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Literature: तमिलनाडु के राज्यपाल ने कहा, भारत और इंडिया समानार्थी शब्द नहीं

Thu, 14 Nov 2024 11:32 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 14 Nov 2024 11:32 AM IST
सार

आरएन. रवि ने कहा- आजादी के बाद भारत का भाव धीरे-धीरे कम होता गया और उसकी जगह इंडिया ने ले ली। लेकिन वे नहीं मानते कि इंडिया और  भारत समानार्थी शब्द हैं। उन्होंने कहा कि भारत एक राष्ट्र है। हमें अपने साहित्य में राष्ट्र का बोध भरना है।

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Tamil Nadu Governor RN Ravi India and Bharat comparisons Nationalism news and updates
आरएन रवि - फोटो : पीटीआई

विस्तार

 तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन. रवि ने कहा है कि भारत और इंडिया समानार्थी शब्द नहीं हैं। भारत सिर्फ एक राजनीतिक संघ नहीं है। भारत एक भाव है जिसका निर्माण हजारों-हजार वर्षों में यहां के तपस्वी ऋषियों ने किया है। इस निर्माण का आधार साहित्य रहा है। आजादी के बाद भारत का भाव धीरे-धीरे कम होता गया और उसका स्थान इंडिया ने ले लिया। लेकिन हमें भारत के भाव को ही दुबारा प्रतिष्ठित करना है। यह कार्य साहित्य और साहित्यकारों के माध्यम से ही संभव हो सकता है। उन्होंने कहा कि इसके लिए उत्तर और दक्षिण को एक साथ आना चाहिए क्योंकि भारत की संपूर्णता दोनों के आपसी सहयोग से ही स्थापित होती रही है।  
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आरएन. रवि ने ये बातें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ, साहित्य अकादमी दिल्ली, काशी-वाराणसी विरासत फाउंडेशन वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘भारत: साहित्य एवं मीडिया महोत्सव’ के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि कहीं।  
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उन्होंने ने कहा कि आजादी के बाद भारत का भाव धीरे-धीरे कम होता गया और उसकी जगह इंडिया ने ले ली। लेकिन वे नहीं मानते कि इंडिया और  भारत समानार्थी शब्द हैं। उन्होंने कहा कि भारत एक राष्ट्र है। हमें अपने साहित्य में राष्ट्र का बोध भरना है। उन्होंने कहा कि वाल्मीकि ने संस्कृत में रामायण लिखी। उनके बाद सबसे पहले दक्षिण भारत के कंबन ने उसका तमिल में अनुवाद किया। उनके भी कई सौ वर्षों के बाद महान संत गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस लिखी। तब जाकर राम का विराट स्वरूप जन जन में स्थापित हुआ। हमें आज भी ऐसे ही साहित्य सृजन की आवश्यकता है। 
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गोस्वामी तुलसीदास, रामानंद के शिष्य थे और रामानंद, रामानुज के शिष्य थे जो दक्षिण भारत के थे। यानी भारत के निर्माण में उत्तर और दक्षिण ने एक साथ जुड़कर कार्य किया। मीराबाई से पहले दक्षिण भारत में अंडाल नाम की कृष्ण की महान भक्त हुई थीं। उनकी रचनाओं में कृष्ण भक्ति का रस कूट कूट कर भरा हुआ है। 

उन्होंने कहा कि यह भारत के लिए एक कठिन समय है। एक नये भारत का उदय हो रहा है। ऐसे समय में साहित्यकारों की भूमिका पुन: महत्वपूर्ण हो जाती है। सोशल मीडिया एक दोधारी तलवार है। इसका अधिक से अधिक सदुपयोग कैसे हो, इसपर सोचने की जरूरत है। आज हिंदी ही नहीं अपितु सभी भारतीय भाषाओं के प्रचार और आपसी संवाद की अत्यंत आवश्यकता है। भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर संवाद से ही भारत का भाव पुन: प्रतिष्ठित होगा। 

सुब्रमण्यम भारती स्मारक बनाने का संकल्प
दक्षिण-उत्तर के साहित्य सेतु महाकवि भरतियार सुब्रमण्यम भारती और दक्षिण भारत के महान साहित्यकार-संपादक ‘चंदामामा’ बालशौरि रेड्डी की स्मृति में आयोजित ‘भारत:साहित्य एवं मीडिया महोत्सव’ के उद्घाटन सत्र में काशी-वाराणसी विरासत फाउंडेशन के अध्यक्ष राज्यसभा के पूर्व सांसद आरके सिन्हा ने कहा कि महाकवि सुब्रमण्यम भारती का कार्यक्षेत्र काशी रही। काशी में उन्होंने छह वर्ष तक साहित्य साधना की। इस आयोजन के सूत्रधार डॉ. राममोहन पाठक ने काशी में सुब्रमण्यम भारती स्मारक बनाने का प्रस्ताव इस सभा में दिया है, मैं उसे पूर्ण कराने के लिए हर संभव प्रयास करुंगा। 

तीन पुस्तकों का विमोचन
राज्यपाल आरएन. रवि ने उद्घाटन सत्र में तीन पुस्तकों का विमोचन किया। पहली पुस्तक पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. किंशुक पाठक की कृति ‘मीडिया के नये आयाम’, दूसरी पुस्तक दक्षिण भारत की हिंदी लेखिका 80 वर्षीय राजलक्ष्मी कृष्णनन की कृति ‘उत्कृष्ट तमिल साहित्य’ और  तीसरी पुस्तक नोएडा के कमलेश भट्ट ‘कमल’ की कृति ‘चयनित कहानियां’ रही। 


‘साहित्य सेतु’ सम्मान
राज्यपाल ने हिंदी साहित्य की सेवा करने वाले देश के विभिन्न राज्यों के साहित्यकारों को ‘साहित्य सेतु’ सम्मान से अलंकृत किया। यह सम्मान पाने वालों में दक्षिण भारत के हिंदी प्रचारक डॉ. एन. राजेंद्र बाबू, हिंदी प्रचारक संघ चेन्नई के जनरल सेक्रेटरी डॉ. जे. अशोक कुमार जैन, दक्षिण भारत के हिंदी प्रचारक तिरु पी. संमुगम, पी. ऊषारानी, पंजाब विश्वविद्यालय के डॉ. किंशुक पाठक, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विभागाध्यक्ष प्रो. मंजूनाथ, हिंदी में 20 से अधिक पुस्तकों की लेखिका वयोवृद्ध राजलक्ष्मी कृष्णनन, मैसूर में पुष्पा हिंदी विद्यालय की संस्थापक डॉ. पुष्पा एल.,असम के तेजपुर की लेखिका उषा टिबड़ेवाल, दक्षिण भारत के हिंदी प्रचारक वीएन. ईश्वरा, आदिवासी साहित्य के सृजन के लिए सोनभद्र के ओमप्रकाश त्रिपाठी शामिल हैं।
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