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सुप्रीम कोर्ट: अदालत से बरी करने का मतलब नियोक्ता की अनुशासनात्मक कार्यवाही पर रोक नहीं

Wed, 23 Mar 2022 03:27 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला ब्यूरो. नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो. नई दिल्ली। Published by: देव कश्यप Updated Wed, 23 Mar 2022 03:27 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने 29 नवंबर, 2017 को कर्नाटक की कलबुर्गी पीठ के एक फैसले के खिलाफ कर्नाटक सरकार द्वारा अपील को स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने बीजापुर जिले के एक ग्राम लेखाकार उमेश की अनिवार्य सेवानिवृत्ति के फैसले को रद्द कर दिया था। उस पर रिश्वत लेने का आरोप था।

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Supreme Court upholds compulsory retirement of Karnataka government employee on charges of bribery
सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : पीटीआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा, किसी आपराधिक मामले में आरोपी को बरी करना नियोक्ता को उसके खिलाफ कार्रवाई करने से नहीं रोकता है। क्योंकि अनुशासनात्मक जांच को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत मुकदमे पर लागू होने वाले सिद्धांतों से अलग हैं। सुप्रीम कोर्ट ने घूसखोरी के आरोप में कर्नाटक सरकार के एक कर्मचारी की अनिवार्य सेवानिवृत्ति को बरकरार रखा।

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जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कहा, आपराधिक मुकदमे में अभियोजन पक्ष को संदेह से परे मामले को स्थापित करने का भार होता है। आरोपी को खुद निर्दोष होने का अनुमान लगाने का हक है। अनुशासनात्मक कार्यवाही का उद्देश्य एक कर्मचारी द्वारा कदाचार के आरोप की जांच करना है। पीठ ने कहा, आपराधिक अभियोजन में जहां आरोप को उचित संदेह से परे साबित करना होता है, वहीं उसके विपरीत अनुशासनात्मक कार्यवाही में कदाचार का आरोप संभावनाओं की प्रबलता पर स्थापित किया जाता है। आपराधिक मुकदमे पर लागू होने वाले साक्ष्य के नियम अनुशासनात्मक जांच को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत से अलग हैं।
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सुप्रीम कोर्ट ने 29 नवंबर, 2017 को कर्नाटक की कलबुर्गी पीठ के एक फैसले के खिलाफ कर्नाटक सरकार द्वारा अपील को स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने बीजापुर जिले के एक ग्राम लेखाकार उमेश की अनिवार्य सेवानिवृत्ति के फैसले को रद्द कर दिया था। उस पर रिश्वत लेने का आरोप था।
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हाईकोर्ट का मानना था कि आपराधिक मामले में आरोपी को बरी कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हाईकोर्ट ने एक ऐसे डोमेन (क्षेत्र) पर ध्यान केंद्रित किया जो नियोक्ता के अनुशासनात्मक अधिकार क्षेत्र में आता है। जांच नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार की गई। जांच अधिकारी और अनुशासनात्मक अथॉरिटी के निष्कर्ष साक्ष्य के संदर्भ में टिकाऊ हैं। आपराधिक मुकदमे में बरी होने से अनुशासनात्मक कार्यवाही में कदाचार का पता नहीं चलता है।

फैसला लेने में शॉर्टकट की मानसिकता से बचें निचली अदालतें : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को निचली अदालतों को आगाह किया कि मामलों का फैसला करने में शॉर्टकट की मानसिकता से बचें। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतें कुछ सवाल अनुत्तरित छोड़ने के बदले मुकदमे के हर पहलू पर पूरी तरह विचार कर फैसला दें, अन्यथा अपीलीय अदालतों पर बोझ बढ़ता है और नए सिरे से न्याय का निर्णय करने की जरूरत पड़ती है। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी भूमि अधिग्रहण के मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट के एकल और खंडपीठों के फैसले के खिलाफ दायर कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) की कई याचिकाओं पर दिए फैसले में की। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया।


इस मामले में एपीएमसी ने जमनालाल बजाज सेवा ट्रस्ट के मालिकाना हक वाली 172 एकड़ 22 गुंटा जमीन का अधिग्रहण किया था। हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि यह अधिग्रहण 2013 के भूमिअधिग्रहण कानून के तहत कालातीत हो गया है। जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए कहा कि अदालतों को  किसी मामले के सभी मुद्दों पर न्यायिक निर्णय देना चाहिए न कि सिर्फ एक मुद्दे पर।

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