Tackling plastic pollution: क्या आपके खून में पहुंच रहा प्लास्टिक, कैसे होगा इस राक्षस का विनाश?
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विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में दुनिया में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर चेतावनी दी थी। सागरों में बढ़ रहे प्लास्टिक प्रदूषण पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के साथ ही, उन्होंने इसके लिए पूरी दुनिया को एकजुट होकर इसका समाधान निकालने की अपील की थी। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि देश में प्लास्टिक उपयोग कम करने के तमाम प्रचार के बाद भी इसमें औसतन 9.7 फीसदी की वृद्धि हो रही है। प्लास्टिक कचरे का राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादन लगभग 34 लाख मिट्रिक टन का है, जबकि इसका एक तिहाई से भी कम हिस्सा रिसाइकिल किया जा रहा है।
एनवायरनमेंट इंटरनेशनल पत्रिका ने एक रिसर्च के सहरे मई 2022 में दावा किया था कि मानव रक्त में प्लास्टिक के बहुत छोटे अंश पहुंचने लगे हैं। पत्रिका का दावा था कि एक छोटे समूह पर किये गए अध्ययन में लोगों के रक्त में पॉलिमर की उपलब्धता 1.6 माइक्रो ग्राम प्रति मिलीलीटर तक पहुंच गई है। यह खतरा कितना सही है और इसे समाप्त करने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
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इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस की हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार प्लास्टिक के उपयोग को हतोत्साहित करने के तमाम प्रयासों के बाद भी इसमें वृद्धि हो रही है। अलग-अलह क्षेत्रों में अलग-अलग दर से बढ़ रहे प्लास्टिक के उपयोग में एक बार उपयोग में आने वाला प्लास्टिक सबसे ज्यादा तेज गति से बढ़ रहा है, जबकि प्लास्टिक रीसाइक्लिंग की दर लंबे समय से 30 फीसदी के आसपास ठहरी हुई है।
सीमेंट उद्योग ने दिया था समाधान, लेकिन नहीं हुआ काम
प्लास्टिक और पन्नियों के कारण वातावरण को हो रहे स्थाई प्रदूषण का समाधान निकालने के लिए सीमेंट उद्योग की कंपनियों ने एक समाधान प्रस्तुत किया था। इसके अनुसार वे अपनी भट्टियों में गैस और बिजली के ईंधन के स्थान पर कचरा प्लास्टिक का उपयोग करने वाली थीं। इस क्षेत्र के जानकारों के अनुसार शुरुआती दौर में इस उपाय को खूब अच्छी तरह उपयोग में लाया गया था, लेकिन बाद में उन तक कचरा प्लास्टिक की पर्याप्त आपूर्ति का सिस्टम विकसित न हो पाने के कारण यह योजना स्थाई समाधान के तौर पर इस्तेमाल नहीं हो सकी।
टाइल्स बनाने का प्रयोग सफल
इसी तरह सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने प्लास्टिक कचरे से सड़कें बनाने का भी सुझाव दिया था, लेकिन कुल कचरे से प्लास्टिक कचरे की छंटाई का काम सही तरीके से न हो पाने के कारण यह योजना सही तरीके से आगे नहीं बढ़ाई जा सकी। अब गुरुग्राम में प्लास्टिक कचरे से टाइल्स बनाकर उन्हें सड़कों पर बिछाने का प्रयोग किया गया है। शुरूआती दौर में यह प्रयोग काफी सफल रहा है। यदि यह प्रयोग आगे भी सफल रहता है, तो प्लास्टिक कचरे के सही उपयोग को एक बेहतर दिशा मिल सकती है।
बना पशुओं की मौत का कारण
अब तक प्लास्टिक खेतों में कृषि उत्पादन को प्रभावित कर रहा था। आगे बढ़कर यह पशुओं की मौत का कारण बनने लगा। अब मछली जैसे जलीय जीवों के अंदर तक पहुंचने लगा है और यह लाखों जलीय जीवों की मौत का कारण भी बनने लगा है। इससे जल जीव संपदा को भी भारी खतरा पैदा हो गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे भविष्य के बड़े खतरे के रूप में देख रहे हैं। माना जा रहा है कि यह लोगों में कैसर जैसी गंभीर बीमारियों का बड़ा कारण बन रहा है।
क्या है समाधान
ग्रीन प्लैनेट वेस्ट मैनेजमेंट से जुड़े प्लास्टिक मामलों के विशेषज्ञ राजेश मित्तल ने अमर उजाला से कहा कि खून में प्लास्टिक कणों के पाए जाने की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है। इसकी वैज्ञानिक प्रयोगों में पुष्टि हुए बिना इसे सही नहीं कहा जा सकता। हालांकि, यह सही है कि लगातार बढ़ती आबादी के कारण इसके उपयोग को कम करने के प्रयास अपर्याप्त साबित हो रहे हैं।
खाद्य वस्तुओं, दवाइयों और ट्रांसपोर्टेशन में सुरक्षित पैकेजिंग के लिए प्लास्टिक के उपयोग को इनकार करना संभव नहीं है, लेकिन इसका उपयोग कम कर और रीसाइक्लिंग की सीमा बढ़ाकर इसके दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है।
राजेश मित्तल ने कहा कि प्लास्टिक की रिसाइक्लिंग 60 फीसदी तक पहुंच चुकी है। 30 फीसदी रीसाइक्लिंग संगठित क्षेत्र और लगभग इतना ही असंगठित क्षेत्र में भी किया जा रहा है। नई तकनीकों के आने और प्लास्टिक कचरे के लोगों के घरों से ज्यादा बेहतर तरीके से एकत्र करने पर इस समस्या को बहुत कम करने का प्रयास किया जा सकता है।