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अफगानिस्तान: तालिबान अपना सकता है ईरानी मॉडल, मुल्ला बरादर पीएम की रेस में आगे

Wed, 01 Sep 2021 05:40 AM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Wed, 01 Sep 2021 05:40 AM IST
सार

  • कंधार में पिछले चार दिनों से तालिबान के शीर्ष नेतृत्व के बीच बातचीत चल रही है और लगभग एक सप्ताह के भीतर सरकार गठन की घोषणा होने की संभावना है
  • मुल्ला हकीम तालिबान के शासन में अफगानिस्तान के नए चीफ जस्टिस बन सकता है 

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Taliban Govt Formation: Taliban To Adopt Iranian Model Of Political System In Afghanistan
मुल्ला अब्दुल गनी बरादर (मध्य में) - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी के बाद तालिबान ने दशकों के युद्ध के बाद देश में शांति और सुरक्षा लाने की अपनी प्रतिज्ञा दोहराते हुए मंगलवार को अपनी जीत का जश्न मनाया। इस बीच देश के चिंतित नागरिक इस इंतजार में दिखे कि नई व्यवस्था कैसी होगी।

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अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान से पूरी तरह से वापसी के बाद तालिबान के सामने अब 3.8 करोड़ की आबादी वाले देश पर शासन करने की चुनौती है जो बहुत अधिक अंतरराष्ट्रीय सहायता पर निर्भर है। तालिबान के समक्ष यह भी चुनौती है कि वह ऐसी आबादी पर इस्लामी शासन के कुछ रूप कैसे थोपेगा जो 1990 के दशक के अंत की तुलना में कहीं अधिक शिक्षित और महानगरों में बसी है, जब उसने अफगानिस्तान पर शासन किया था।
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वहीं, मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि तालिबान अफगानिस्तान में शासन के लिए राजनीतिक व्यवस्था के ईरानी मॉडल को अपना सकता है। कंधार में पिछले चार दिनों से तालिबान के शीर्ष नेतृत्व के बीच बातचीत चल रही है और लगभग एक सप्ताह के भीतर सरकार गठन की घोषणा होने की संभावना है।
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सूत्रों के के मुताबिक, तालिबान का सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा होगा और उसके अधीन सर्वोच्च परिषद होगी। काउंसिल में 11 या 72 सदस्य हो सकते हैं, जिनकी संख्या अभी भी तय की जा रही है। अफगानिस्तान के सूत्रों के हवाले से दिलचस्प बात यह है कि हिबतुल्लाह अखुंदजादा कंधार में रहेगा। कंधार तालिबान की पारंपरिक राजधानी रही है।

प्रधानमंत्री की रेस में हैं ये नाम
इसके अलावा एग्जीक्यूटिव आर्म का नेतृत्व प्रधानमंत्री करेंगे, जिसके अधीन मंत्रिपरिषद होगी। इस पद के लिए संभावित नामों में अब्दुल गनी बरादर या मुल्ला बरादर या मुल्ला उमर के बेटे मुल्ला याकूब शामिल हैं। मुल्ला उमर ने 1996 में अफगानिस्तान के इस्लामी अमीरात की स्थापना की थी और 1980 के दशक में सोवियत संघ के खिलाफ विरोध का नेतृत्व किया था। 9/11 के हमलों के बाद अफगानिस्तान पर अमेरिका के आक्रमण के बाद उमर को बाहर कर दिया गया था।

50 साल ज्यादा पुराने संविधान को बहाल करने की योजना
इस बीच, तालिबान ने 1964-65 के अफगान संविधान को बहाल करने की योजना बनाई है, जिसे तत्कालीन अफगान राष्ट्रपति मोहम्मद दाउद खान ने बनाया था। संविधान का परिवर्तन प्रतीकात्मक है क्योंकि वर्तमान संविधान विदेशी ताकतों के तहत तैयार किया गया था।

हालांकि इस पर अभी भी सवाल बने हुए हैं कि शासन का ढांचा कितना समावेशी होगा और क्या इसमें देश की अन्य जातियों जैसे हजारा, ताजिका को शामिल किया जाएगा। यह पता चला है, तालिबान समावेशी सरकारी ढांचे के आह्वान के प्रति सचेत है, विशेष रूप से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा आंतरिक विचलन एक मुद्दा हो सकता है। जबकि जमीनी स्तर पर कट्टरपंथी तालिबान इच्छुक नहीं है, वह दोहा में एक से अधिक प्रतिनिधित्व चाहता है।

मुल्ला हकीम हो सकता है मुख्य न्यायाधीश
जब न्यायपालिका की बात आती है, तो मुल्ला हकीम मुख्य न्यायाधीश बनने के लिए तैयार है। हाकिम एक बुजुर्ग व्यक्ति है, जो मुल्ला उमर का शिक्षक है। वह वर्तमान में कतर में तालिबान वार्ता दल का अध्यक्ष है।

तालिबान के कब्जे के बाद बढ़ रहा आर्थिक संकट 
अगस्त के मध्य में तालिबान के तेजी से देश पर कब्जा करने के बाद से एक लंबे समय से चल रहा आर्थिक संकट और बढ़ गया है। लोगों की भीड़ लगभग 200 अमेरिकी डालर के बराबर दैनिक निकासी सीमा का लाभ उठाने के लिए बैंकों के बाहर जमा हो रही है। सरकारी कर्मचारियों को महीनों से भुगतान नहीं किया गया है और स्थानीय मुद्रा का अवमूल्यन हो रहा है। अफगानिस्तान के अधिकांश विदेशी मुद्रा भंडार विदेशों में हैं और वर्तमान में उनके लेनदेन पर रोक है।

स्थानीय संयुक्त राष्ट्र मानवीय समन्वयक रमीज अलकबरोव ने कहा, ‘अफगानिस्तान मानवीय तबाही के कगार पर है।’ उन्होंने कहा कि सहायता प्रयासों के लिए 1.3 अरब अमेरिकी डालर की आवश्यकता है, जिसमें से केवल 39 प्रतिशत ही प्राप्त हुआ है।


तालिबान को अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, वे पश्चिमी देशों को कुछ लाभ वाली स्थिति में रख सकती हैं। पश्चिमी देश तालिबान पर इसको लेकर दबाव डाल सकते हैं कि वह मुक्त यात्रा की अनुमति देने, एक समावेशी सरकार बनाने और महिलाओं के अधिकारों की गारंटी दे। तालिबान का कहना है कि वे अमेरिका सहित अन्य देशों के साथ अच्छे संबंध बनाना चाहते हैं।

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