सर्वे: मथुरा-वृंदावन की गोशालाओं में नहीं मिला एक भी कोविड संक्रमण का केस, जानिए वजह

दयाशंकर शुक्ल सागर, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Thu, 05 Aug 2021 10:11 PM IST

सार

क्या गोशालाओं की तेज गंध से हो जाता है कोरोना वायरस सोर्स कोव-2 निष्क्रिय? इसका पता लगाने के लिए प्रशासन ने छोटे-बड़े 33 गो-आश्रय स्थलों का सर्वे कराया। यहां न कोई हुआ संक्रमित, न हुई महामारी से कोई मौत।
 
गोशाला
गोशाला - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

क्या गोशालाओं और इंसानी इम्यूनिटी के बीच कोई रिश्ता है? गोशालाओं में काम करने वाले लोगों के पास कोरोना नहीं फटक रहा। ये चौंकाने वाला खुलासा मथुरा-वृंदावन की गोशालाओं में हुए एक शुरूआती सर्वे में हुआ है। जिले की 33 गोशालाओं में कोरोना का न तो एक भी पॉजिटिव केस नहीं आया और न इस महामारी से कोई मृत्यु हुई। 
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इसी तरह की रिपोर्ट ब्रज क्षेत्र और यूपी के कुछ और जिलों की गोशालाओं से आई है। मथुरा से जुड़े अफसरों का कहना है कि इस दिशा में वैज्ञानिक स्तर पर व्यापक सर्वे और शोध की जरूरत है। इससे कोरोना जैसी महामारी से लड़ने की एक नई राह खुल सकती है। 

आयुर्वेद में पंचगव्य माने गए हैं अमृत
हजारों साल पहले लिखे गए आयुर्वेद ग्रंथों में पंचगव्यों यानी गाय का गोबर, गोमूत्र और दुग्ध उत्पादों को अमृत के समान माना गया है। आयुर्वेद इन्हें जैविक औषधीय के विकल्प के रूप में देखता है। आयुर्विज्ञानविदों का दावा है कि पंचगव्य एंटीबायोटिक्स, एंटी-फंगल एजेंट और कैंसर विरोधी दवाओं को भी अधिक प्रभावी बना सकता है। 
मथुरा यूपी का अकेला जिला है जहां सबसे ज्यादा करीब 93,000 गोवंशीय पशु हैं। जिले में कोविड की दोनों लहरों में वो प्रकोप नहीं दिखा जो अन्य करीबी जिलों में दिखा। मथुरा के सीडीओ नितिन गौर ने बीते दिनों मुख्य पशु चिकित्साधिकारी (सीवीओ) से मार्च 2020 से अब तक जिले में सभी 33 पंजीकृत गो-आश्रय स्थलों में कार्यरत केयरटेकरों की रिपोर्ट मांगी थी। 
सीवीओ ने मुख्य विकास अधिकारी को रिपोर्ट दी है उसके मुताबिक इस दौरान इन गोशालाओं में कार्यरत करीब 218 केयर टेकरों में से न कोई व्यक्ति कोविड संक्रमित हुआ और न ही किसी की इस महामारी में जान गई। इन गोशालाओं में करीब 11 हजार से ज्यादा गोवंश हैं। सबसे बड़ी ऊधर गोशाला में करीब 3 हजार गायें हैं और यहां करीब 40 कार्यकर्ता हैं। इसी तरह मथुरा की राल की गोशाला में कोई ढाई हजार गायें हैं और 70 कर्मी काम करते हैं। जहां किसी को सर्दी जुखाम या बुखार तक नहीं हुआ।

संत रमेश बाबा की गोशाला में भी कोई संक्रमित नहीं हुआ

गैर पंजीकृत गोशालाओं की रिपोर्ट भी इससे अलग नहीं है। बरसाना में संत रमेश बाबा की माताजी गोशाला देश की सबसे बड़ी गोशालाओं में एक है। इसमें करीब 55 हजार गायें हैं। गोसेवा के लिए रमेश बाबा को 2019 में पद्मश्री भी मिल चुका है। गोशाला में करीब 300 कार्यकर्ता हैं और करीब एक हजार लोग गोशाला के गुरूकुल और आश्रम में रहते हैं। 
इस सर्वे से बाहर की एक बड़ी गोशाला के संचालक राधाकान्त शास्त्री कहते हैं कि हमें भी हैरत हुई की कोराना प्रकोप काल में भी हमारे आश्रम में किसी को कोरोना क्या मामूली बुखार या खांसी तक नहीं हुई। वे कहते हैं- 'दरअसल मुझे लगता है कि गोशालाओं में पंचगव्यों की तेज गंध सारे बैक्टीरिया और वायरस को खत्म कर देती है। इसकी वजह से यहां की बसाहट पर कोरोना वायरस सोर्स कोव-2 का असर नहीं होता या वायरस इस वातावरण में निष्क्रिय हो जाता है। कुछ तो है जिसका वैज्ञानिक परीक्षण होना चाहिए।'

ऐसे आया सर्वे का विचार

90 साल के सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट लाल बहादुर सिंह आजमगढ़ के रहने वाले हैं। उनके घर में तीन-चार गायें हमेशा रही हैं। उनके इलाके में जब कोविड का प्रकोप फैला तो केवल उन्हीं घर संक्रमण से बच गया। उन्होंने इसे गोवंशीय का प्रताप माना। उन्होंने अपने स्तर पर आजमगढ़ की गोशालाओं में सर्वे कराया तो उन्हें भी गोशालाओं में कोविड संक्रमण का एक भी मामला नहीं मिला। उनके लिए ये हैरत की बात थी। उन्होंने 'अमर उजाला' को बताया कि पिछले महीने वे मथुरा गए। वहां उनकी कुछ संतों और सरकारी अधिकारियों के साथ इस पर अनौपचारिक चर्चा हुई। यहां बृज विकास बोर्ड का उपाध्यक्ष और पूर्व आईपीएस एसके मिश्र, सीडीओ नितिन गौर आदि भी मौजूद थे। इन्हीं अफसरों की पहल पर ही ये सर्वे हुआ। प्रारंभिक नतीजों के बाद इस पर अब और काम करने की जरूरत है। सिंह ने कहा कि इस तरह का सर्वे राज्य की सभी गोशालाओं में कराना चाहिए तब शायद हम किसी निश्चित और ठोस नतीजे पर पहुंचने की हालत में हों। वे कहते हैं कि पंचगव्यों के औषधीय गुणों और उससे जुड़े चिकित्सा लाभों पर गहन शोध की आवश्यकता है।

इस दिशा में कर सकते हैं अभी और काम
इस सर्वे में मथुरा की गोशालाओं में हमें कोई कोविड पॉजिटिव मरीज नहीं मिला है। ये कोविड चिकित्सा वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय हो सकता है। अन्य जिलों की गोशालाओं में भी वैज्ञानिक ढंग से सर्वे कराके इस दिशा में आगे काम किया जा सकता है। -नितिन गौर, मुख्य विकास अधिकारी, मथुरा
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