SC: वक्फ कानून पर कल फिर सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अंतरिम राहत के लिए मजबूत मामला पेश करने की जरूरत
केंद्र ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को पिछले महीने अधिसूचित किया था, जिसके बाद इसे 5 अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिल गई थी। इस विधेयक को लोकसभा ने 288 सदस्यों के समर्थन से पारित किया, जबकि 232 सांसद इसके खिलाफ थे। राज्यसभा में इसके पक्ष में 128 और विपक्ष में 95 सदस्यों ने मतदान किया।
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सुप्रीम कोर्ट में वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की सांविधानिक वैधता को चुनौती वाली याचिकाओं पर मंगलवार को सुनवाई हुई। कोर्ट ने कानून को लेकर अंतरिम आदेश पारित करने को लेकर तीन घंटे तक सुनवाई की। सुनवाई के दौरान सीजेआई बीआर गवई और जस्टिस जॉर्ज ऑगस्टीन मसीह की पीठ ने कहा कि प्रत्येक कानून के पक्ष में संवैधानिकता की अवधारणा’ होती है। अंतरिम राहत के लिए आपको बहुत मजबूत और स्पष्ट मामला बनाना होगा, अन्यथा संवैधानिकता की अवधारणा बनी रहेगी। याचिकाकर्ता के वकीलों की दलीलों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार का पक्ष सुनने के लिए बुधवार को सुनवाई तय की है।
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम आदेश पारित करने के लिए पहचाने गए तीन मुद्दों पर सुनवाई को सीमित करने का अनुरोध किया। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि तीन मुद्दों में अदालतों द्वारा वक्फ, उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ या विलेख द्वारा वक्फ घोषित संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने की शक्ति शामिल है। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और वक्फ कानून का विरोध करने वाले अन्य लोगों ने कहा कि कोई भी सुनवाई टुकड़ों में नहीं हो सकती। सीजेआई बीआर गवई ने कहा कि लोग अभी भी खजुराहो मंदिर में जाकर प्रार्थना करते हैं, हालांकि इसे एक प्राचीन स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया है।
मेहता की दलील का वक्फ कानून के खिलाफ याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिब्बल और अभिषेक सिंघवी ने विरोध किया। उन्होंने कहा कि इस मामले में टुकड़ों में सुनवाई नहीं हो सकती। यह वक्फ संपत्तियों पर व्यवस्थित कब्जे का मामला है। सरकार यह तय नहीं कर सकती कि कौन से मुद्दे उठाए जाएं।’’
सिब्बल ने कहा कि संशोधित कानून न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए कार्यकारी के माध्यम से वक्फ संपत्तियों के व्यवस्थित अधिग्रहण को सक्षम बनाता है। वक्फ संपत्तियां गैर-वक्फ बन सकती हैं। उन्होंने दलील दी कि वक्फ वाकिफ द्वारा अल्लाह को संपत्ति समर्पित करना है और यह अवधारणा कि एक बार वक्फ, हमेशा वक्फ रहता है, 2025 के कानून से यह खतरे में पड़ गया है।
सिब्बल ने कहा कि पहले के कानून संपत्तियों की सुरक्षा के लिए थे और वर्तमान कानून का उद्देश्य उन्हें छीनना है। उन्होंने कहा कि यह कानून ऐतिहासिक कानूनी और संवैधानिक सिद्धांतों से पूरी तरह से अलग है। यह कानून वक्फ संपत्तियों के धीरे-धीरे अधिग्रहण’ का प्रावधान करता है और वक्फ की अवधारणा को कमजोर करता है, जो इस्लामी कानून के तहत धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए एक स्थायी बंदोबस्ती है। उन्होंने अधिनियम की धारा- तीन(सी) का उल्लेख करते हुए कहा कि यह एक नामित अधिकारी को जांच करने का अधिकार देता है कि कोई संपत्ति सरकारी भूमि है या नहीं।
सिब्बल ने कहा कि जांच के लंबित रहने के दौरान संपत्ति को वक्फ नहीं माना जाएगा और इससे अधिकारियों को न्यायिक समीक्षा के बिना ही नियंत्रण लेने की अनुमति मिल जाती है। उन्होंने धारा नौ और 14 का उल्लेख करते हुए कहा कि ये केंद्रीय और राज्य वक्फ बोर्ड की संरचना में परिवर्तन करने का प्रावधान करते हैं और बहुसंख्यक गैर-मुस्लिमों को इसका हिस्सा बनने की अनुमति देते हैं। यह समुदाय के नियंत्रण को कमजोर करने का एक प्रयास है। धारा 23 वक्फ बोर्ड के सीईओ के रूप में एक गैर-मुस्लिम की नियुक्ति की अनुमति देती है। उन्होंने कानून की धारा- तीन(डी) को लेकर कहा कि इसमें प्रावधान है कि संरक्षण कानून के तहत प्राचीन स्मारक घोषित की गई कोई भी वक्फ संपत्ति वक्फ नहीं रह जाएगी।
उन्होंने कहा कि यह संरक्षित स्मारकों की वक्फ घोषणाओं को अमान्य करता है। उन्होंने कहा कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) 25 और 26 (धर्म का पालन करने और प्रचार करने के अधिकार) का उल्लंघन करता है। यदि संशोधित प्रावधानों को लागू करने की अनुमति दी गई, तो इससे अपूरणीय क्षति होगी।
सिब्बल ने कहा कि पहले वक्फ के लिए पंजीकरण की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन नए कानून के तहत यदि मुतवल्ली (संरक्षक) संपत्ति के बारे में संतोषजनक जवाब नहीं दे पाता है तो उसे छह महीने की जेल हो सकती है। जिस क्षण उन्हें संरक्षित स्मारक घोषित किया जाएगा, वे अपना वक्फ का दर्जा खो देंगे। केन्द्रीय वक्फ परिषद में पहले बोर्ड के सदस्य निर्वाचित होते थे और वे सभी मुसलमान होते थे। अब वे सभी मनोनीत हैं। इसमें 11 सदस्य होंगे और सात गैर-मुस्लिम हो सकते हैं। यह धर्मनिरपेक्षता नहीं है। वक्फ का निर्माण एक धार्मिक कार्य है। इसके अलावा वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन और अभिषेक मनु सिंघवी ने भी दलील दी।
पीठ ने 15 मई को सुनवाई 20 मई तक टाली थी
सीजेआई जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 15 मई को सुनवाई 20 मई तक टाली थी और कहा था कि वह अदालतों, उपयोगकर्ता या विलेख के जरिये वक्फ घोषित संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने की शक्ति समेत तीन मुद्दों पर अंतरिम निर्देश पारित करने के लिए दलीलें सुनेगी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से उठाया गया दूसरा मुद्दा राज्य वक्फ बोर्डों और केंद्रीय वक्फ परिषद की संरचना से संबंधित है, जहां उनका तर्क है कि पदेन सदस्यों को छोड़कर केवल मुसलमानों को ही काम करना चाहिए। तीसरा मुद्दा उस प्रावधान से संबंधित है, जिसके अनुसार, जब कलेक्टर यह पता लगाने के लिए जांच करेगा कि संपत्ति सरकारी भूमि है या नहीं, तो वक्फ संपत्ति को वक्फ नहीं माना जाएगा। पीठ ने कानून की वैधता को चुनौती देने वालों की ओर से पेश कपिल सिब्बल और अन्य व केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से 19 मई तक अपने लिखित नोट दाखिल करने को कहा था।
पीठ को दोनों पक्षों के वकीलों ने बताया कि जजों को दलीलों पर विचार करने के लिए अधिक समय की आवश्यकता हो सकती है। मेहता ने कहा कि किसी भी मामले में, केंद्र का एक आश्वासन है कि वक्फ की ओर से उपयोगकर्ता की स्थापित संपत्तियों सहित किसी भी वक्फ संपत्ति को गैर-अधिसूचित नहीं किया जाएगा। उन्होंने पहले आश्वासन दिया था कि नए कानून के तहत केंद्रीय वक्फ परिषद या राज्य वक्फ बोर्डों में कोई नियुक्ति नहीं की जाएगी। पीठ ने स्पष्ट किया कि वह 20 मई को पूर्ववर्ती 1995 के वक्फ कानून के प्रावधानों पर रोक लगाने की किसी भी याचिका पर विचार नहीं करेगी।
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बता दें कि केंद्र ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को पिछले महीने अधिसूचित किया था, जिसके बाद इसे 5 अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिल गई थी। इस विधेयक को लोकसभा ने 288 सदस्यों के समर्थन से पारित किया, जबकि 232 सांसद इसके खिलाफ थे। राज्यसभा में इसके पक्ष में 128 और विपक्ष में 95 सदस्यों ने मतदान किया।
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