यह बुनावट इलाके में सुकून का सबसे मजबूत कारण हैं। इस मंदिर में मुरुगन को बैठे हुए रूप में पूजा जाता है। मंदिर शादी में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए प्रसिद्ध है। इस बार चुनाव में यह मंदिर किस पार्टी की बाधाएं दूर करता है, ये नतीजे बताएंगे।
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