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Supreme Court: थरूर मानहानि केस में ट्रायल पर रोक बढ़ी; मध्यप्रदेश में पैरामेडिकल कोर्स में फिर दाखिला शुरू

Fri, 01 Aug 2025 05:15 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: ज्योति भास्कर Updated Fri, 01 Aug 2025 05:15 PM IST
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Supreme Court Updates Shashi Tharoor Defamation WB Universities VC Appointment and other legal Case hindi news
सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स - फोटो : अमर उजाला

सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस सांसद शशि थरूर के खिलाफ चल रही मानहानि की कार्यवाही पर रोक को आगे बढ़ा दिया। मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर दिए गए बयान से जुड़ा है। थरूर ने कथित तौर पर 'शिवलिंग पर बिच्छू' वाला बयान पीएम मोदी के संदर्भ में दिया था। इसे आपत्तिजनक बताते हुए भाजपा नेता राजीव बब्बर ने शिकायतकर्ता के तौर पर पहले दिल्ली हाईकोर्ट में मुकदमा किया था।दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए थरूर ने सुप्रीम कोर्ट से मानहानि की कार्यवाही रद्द करने की अपील की है। ट्रायल पर रोक बढ़ाते हुए भाजपा नेता की पैरवी करने वाले वकील से शीर्ष अदालत ने कहा, 'इतना संवेदनशील क्यों हो रहे हैं? इसे यहीं खत्म कर दें।'

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सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने थरूर के वकील के अनुरोध पर मामले की सुनवाई 15 सितंबर तक के लिए टाल दी। आज की सुनवाई के दौरान थरूर के वकील ने शीर्ष अदालत से कहा, राजनीतिक दल के सदस्य और शिकायतकर्ता को इस मामले में 'पीड़ित पक्ष' नहीं माना जा सकता।
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बता दें कि थरूर ने दिल्ली हाईकोर्ट के 29 अगस्त 2024 के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही को बंद करने से इनकार कर उन्हें 10 सितंबर को ट्रायल कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि थरूर की टिप्पणी प्रधानमंत्री, भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं के लिए "अपमानजनक" है। प्रथम दृष्टया मानहानि का मामला बनता है। शिकायतकर्ता ने कहा था कि यह बयान उसकी धार्मिक भावनाओं को आहत करता है।
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गौरतलब है कि थरूर ने यह टिप्पणी 2018 में कैरावन पत्रिका में छपे एक पुराने लेख का हवाला देते हुए की थी। अक्तूबर 2018 में, एक आरएसएस नेता का हवाला देते हुए थरूर दावा किया था कि उन्होंने मोदी की तुलना 'शिवलिंग पर बैठे बिच्छू' से की थी। कांग्रेस नेता के मुताबिक उन्हें यह एक "असाधारण रूपक" जैसा लगा था।

यह भी दिलचस्प है कि सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले हुई सुनवाई में कहा था कि 2012 में प्रकाशित लेख को तब आपत्तिजनक नहीं माना गया। न्यायालय ने कहा था कि यह केवल एक रूपक (metaphor) है और इससे किसी की मानहानि नहीं होनी चाहिए।


सुप्रीम कोर्ट ने हटाई रोक, मध्यप्रदेश में पैरामेडिकल कोर्सों में फिर शुरू होगा दाखिला
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मध्यप्रदेश के पैरामेडिकल कोर्सों के 2023–24 और 2024–25 सत्रों की प्रवेश प्रक्रिया को फिर से शुरू करने का रास्ता साफ कर दिया। इससे पहले जबलपुर हाईकोर्ट ने लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन की याचिका पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है। अब इन कोर्सों में दाखिला प्रक्रिया दोबारा शुरू की जा सकेगी।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए कहा कि ऐसे मामलों में कानून छात्रों को याचिका दायर करने का कोई अधिकार नहीं है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने बताया कि कोविड महामारी के कारण कई कोर्स तय समय पर शुरू नहीं हो पाए थे। हाईकोर्ट का आदेश पैरामेडिकल काउंसिल की कार्यवाही को ठप कर रहा था।

दिल्ली हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता नामांकन नियम को चुनौती देने वाली याचिका खारिज
एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस नियम को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी, जिसमें अन्य राज्यों के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को दिल्ली में वरिष्ठ अधिवक्ता (सीनियर एडवोकेट) के रूप में नामित किए जाने पर रोक लगाई गई है। यह नियम 2024 में बनाए गए 'दिल्ली उच्च न्यायालय वरिष्ठ अधिवक्ता नामांकन नियमों' के अंतर्गत रूल 9B के तहत आता है। शुक्रवार को चीफ जस्टिस बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन ने दिल्ली हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता पद पर दावा करने वाले उत्तर प्रदेश उच्च न्यायिक सेवा से सेवानिवृत्त विजई प्रताप सिंह की याचिका खारिज कर कहा, 'आप सुप्रीम कोर्ट में इस पद के लिए आवेदन क्यों नहीं करते... सुप्रीम कोर्ट में हर कोई आवेदन कर सकता है।' दिल्ली हाईकोर्ट में बनाए गए 2024 के नियम के अनुसार, केवल वही वकील या न्यायिक अधिकारी वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित होने के पात्र हैं जिन्होंने दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा से सेवानिवृत्त होकर कम से कम 10 वर्षों तक सेवा दी हो। अन्य राज्यों से आने वाले सेवानिवृत्त न्यायाधीश इसके पात्र नहीं होंगे। याचिकाकर्ता विजय ने इस नियम को "असांविधानिक" बताते हुए कहा था कि इससे "एक वर्ग के भीतर वर्ग जैसा भेदभाव" होता है।

आंध्र प्रदेश में सत्र न्यायालय स्थानांतरण के फैसले के खिलाफ याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने आज एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान 'न्याय को लोगों के द्वार तक पहुंचाने' की जरूरत पर बल दिया। चीफ जस्टिस बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा, आंध्र प्रदेश के एक सत्र न्यायालय को स्थानांतरित करने के खिलाफ इस मामले में सुनवाई नहीं की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा, जब भी कोई नया न्यायालय स्थापित होता है, वकील उसका विरोध करते हैं। लेकिन न्यायालय केवल वकीलों के लिए नहीं होते, वे मूल रूप से याचिकाकर्ताओं के लिए होते हैं। हम तो 'दरवाजे पर न्याय' और ग्राम न्यायालयों की बात कर रहे हैं।' शीर्ष अदालत ने इस टिप्पणी के साथ आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले की अदालत को मछलीपट्टनम से अवनिगड्डा स्थानांतरित करने के फैसले के खिलाफ सुनवाई करने से इनकार कर दिया।

क्या है पूरा मामला
याचिका आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें हाईकोर्ट ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय-VI  को मछलीपट्टनम से अवनिगड्डा स्थानांतरित करने के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि स्थानांतरण से स्थानीय वकीलों को असुविधा हो सकती है, लेकिन यह कदम वादकारियों के व्यापक हित में है। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के इसी विचार को दोहराते हुए याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया।

तमिलनाडु के 38 जिलों में वृद्धाश्रम मामले की सुनवाई
इसी राज्य का एक अन्य मामला हर जिले में वृद्धाश्रम स्थापित करने के निर्देश से जुड़ा है। दरअसल, तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को बुजुर्गों की देखरेख से जुड़ी अपील पर सुनवाई के बाद सभी 38 जिलों में वृद्धाश्रम स्थापित करने का आदेश दिया था।

केंद्र सरकार के अधीन आने वाले सांविधानिक पद पर नियुक्ति का मामला
सुप्रीम कोर्ट की पीठ आज केंद्र सरकार के अधीन आने वाले अहम सांविधानिक पद- CAG की नियुक्ति के मुकदमे पर भी सुनवाई करेगी। सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की नियुक्ति के लिए निष्पक्ष और स्वतंत्र नियुक्ति प्रक्रिया की मांग करने वाली इस अपील पर कोर्ट सुनवाई के बाद अहम निर्देश दे सकता है।

पश्चिम बंगाल में कुलपतियों की नियुक्ति से संबंधित याचिका पर सुनवाई
एक अन्य मुकदमा पश्चिम बंगाल के विभिन्न विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति से संबंधित है। इस विवाद पर राज्य की तृणमूल कांग्रेस सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। आज सुप्रीम कोर्ट मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई करेगी।

समग्र शिक्षा योजना के तहत 2000 करोड़ रुपये का फंड मामला
एक अन्य मामला तमिलनाडु से जुड़ा है। सर्वोच्च न्यायालय की पीठ तमिलनाडु सरकार की उस याचिका पर सुनवाई करेगी जिसमें मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली सरकार ने केंद्र पर फंड रोकने के आरोप लगाए हैं। द्रमुक सरकार का आरोप है कि केंद्र ने समग्र शिक्षा योजना के तहत मिलने वाला 2,000 करोड़ रुपये का वार्षिक फंड रोक दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने हत्या मामले में आरोपी को किशोर घोषित करने के आदेश को किया रद्द,  मुकदमा चलाने का दिया निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को किशोर घोषित किया गया था। अदालत ने कहा कि आरोपी के खिलाफ घर में जबरन घुसकर हत्या करने का गंभीर आरोप है और उसे भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत वयस्क के रूप में मुकदमा झेलना होगा। गंभीर अपराधों में किशोर न्याय अधिनियम का दुरुपयोग नहीं होने दिया जा सकता। 

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने पाया कि आरोपी को किशोर न्याय बोर्ड ने तीन साल की सजा पूरी करने पर रिहा कर दिया था और उसे तीन सप्ताह के भीतर निचली अदालत में पेश होने का निर्देश देते हुए कहा कि वह इस मामले में जमानत लेने के लिए स्वतंत्र है। पीठ ने कहा कि यद्यपि स्कूल की ओर से जारी प्रमाण पत्र में आरोपी की जन्मतिथि 18 अप्रैल, 1995 दर्ज थी, लेकिन उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 के तहत बनाए गए परिवार रजिस्टर में उसका जन्म वर्ष 1991 दर्ज है। पीठ ने आगे कहा कि 2012 की मतदाता सूची में उसकी आयु 1 जनवरी, 2012 को 22 वर्ष बताई गई है।

शीर्ष अदालत ने कहा, इस मुद्दे पर गहन विचार करते हुए हम पाते हैं कि निचली अदालत और हाईकोर्ट की ओर से अपनाया गया दृष्टिकोण उचित नहीं था। पीठ ने कहा कि मेडिकल बोर्ड ने कहा था कि उसकी उम्र लगभग 22 वर्ष है, जिससे घटना के दिन उसकी उम्र 20-21 वर्ष के बीच होगी। पीठ ने कहा, तदनुसार, उपरोक्त कारणों से आरोपी को किशोर घोषित करना स्पष्ट रूप से अनुचित है। इसलिए विवादित आदेश और प्रतिवादी संख्या 2 को किशोर ठहराने वाले निचली अदालत के 19 मई, 2015 के आदेश को रद्द किया जाता है। पीठ ने कहा कि कैराना पुलिस स्टेशन में दर्ज मामले में आरोपी पर बालिग की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है। पीठ ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह प्राथमिकता के आधार पर, जुलाई 2026 के अंत तक, मुकदमे को पूरा करे।

दिल्ली पुलिस की लापरवाही से रूस की महिला बेटे के साथ भागी : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली पुलिस की लापरवाही से रूस की महिला अपने बच्चे के साथ नेपाल के रास्ते भारत से भाग गई। महिला अलग हुए अपने भारतीय पति के साथ बच्चे के संरक्षण की लड़ाई लड़ रही थी। शीर्ष अदालत ने अधिकारियों से नाबालिग को वापस लाने के लिए मास्को स्थित भारतीय दूतावास से संपर्क करने को कहा।

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि महिला पर कड़ी निगरानी रखने के लिए 22 मई को शीर्ष अदालत की ओर से स्पष्ट निर्देश जारी किए गए थे। इसके बावजूद, वह एक नाबालिग के साथ देश से भागने में सफल रही। यह सरासर लापरवाही और नाकामी के अलावा और कुछ नहीं है।

 पीठ ने कहा, दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने सोचा होगा कि यह एक साधारण मामला है जहां एक मां अपने बच्चे को लेकर भाग गई है। पुलिस और मंत्रालय (विदेश मंत्रालय) दोनों ने इसे हल्के में लिया है। यह इतना साधारण वैवाहिक विवाद नहीं था।

पीठ ने कहा कि बच्चे को न मां को सौंपा गया था और न पिता को। बच्चा इस अदालत के संरक्षण में था। अदालत इस मामले को सुलझा रही थी। पीठ ने यह चेतावनी भी दी कि वह इस लापरवाही के लिए स्थानीय पुलिस स्टेशन के हाउस ऑफिसर (एसएचओ) और पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) को नहीं बख्शेगी। यदि जरूरत पड़ी तो वह पुलिस आयुक्त को भी तलब करेगी। शीर्ष न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को बच्चे को वापस लाने के लिए कुछ ठोस कार्रवाई का विवरण देते हुए नई स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने के लिए 10 दिन का समय दिया।

2022 के एमबीबीएस प्रशिक्षुओं को वजीफा दे सैन्य मेडिकल कॉलेज : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली स्थित आर्मी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसीएमएस) को 2022 बैच के एमबीबीएस प्रशिक्षुओं को 25,000 रुपये प्रति माह वजीफा का बकाया भुगतान करने का आदेश दिया। शीर्ष कोर्ट ने कहा, वे इसे पाने का अधिकार रखते हैं। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने मेडिकल स्नातक अभिषेक यादव और अन्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।

शीर्ष अदालत ने कहा, सितंबर 2023 के आदेश में अक्तूबर, 2023 से प्रशिक्षण शुरू करने वाले इंटर्न के लिए 25,000 रुपये प्रति माह का वजीफा अनिवार्य करने के बावजूद, उससे पिछले बैच को यह वजीफा नहीं दिया गया। सुनवाई के दौरान जस्टिस धूलिया ने एसीएमएस की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आर. बालासुब्रमण्यम से सवाल किया कि लगभग तीन साल बाद भी 2022 के इंटर्न को भुगतान क्यों नहीं किया गया है। जस्टिस कुमार ने एसीएमएस के रुख की कड़ी आलोचना की और कहा, आप उनसे 18-19 घंटे काम करवाते हैं और आप उन्हें वजीफा भी नहीं देना चाहते? बालासुब्रमण्यम ने तर्क दिया कि कॉलेज का प्रबंधन एक निजी संस्था द्वारा किया जाता है और उसे सरकारी धन नहीं मिलता। पीठ इससे सहमत नहीं हुई और कहा, इन छात्रों ने कॉलेज के लिए काम किया है। उन्हें भुगतान किया जाना चाहिए।

पीठ ने बालासुब्रमण्यम का बयान दर्ज किया कि आर्मी कॉलेज 2022 बैच सहित सभी प्रशिक्षुओं को समान 25,000 रुपये का वजीफा देगा।  पिछले आदेशों का हवाला देते हुए, पीठ ने आदेश दिया कि समान स्थिति वाले छात्रों को लाभ से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

सुरक्षित और सुलभ फुटपाथ के दिशा-निर्देश बनाने के लिए केंद्र को चार हफ्ते का समय
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सुरक्षित और सुलभ फुटपाथ के लिए आवश्यक दिशानिर्देश बनाने के लिए आखिरी मौका देते हुए चार हफ्ते का समय दिया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि यह मुकदमा पैदल चलने वालों की सुरक्षा से जुड़ा है। अगर केंद्र सरकार दिशा-निर्देश बनाने में विफल रहती है तो यह अदालत वकील की सहायता से आवश्यक कार्रवाई करेगी।

पीठ ने कहा, यह बताया गया है कि नागरिकों के इस्तेमाल के लिए उचित फुटपाथ होना जरूरी है। फुटपाथ ऐसे होने चाहिए जो दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सुलभ और उपयोग योग्य हों। फुटपाथों पर अतिक्रमण हटाना अनिवार्य है। इस मामले में न्यायमित्र की भूमिका निभा रहे वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने दलील दी कि केंद्र सरकार ने अब तक दिशा-निर्देश नहीं बनाए हैं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सड़क सुरक्षा से संबंधित विभिन्न आदेशों के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय मनोहर सप्रे की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी। वकील ने कहा कि दिशा-निर्देश तैयार होने के बाद समिति पैदल यात्रियों की मौतों को रोकने के लिए उनके कार्यान्वयन की निगरानी शुरू कर सकती है।  केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने कहा कि केंद्र सरकार इस संबंध में दिशा-निर्देश तैयार करेगी। 

सट्टेबाजी एप्स पर प्रतिबंध की मांग पर राज्यों को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन और ऑफलाइन सट्टेबाजी एप्स पर सख्त नियमन की मांग वाली एक जनहित याचिका पर सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया।

जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिका पर गूगल इंडिया, ट्राई, एपल इंडिया, ड्रीम 11 फैंटेसी, मोबाइल प्रीमियम लीग, ए23 गेम्स और अन्य से भी जवाब मांगा। पीठ ने केंद्र को याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का और समय दिया और मामले की सुनवाई 18 अगस्त के लिए तय की। धर्म प्रचारक केए पॉल की याचिका में केंद्र से ऑनलाइन और ऑफलाइन सट्टेबाजी और जुए को प्रतिबंधित या विनियमित करने वाला एक समान केंद्रीय कानून बनाने का अनुरोध किया है। 

अदालतें सिर्फ वकीलों के लिए नहीं वादियों के लिए होती हैं
सुप्रीम कोर्ट ने घर-घर तक न्याय पहुंचाने की जरूरत पर जोर देते हुए मछलीपट्टनम से सत्र न्यायालय को आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के अवनीगड्डा में स्थानांतरित करने के खिलाफ याचिका पर विचार करने से मना कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि अदालतें सिर्फ वकीलों के लिए नहीं होती, वे मूलतः वादियों के लिए होती हैं। सीजेआई जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा, जब भी किसी नई अदालत की स्थापना होती है, वकील हमेशा उसका विरोध करते हैं। हम घर तक न्याय पहुंचाने, ग्राम न्यायालयों की बात कर रहे हैं। पीठ के रुख को भांपते हुए याचिकाकर्ता बुरागड्डा अशोक कुमार ने याचिका वापस ले ली। 

पूर्व जजों को वरिष्ठ अधिवक्ता बनने से रोकने की मांग वाली अर्जी खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने सेवानिवृत्त जजों को राष्ट्रीय राजधानी में वरिष्ठ अधिवक्ता पद के लिए आवेदन करने से रोकने वाले दिल्ली हाईकोर्ट नियम को चुनौती वाली याचिका पर विचार करने से मना कर दिया। सीजेआई जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने उत्तर प्रदेश में उच्च न्यायिक सेवाओं से सेवानिवृत्त विजय प्रताप सिंह की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता विजय प्रताम सिंह ने दावा किया कि दिल्ली हाईकोर्ट का नियम सांविधानिक दुर्बलता से ग्रस्त है क्योंकि यह एक वर्ग के भीतर वर्ग बनाता है। 
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